मातुआ समाज को ‘घुसपैठिया’ कहना भारत की आत्मा पर हमला

धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया
(विधायक प्रतिनिधि, विधानसभा क्षेत्र क्रं-१३, गोहद)

भिंड / कोलकाता |  पश्चिम बंगाल में मातुआ समाज को लेकर चल रही बयानबाज़ी अब राजनीतिक विवाद से आगे बढ़कर राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सम्मान और ऐतिहासिक सच्चाई का प्रश्न बन गई है। सामाजिक और बौद्धिक वर्गों का कहना है कि मातुआ समाज भारत की उतनी ही संतान है जितना कोई भी अन्य नागरिक, और उन्हें घुसपैठिया कहना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यह 1947 के विभाजन जैसी सोच को पुनर्जीवित करने वाला खतरनाक संकेत है।
मातुआ समाज वह समुदाय है जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आया और दशकों से देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहा है।
“हाथ में काम और मुख में नाम” की परंपरा निभाने वाला यह समाज कभी भी भारत के लिए बोझ नहीं रहा, बल्कि सनातन परंपरा का शांत और कर्मशील वाहक रहा है।
दलित नेतृत्व के नाम पर विभाजन की भाषा पर सवाल
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब दलित नेतृत्व से जुड़े कुछ बयानों को समाज को बाँटने वाला बताया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शरणार्थी और घुसपैठिए के बीच फर्क न कर पाना एक गंभीर वैचारिक समस्या है, जो सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुँचा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी भाषा न केवल मातुआ समाज का अपमान है, बल्कि यह देश के शरणार्थी इतिहास और नैतिक मूल्यों के भी विरुद्ध है।
प्रदेश अध्यक्ष का बयान बना संगठन के लिए असहज स्थिति
इस विवाद के बीच पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य का यह बयान भी चर्चा में रहा कि “लाल सिंह आर्य जैसे नेताओं को बंगाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाना सही नहीं है।”
राजनीतिक हलकों में इसे संगठन की अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है कि संबंधित बयान से पार्टी और समाज दोनों को नुकसान पहुँचा है।
भिंड जिले के नाम पर भी उठे सवाल
इस पूरे विवाद का असर मध्य प्रदेश के भिंड जिले तक पहुँचा है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि ऐसे बयानों से राष्ट्रवादी स्वाभिमान की भूमि कहे जाने वाले भिंड का नाम राष्ट्रीय मंचों पर अनावश्यक विवादों से जुड़ रहा है।
उनका कहना है कि भिंड की परंपरा हमेशा एकता, साहस और राष्ट्रभाव की रही है, न कि विभाजन की भाषा की।
केंद्रीय नेतृत्व से कार्रवाई की मांग
सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर यह मांग तेज़ हो रही है कि—
समाज को बाँटने वाले बयानों पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया जाए
मातुआ समाज को लेकर सम्मानजनक और संवेदनशील नीति सार्वजनिक की जाए
ऐसे नेताओं की भूमिका की समीक्षा हो जो जमीनी स्तर पर अस्वीकार्य हो चुके हैं
अंत में यह संदेश दिया गया कि मातुआ समाज कोई वोट बैंक नहीं, बल्कि भारत के इतिहास और संस्कृति की जीवित विरासत है।
जो राजनीति अपने ही समाज को संदेह की दृष्टि से देखे, वह देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बन सकती है।
    

Exit mobile version