भोपाल । मध्यप्रदेश में इस वर्ष रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन और सरकारी खरीदी के दावों के बीच एक बड़ा प्रशासनिक सवाल सामने आया है—क्या डिजिटल स्लॉट व्यवस्था किसानों के लिए सुविधा बन रही है या नई परेशानी? भोपाल जिले में हजारों किसान ऐसे हैं जो पंजीयन कराने के बावजूद अपनी उपज बेचने से वंचित हो सकते हैं, क्योंकि उनका स्लॉट बुक नहीं हो पाया।
पंजीयन हुआ, लेकिन बिक्री का मौका नहीं मिला
भोपाल जिले में इस सीजन में कुल 37,407 किसानों ने सरकारी समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने के लिए पंजीयन कराया था। इनमें से 34,988 किसानों के स्लॉट बुक हो सके, जबकि 2,419 किसान अब भी प्रतीक्षा में हैं। समस्या यह है कि केंद्र सरकार द्वारा रिकॉर्ड खरीदी के चलते ई-उपार्जन पोर्टल बंद कर दिया गया, जिसके बाद नए स्लॉट जारी नहीं हो सके।
स्थिति इसलिए गंभीर हो गई है क्योंकि सरकार ने खरीदी की अंतिम तिथि 23 मई से बढ़ाकर 28 मई तो कर दी, लेकिन जिन किसानों के स्लॉट नहीं बने, वे तकनीकी रूप से अभी भी व्यवस्था से बाहर हैं। यानी तारीख बढ़ने का लाभ केवल उन्हीं किसानों को मिलेगा जिनके पास पहले से स्लॉट मौजूद हैं।
लक्ष्य लगभग पूरा, लेकिन कुछ किसान बाहर
जिले में अब तक लगभग 3.33 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा जा चुका है, जबकि इस बार लक्ष्य करीब 3.5 लाख मीट्रिक टन का रखा गया था। प्रशासन के अनुसार 33,494 किसान अपनी उपज बेच चुके हैं और करीब 692 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया जा चुका है।
यह आंकड़े सरकारी स्तर पर सफलता की तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ हजारों किसान ऐसे हैं जिनके लिए पूरी प्रक्रिया अधूरी रह गई। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जब खरीदी लक्ष्य के करीब पहुंच जाती है, तब तकनीकी और लॉजिस्टिक दबाव छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा पड़ता है।
डिजिटल सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौती: समय
ई-उपार्जन प्रणाली का उद्देश्य पारदर्शिता और बिचौलियों पर नियंत्रण था, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, समय प्रबंधन और तकनीकी जानकारी की कमी अब भी बड़ी बाधा बनी हुई है। कई किसान समय पर स्लॉट नहीं ले सके क्योंकि गांवों में नेटवर्क समस्या, सर्वर स्लो होने और पोर्टल बंद होने जैसी दिक्कतें सामने आईं।
कुछ किसानों ने निजी कारणों से भी निर्धारित स्लॉट से पहले ही मंडियों में गेहूं बेच दिया। जिले में ऐसी चर्चा है कि जिन किसानों को स्लॉट मिला है, उनकी जगह दूसरे किसान “आपसी तालमेल” से उपज बेचने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि प्रशासन ने ऐसी व्यवस्था को आधिकारिक मंजूरी नहीं दी है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
मध्यप्रदेश लंबे समय से देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों में शामिल रहा है। सरकार के लिए रिकॉर्ड खरीदी राजनीतिक और आर्थिक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन यदि हजारों किसान समर्थन मूल्य से वंचित रह जाते हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण आय पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे और सीमांत किसान निजी व्यापारियों को कम दाम पर फसल बेचने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता है।
आगे क्या होना चाहिए?
कृषि नीति से जुड़े जानकार मानते हैं कि भविष्य में केवल पोर्टल आधारित स्लॉट व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए:
रियल-टाइम स्लॉट अपडेट,
अतिरिक्त खरीदी दिवस,
ऑफलाइन सहायता केंद्र,
पंचायत स्तर पर तकनीकी सहयोग,
और आकस्मिक किसानों के लिए “वेटिंग स्लॉट” जैसी व्यवस्था जरूरी होगी।
यदि रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद किसान अपनी उपज नहीं बेच पाए, तो यह कृषि प्रबंधन की सफलता नहीं बल्कि वितरण तंत्र की कमजोरी मानी जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की कृषि व्यवस्था उत्पादन बढ़ाने की गति से किसानों के लिए व्यवस्थागत सुविधाएं भी विकसित कर पा रही है, या नहीं।
इस संबंध में चंद्रभान सिंह जादौन ने कहा कि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार गेहूं खरीदी अधिक हुई है और उपार्जन केंद्रों की लगातार निगरानी की जा रही है।
रिकॉर्ड गेहूं खरीदी के बीच भोपाल के 2419 किसान संकट में, स्लॉट सिस्टम ने बढ़ाई चिंता
