संजीव चतुर्वेदी मामला, न्याय व्यवस्था और व्हिसलब्लोअर्स पर उठते सवाल
परिचय
भारत की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा एक मामला लंबे समय से चर्चा में है, जिसमें 16 न्यायाधीशों द्वारा एक ही केस की सुनवाई से अलग हो जाना असाधारण घटना मानी जा रही है। यह मामला है भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी का—एक ऐसे अफसर का नाम, जो ईमानदारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और लगातार ट्रांसफर के लिए जाना जाता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह घटनाक्रम न केवल एक व्यक्ति के संघर्ष की कहानी है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या मौजूदा व्यवस्था व्हिसलब्लोअर्स को पर्याप्त न्याय दे पा रही है?
कौन हैं संजीव चतुर्वेदी?
संजीव चतुर्वेदी ने वर्ष 2002 में भारतीय वन सेवा जॉइन की। शुरुआती पोस्टिंग के दौरान ही उन्होंने अवैध पेड़ कटाई, वन्यजीव शिकार, वन भूमि पर अतिक्रमण, नेताओं और बिल्डरों की कथित संलिप्तता जैसे मामलों को उजागर किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन गतिविधियों में जूनियर से लेकर सीनियर स्तर तक के अधिकारी शामिल थे।
हरियाणा से शुरू हुआ टकराव
हरियाणा में रहते हुए संजीव चतुर्वेदी द्वारा उजागर किए गए कथित घोटालों के बाद हालात इतने संवेदनशील हो गए कि भारत के राष्ट्रपति को छह बार हस्तक्षेप करना पड़ा, ताकि उनके खिलाफ विभागीय दंडात्मक कार्रवाई न हो सके। यह तथ्य अपने आप में इस केस की गंभीरता को दर्शाता है।
AIIMS दिल्ली में विजिलेंस प्रमुख और बड़े खुलासे
वर्ष 2012 में उन्हें AIIMS, नई दिल्ली का चीफ विजिलेंस ऑफिसर (CVO) नियुक्त किया गया। यहां उनके कार्यकाल के दौरान सामने आए कथित अनियमितताओं में शामिल थे, मेडिकल उपकरणों की खरीद में गड़बड़ी भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितता फर्जी कंपनियां बढ़े-चढ़े बिल और रिश्वत के आरोप।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन खुलासों से कई प्रभावशाली लोग असहज हुए, जिनमें तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री तक का नाम चर्चा में आया।
इसके बाद शुरू हुई कार्रवाई
इन खुलासों के बाद संजीव चतुर्वेदी को कथित तौर पर 12 से अधिक बार ट्रांसफर किया गया, बिना जांच के जुर्माना लगाया गया। CVO पद से हटाया गया और उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में शून्य (0) ग्रेड दिया गया। यह वही अधिकारी हैं जिन्हें ईमानदारी के लिए रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
उत्तराखंड में भी जारी रहा संघर्ष
उत्तराखंड में रहते हुए उन्होंने, मसूरी, कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़े कथित घोटालों को उजागर किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, हर बार सच्चाई सामने लाने की कीमत उन्हें और महंगी पड़ी।
अदालत पहुंचे तो क्या हुआ?
सबसे अहम मोड़ तब आया जब संजीव चतुर्वेदी न्याय के लिए अदालत पहुंचे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 15 से 16 न्यायाधीशों ने केस की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया.। कई जजों ने हितों के टकराव का हवाला दिया। कुछ ने निजी संबंधों का और कुछ ने कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया, इनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के नाम भी रिपोर्ट्स में सामने आए।
उठते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्या जजों को इतने बड़े मामलों में आसानी से अलग हो जाना चाहिए? जब मामला प्रभावशाली लोगों से जुड़ा हो, तो न्याय का रास्ता कितना मुश्किल हो जाता है?क्या मौजूदा व्यवस्था व्हिसलब्लोअर्स को हतोत्साहित करती है?
निष्कर्ष
संजीव चतुर्वेदी का मामला केवल एक अफसर की लड़ाई नहीं, बल्कि यह भ्रष्टाचार, सत्ता, न्याय और व्यवस्था के बीच जटिल रिश्तों को उजागर करता है। यह तय करना समाज और व्यवस्था दोनों की जिम्मेदारी है कि ईमानदारी को सज़ा नहीं, सुरक्षा और सम्मान मिले।
नोट : यह लेख मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों पर आधारित है। लेखक/प्रस्तुतकर्ता द्वारा तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि का दावा नहीं किया जाता।
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