State

आरक्षण और जनरल सीट पर सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले: क्या सच में विरोधाभास है? जानिए पूरा कानूनी स्पष्टीकरण

भोपाल । सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण से जुड़े दो हालिया फैसलों ने सोशल मीडिया से लेकर आम जनमानस तक भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। एक फैसला कहता है कि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार यदि सामान्य वर्ग के बराबर अंक लाता है तो वह जनरल सीट पर चयनित हो सकता है, जबकि दूसरा फैसला इसके विपरीत प्रतीत होता है। हालांकि, गहराई से देखने पर दोनों निर्णय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक नजर आते हैं।

पूरा मामला क्या है?
दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ये दोनों फैसले क्रमशः राजस्थान और कर्नाटक से जुड़े मामलों में आए। अखबारों में संक्षिप्त और सतही रिपोर्टिंग के चलते लोगों में भ्रम फैल गया कि कोर्ट अपने ही फैसलों से पलट रहा है।

पहला फैसला क्या कहता है?
यदि कोई उम्मीदवार आरक्षित वर्ग से है, लेकिन उसने परीक्षा की पूरी प्रक्रिया में जैसे आयु सीमा, शैक्षणिक योग्यता, प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा या साक्षात्कार किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ नहीं लिया और उसके अंक सामान्य वर्ग के बराबर हैं, तो उसे जनरल कैटेगरी की सीट दी जा सकती है।

दूसरा फैसला क्यों अलग लगता है?
दूसरे मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि उम्मीदवार ने परीक्षा की किसी भी अवस्था में आरक्षण का लाभ लिया है, भले ही अंतिम परीक्षा में उसके अंक सामान्य वर्ग के बराबर हों, उसे जनरल सीट का हकदार नहीं माना जाएगा। परीक्षा एक सतत प्रक्रिया है और किसी भी चरण में लिया गया आरक्षण लाभ पूरे चयन पर प्रभाव डालता है।

टीना डाबी केस से क्या सीख?
आईएएस टॉपर टीना डाबी के मामले में भी यही सिद्धांत लागू हुआ था। उन्होंने सभी श्रेणियों में टॉप किया, लेकिन चूंकि प्रारंभिक परीक्षा आरक्षित श्रेणी में पास की थी, इसलिए उन्हें आरक्षित वर्ग में ही गिना गया।

Related Articles