यूपी का मामला : पति को छोड़ा, फिर शादीशुदा युवक के साथ ‘लिव-इन, वापस पति के साथ रहने की पुलिस से लगाई गुहार

उत्तर प्रदेश से सामने आया एक मामला इन दिनों पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारियों और व्यक्तिगत पसंद (Choice) को लेकर नई बहस छेड़ रहा है। एक शादीशुदा महिला ने पहले अपने पति को छोड़ा और इसके बाद एक दूसरे शादीशुदा युवक के साथ लिव-इन जैसी व्यवस्था में रहने का फैसला कर लिया। खास बात यह है कि दोनों के पहले से वैवाहिक रिश्ते और बच्चे मौजूद हैं, इसके बावजूद उन्होंने परिवार और समाज की परवाह किए बिना साथ रहने का निर्णय लिया।
पहले पति से अलगाव, फिर दूसरा रिश्ता
जानकारी के अनुसार, महिला का अपने पहले पति से वैवाहिक विवाद चल रहा था। इसी दौरान उसका संपर्क एक शादीशुदा युवक से हुआ। बातचीत बढ़ी और दोनों ने अपने-अपने परिवारों से अलग होकर साथ रहने का फैसला कर लिया। इस रिश्ते को उन्होंने विवाह जैसा ही दर्जा दिया, हालांकि इसे कानूनी रूप से विवाह नहीं कहा जा सकता। परिवार वालों का आरोप है कि इस फैसले में बच्चों के भविष्य, सामाजिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक मर्यादाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
मामला पहुंचा पुलिस तक
इस घटनाक्रम के बाद विवाद बढ़ता गया और अंततः मामला पुलिस तक पहुंच गया। हालांकि अब तक किसी गंभीर आपराधिक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन दोनों परिवारों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। पुलिस मामले को पारिवारिक विवाद मानते हुए कानूनी पहलुओं की जांच कर रही है।
पुरुष और महिला के लिए अलग-अलग नजरिया?
यह मामला केवल कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच पर भी सवाल खड़े करता है। समाज में अक्सर देखा जाता है कि जब पुरुष इस तरह का कदम उठाता है, तो उसे चरित्रहीन, भटका हुआ और घर तोड़ने वाला कहा जाता है। लेकिन जब महिला ऐसा करती है, तो इसे choice, bravery और self-discovery के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस दोहरे मापदंड पर अब खुले तौर पर सवाल उठने लगे हैं।
बच्चों और पहले पति की स्थिति पर चुप्पी
इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा अनदेखी बच्चों के भविष्य और पहले पति की मानसिक व कानूनी स्थिति की हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल वयस्कों की पसंद नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकार और मानसिक स्वास्थ्य भी अहम मुद्दा होना चाहिए।
‘Choice’ के नाम पर हर सवाल गलत?
आज के समय में “choice” शब्द इतना प्रभावशाली हो गया है कि उस पर सवाल उठाना ही गलत माना जाने लगा है। लेकिन यह मामला सोचने पर मजबूर करता है कि
क्या व्यक्तिगत पसंद के नाम पर हर सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा जा सकता है? उत्तर प्रदेश का यह मामला कानून, समाज और नैतिकता—तीनों के बीच एक जटिल बहस बन चुका है, जिसका जवाब आसान नहीं है।



