नक्सल मोर्चे पर मध्यप्रदेश मॉडल की बढ़ती भूमिका: केवल मुठभेड़ नहीं, इंटेलिजेंस और लोकविश्वास की रणनीति का मिला राष्ट्रीय सम्मान

Bhopal  . देश में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ चल रहे सबसे बड़े आंतरिक सुरक्षा अभियानों के बीच मध्यप्रदेश पुलिस की भूमिका अब सीमित “सहायक बल” की नहीं रही, बल्कि वह केंद्रीय रणनीति का सक्रिय हिस्सा बन चुकी है। इसी बदलती तस्वीर के बीच केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री Amit Shah ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आयोजित “उजर बस्तर” कार्यक्रम में मध्यप्रदेश पुलिस, हॉक फोर्स और एंटी-नक्सल ऑपरेशन से जुड़े अधिकारियों को सम्मानित किया।

यह सम्मान केवल एक औपचारिक उपलब्धि नहीं है। यह संकेत है कि मध्यप्रदेश, विशेषकर बालाघाट-सुकमा-गढ़चिरौली से जुड़े ट्राइ-जंक्शन इलाकों में, अब नक्सल विरोधी अभियानों की नई रणनीति विकसित हो रही है, जिसमें बंदूक के साथ टेक्नोलॉजी, स्थानीय विश्वास और अंतरराज्यीय समन्वय को बराबर महत्व दिया जा रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह सम्मान?

देश में नक्सलवाद का प्रभाव पिछले डेढ़ दशक में लगातार सिमटा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार नक्सल हिंसा और उससे प्रभावित जिलों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। सरकार ने मार्च 2026 तक देश को नक्सलमुक्त बनाने का लक्ष्य भी रखा है।

ऐसे समय में मध्यप्रदेश पुलिस को सम्मान मिलना इसलिए अहम है क्योंकि लंबे समय तक नक्सल चुनौती का केंद्र केवल छत्तीसगढ़, झारखंड या महाराष्ट्र को माना जाता रहा। लेकिन बालाघाट का घना वन क्षेत्र, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली और छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से जुड़कर एक संवेदनशील कॉरिडोर बनाता है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार यह इलाका लंबे समय तक नक्सली मूवमेंट, हथियार ट्रांजिट और लॉजिस्टिक सपोर्ट का मार्ग रहा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन सीमावर्ती इलाकों में समन्वित कार्रवाई कमजोर पड़ती, तो नक्सली नेटवर्क नए सुरक्षित जोन विकसित कर सकते थे।

मध्यप्रदेश की रणनीति कैसे बदली?

मध्यप्रदेश पुलिस की हॉक फोर्स ने पिछले कुछ वर्षों में केवल जंगल आधारित कॉम्बिंग ऑपरेशन पर निर्भर रहने के बजाय “इंटेलिजेंस-ड्रिवन ऑपरेशन” मॉडल अपनाया।

इस मॉडल के तीन प्रमुख आधार रहे—

स्थानीय सूचना तंत्र को मजबूत करना

पड़ोसी राज्यों के साथ रियल टाइम समन्वय

ड्रोन, सर्विलांस और डिजिटल मैपिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल


सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार पहले नक्सल विरोधी अभियान अक्सर “क्षेत्र कब्जाने” तक सीमित रहते थे, लेकिन अब फोकस नेटवर्क तोड़ने पर है—यानी सप्लाई चेन, संदेश प्रणाली, हथियार मूवमेंट और कैडर भर्ती पर लगातार दबाव बनाना।

इसी रणनीति के कारण मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ पुलिस के बीच संयुक्त ऑपरेशन अधिक प्रभावी हुए हैं।

सम्मानित अधिकारियों की भूमिका क्यों चर्चा में?

सम्मानित अधिकारियों में Kailash Makwana सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और फील्ड कमांडर शामिल रहे, जिन्होंने बालाघाट क्षेत्र में अभियान संचालन, इंटेलिजेंस नेटवर्क और संयुक्त ऑपरेशन की कमान संभाली।

हॉक फोर्स के जमीनी अधिकारियों को भी सम्मानित किया गया, जो संकेत देता है कि केंद्र सरकार अब केवल शीर्ष नेतृत्व नहीं, बल्कि फील्ड लेवल ऑपरेशनल क्षमता को भी राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है।

केवल सुरक्षा नहीं, विकास की लड़ाई भी

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों की सफलता केवल मुठभेड़ों से नहीं मापी जाती। असली चुनौती यह होती है कि स्थानीय समुदाय पुलिस और प्रशासन पर कितना भरोसा करता है।

बालाघाट और आसपास के क्षेत्रों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ने से प्रशासनिक उपस्थिति मजबूत हुई है। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि जहां शासन की पहुंच बढ़ती है, वहां उग्रवादी संगठनों की वैचारिक पकड़ कमजोर पड़ती है।

यही कारण है कि अब “सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट” मॉडल को नक्सल उन्मूलन की दीर्घकालिक रणनीति माना जा रहा है।

आगे की चुनौती क्या है?

हालांकि नक्सली हिंसा में गिरावट आई है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि संगठन अब छोटे मॉड्यूल, लोकल नेटवर्क और सीमावर्ती जंगल क्षेत्रों पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।

ऐसे में मध्यप्रदेश जैसे राज्यों की भूमिका और बढ़ जाएगी, क्योंकि ये क्षेत्र “बफर जोन” की तरह काम करते हैं। यदि यहां सतत निगरानी कमजोर हुई तो नक्सली संगठन पुनर्गठन की कोशिश कर सकते हैं।

इसीलिए केंद्र सरकार अब राज्यों के बीच संयुक्त कमांड, साझा इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी पर अधिक निवेश कर रही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श में उभरता मध्यप्रदेश

एक समय था जब मध्यप्रदेश को नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची में “सीमित प्रभाव वाला राज्य” माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। बालाघाट में लगातार ऑपरेशन, सीमावर्ती समन्वय और हॉक फोर्स की सक्रियता ने राज्य को राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा रणनीति में अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

बस्तर में मिला यह सम्मान केवल पुलिस पदकों की सूची नहीं बढ़ाता, बल्कि यह दर्शाता है कि आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश देश के नक्सल विरोधी ढांचे में एक निर्णायक रणनीतिक भूमिका निभा सकता है।

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