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कर्मचारी विरोधी फैसलों पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: वेतन कटौती आदेश रद्द, हजारों कर्मचारियों को मिलेगा बकाया

भोपाल । मध्यप्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने तत्कालीन सरकार द्वारा जारी किए गए कर्मचारी विरोधी वेतन कटौती आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत के इस फैसले को कर्मचारियों की ऐतिहासिक जीत माना जा रहा है, जिससे हजारों कर्मचारियों को राहत मिलने का रास्ता साफ हुआ है। भोपाल में आयोजित पत्रकार वार्ता में मप्र कर्मचारी मंच के प्रदेश अध्यक्ष अशोक पांडे ने बताया कि प्रदेश की दो पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में कर्मचारियों के हितों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया गया। वर्ष 2000 में 28 हजार दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त किया गया, वहीं वर्ष 2019 में नियमित सरकारी कर्मचारियों के वेतन से जबरन कटौती का आदेश जारी किया गया।

2019 का वेतन कटौती आदेश
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 12 दिसंबर 2019 को जारी आदेश के तहत नव नियुक्त सरकारी कर्मचारियों को पहले चार वर्षों तक पूरा वेतन नहीं देने का प्रावधान किया गया था।

पहले वर्ष 30% कटौती (70% वेतन)

दूसरे वर्ष 20% कटौती (80% वेतन)

तीसरे वर्ष 10% कटौती (90% वेतन)
चार वर्ष बाद ही पूरा वेतन देने का प्रावधान था। इस आदेश से पिछले छह वर्षों में हजारों कर्मचारियों को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।


हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
6 जनवरी 2026 को उच्च न्यायालय जबलपुर की डबल बेंच न्यायमूर्ति विवेक रसिया और न्यायमूर्ति दीपक कोट ने इस आदेश को कर्मचारी विरोधी बताते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब कर्मचारी पूरा कार्य करता है तो उसे पूरा वेतन मिलना चाहिए। “समान कार्य, समान वेतन” का सिद्धांत लागू करते हुए कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि बीते छह वर्षों में की गई करोड़ों रुपये की कटौती प्रभावित कर्मचारियों को तत्काल वापस की जाए। मध्यप्रदेश कर्मचारी मंच ने ऐलान किया है कि हाईकोर्ट के आदेश के पालन की मांग को लेकर 13 जनवरी 2026 को मंत्रालय का घेराव किया जाएगा। इस दौरान मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर एक सप्ताह में आदेश लागू करने और कर्मचारी हित में निर्देश जारी करने की मांग की जाएगी।

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