मैनपुरी/इटावा, । उत्तर प्रदेश में जातीय तनाव से जुड़े मामलों ने एक बार फिर से राजनीति और समाज को झकझोर दिया है। ताजा घटनाक्रम में मैनपुरी के एक गांव में दलित दंपति ने आरोप लगाया है कि गांव के ही विजेंद्र यादव नामक व्यक्ति ने पहले उन्हें पीटा और फिर मूत्र पिलाने का अमानवीय कृत्य किया। पीड़ितों के अनुसार, यह हमला किसी पुराने विवाद को लेकर हुआ और जातीय अपमान की मंशा इसमें स्पष्ट थी।
इससे पहले इटावा जिले में कथावाचक मुकुटमणि यादव ने आरोप लगाया था कि कथा के दौरान कुछ ब्राह्मणों ने उनके ऊपर मूत्र छिड़का, लेकिन पुलिस जांच में यह आरोप झूठा और मनगढ़ंत निकला। इसके बावजूद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मुकुटमणि को लखनऊ बुलाकर सम्मानित किया, जिससे यह मामला और अधिक राजनीतिक रंग ले बैठा।
जातीय आरोपों का राजनीतिक लाभ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी द्वारा मुकुटमणि यादव को सम्मानित करना एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश थी, लेकिन अब जब खुद यादव समुदाय पर ही दलितों के उत्पीड़न का आरोप लगा है, तो स्थिति दोहरे मापदंड जैसी प्रतीत हो रही है।
विपक्षी दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। एक भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि”जहाँ एक ओर समाजवादी पार्टी यादवों को उत्पीड़ित बताकर प्रचार करती है, वहीं मैनपुरी जैसे मामलों पर चुप्पी साध लेती है। क्या दलितों के साथ अन्याय पर भी उतनी ही संवेदना दिखाई जाएगी?”
पुलिस जांच और प्रशासन की प्रतिक्रिया
मैनपुरी पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और आरोपी विजेंद्र यादव से पूछताछ की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि दलित दंपति को सुरक्षा मुहैया कराई गई है और मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है। वहीं इटावा प्रकरण में जांच के बाद मुकुटमणि यादव के आरोप निराधार पाए गए थे, लेकिन अब तक उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, जिससे जातिगत राजनीति पर सवाल उठने लगे हैं।
निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश में जातीय आरोपों की आड़ में राजनीति करने का चलन अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच रहा है। जहाँ एक ओर दलितों को लेकर सहानुभूति की बात होती है, वहीं दूसरी ओर एक ही राजनीतिक दल जब एक जाति के आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है और दूसरी जाति के पीड़ितों की अनदेखी करता है, तो सामाजिक न्याय केवल एक राजनीतिक जुमला बनकर रह जाता है।
जातीय आरोपों की राजनीति: इटावा के बाद अब मैनपुरी में यादव समुदाय पर गंभीर आरोप
