
SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर उठे गंभीर सवाल
ग्वालियर। मध्यप्रदेश के ग्वालियर से एक बड़ी और चर्चित खबर सामने आई है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए उनकी तत्काल रिहाई के आदेश जारी कर दिए हैं। कोर्ट के इस फैसले को न्याय की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने पुलिस कार्रवाई और SC/ST एक्ट के कथित दुरुपयोग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
फर्जी SC/ST एक्ट में गिरफ्तारी का आरोप
जानकारी के अनुसार, एडवोकेट अनिल मिश्रा को एक मामले में SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था। उनके पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में दायर याचिका में दलील दी गई कि गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई और इसके पीछे दुर्भावनापूर्ण मंशा थी। हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार (Accept) करते हुए गिरफ्तारी को संविधान के विरुद्ध माना।
कोर्ट का सख्त रुख, तुरंत रिहाई के आदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना ठोस आधार और विधिक प्रक्रिया के की गई गिरफ्तारी न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। इसके बाद कोर्ट ने अनिल मिश्रा को तुरंत रिहा करने के निर्देश दिए। इस फैसले के बाद पुलिस विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
अधिवक्ताओं का उग्र लेकिन संगठित प्रदर्शन
अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी के विरोध में भिंड और ग्वालियर सहित आसपास के जिलों से हजारों अधिवक्ता सड़कों पर उतर आए थे। अधिवक्ताओं का कहना था कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और समाज की आवाज़ से जुड़ा है। प्रदर्शनकारियों ने इसे न्याय की लड़ाई बताया।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
कोर्ट के फैसले के बाद इसे सनातन और सवर्ण समाज की जीत बताते हुए कई संगठनों ने प्रतिक्रिया दी है। कुछ वक्तव्यों में इसे मोहन यादव सरकार के लिए बड़ा झटका करार दिया गया। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला सरकार से अधिक प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई पर केंद्रित है।
अधिकारियों पर जांच की संभावना
कानूनी सूत्रों के अनुसार, हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद उन अधिकारियों की भूमिका की जांच हो सकती है, जिनकी गिरफ्तारी प्रक्रिया में मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। यदि जांच आगे बढ़ती है, तो यह मामला और गंभीर मोड़ ले सकता है।
निष्कर्ष:
ग्वालियर हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल अनिल मिश्रा को राहत देता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कानून के नाम पर किसी के अधिकारों का हनन स्वीकार्य नहीं। यह प्रकरण आने वाले समय में SC/ST एक्ट के दुरुपयोग और पुलिस जवाबदेही पर एक अहम नज़ीर बन सकता है।



