बिग ब्रेकिंग न्यूज़ : दिल्ली दंगे केस में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत से इनकार, पांच अन्य को कड़ी शर्तों पर राहत

नई दिल्ली । दिल्ली दंगों से जुड़े एक बेहद अहम और संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है, जबकि इसी मामले में अन्य पांच आरोपियों को अत्यंत कड़ी शर्तों के साथ जमानत दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और दंगों में जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

शरजील इमाम और उमर खालिद को राहत क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि दिल्ली दंगों में 57 लोगों की मौत एक सामान्य आपराधिक घटना नहीं, बल्कि अत्यंत गंभीर और संगठित अपराध की श्रेणी में आती है। अदालत ने माना कि इस मामले में शरजील इमाम और उमर खालिद की भूमिका मुख्य आरोपियों के रूप में सामने आती है, इसलिए उन्हें केवल इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती कि वे लंबे समय से जेल में बंद हैं।

अदालत का साफ कहना है कि यदि कोई व्यक्ति इतनी खतरनाक और समाज को अस्थिर करने वाली गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो लंबी न्यायिक हिरासत अपने आप में जमानत का आधार नहीं बन सकती।

पुलिस के सबूतों को सुप्रीम कोर्ट ने माना विश्वसनीय

इस फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस द्वारा जुटाए गए सभी सबूतों को प्रथम दृष्टया सत्य और विश्वसनीय माना है। अदालत ने संकेत दिया कि आरोप केवल अनुमान या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं हैं, बल्कि डिजिटल साक्ष्य, बयान और घटनाक्रमों की कड़ी के रूप में रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। यही कारण है कि शीर्ष अदालत ने यह मानने से इनकार कर दिया कि आरोपियों को स्वतः जमानत दी जाए।

पांच अन्य आरोपियों को कड़ी शर्तों पर जमानत

हालांकि, इसी मामले में अन्य पांच आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी, लेकिन इसके साथ बेहद सख्त शर्तें भी लगाई गई हैं। इनमें जांच में पूरा सहयोग, किसी भी प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणी से परहेज, गवाहों से संपर्क न करना और भविष्य में किसी भी संदिग्ध गतिविधि में शामिल न होने जैसी शर्तें शामिल हैं।

न्यायालय का संदेश: दंगे और हिंसा पर कोई नरमी नहीं

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि सांप्रदायिक हिंसा, दंगे और संगठित साजिशों के मामलों में न्यायपालिका नरमी के मूड में नहीं है। यह आदेश उन दलीलों को भी खारिज करता है, जिनमें कहा जाता है कि लंबी जेल अवधि अपने आप में जमानत का अधिकार बन जाती है।


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