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सनातन धर्म की प्राचीनता, शक्ति और आत्मविश्वास: आत्मालोचना से आत्मबोध तक

आज के समय में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है कि सनातन धर्म को बदनाम करने का काम बाहरी आलोचकों से अधिक, अपने ही धर्म के कुछ अनुयायी कर रहे हैं। वैचारिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब वही असहमति उपहास, आत्महीनता और परंपराओं के否करण में बदल जाए, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सनातन केवल एक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति, जीवन और समय के साथ सह-अस्तित्व का दर्शन है जिसकी जड़ें इतिहास, शिलालेखों और पंचांग-कालगणना तक फैली हुई हैं।

शिलालेख, इतिहास और सनातन की वैश्विक छाप

दुनिया के विभिन्न देशों में मिले प्राचीन शिलालेख, प्रतीक और पुरातात्विक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि मानव सभ्यता के आरंभिक चरणों में अग्नि, सूर्य, जल, पृथ्वी, पवन और पर्वत जैसी प्राकृतिक शक्तियों की उपासना व्यापक थी। यही तत्व सनातन दर्शन के मूल स्तंभ हैं। इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि समय और भू-क्षेत्र के अनुसार पंथ विकसित होते गए, और आगे चलकर उन्हें अलग-अलग धर्मों के रूप में पहचान मिली। किंतु प्रकृति-पूजा, ऋतुचक्र, आकाशीय गणना और पंचतत्व की अवधारणा ये सभी सनातन परंपरा से गहराई से जुड़ी रही हैं।

पंचांग और कालगणना: सनातन की वैज्ञानिकता

सनातन पंचांग केवल धार्मिक अनुष्ठानों का कैलेंडर नहीं है, बल्कि खगोल, गणित और ऋतु-विज्ञान का समन्वय है। तिथि, नक्षत्र, योग, करण—ये सभी समय की सूक्ष्म गणना को दर्शाते हैं। विभिन्न सभ्यताओं के कैलेंडरों से तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि सनातन की कालगणना अत्यंत प्राचीन और व्यवस्थित है। यही कारण है कि इसे विश्व की सबसे पुरानी जीवंत परंपराओं में गिना जाता है।
प्रकृति-पूजा और सर्वसमावेशी दृष्टि

सनातन की विशेषता यह है कि वह हर उस जीव और तत्व का सम्मान करता है जो प्रकृति से जुड़ा है। वृक्ष, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी—सबको पूज्य मानने की परंपरा केवल आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का संदेश भी है। देव-देवताओं की उपासना के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा का भाव सनातन को समग्र जीवन-दर्शन बनाता है।

आत्मालोचना या आत्म-अपमान?

आज कुछ लोग, जो स्वयं को सनातन परंपरा का हिस्सा मानते हैं, अपने ही धर्म की निरंतर निंदा करते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह नहीं कि आलोचना हो या न हो—प्रश्न यह है कि क्या आलोचना रचनात्मक है या आत्म-अपमान?
सनातन में विचार-विमर्श, प्रश्न और तर्क की परंपरा रही है। उपनिषदों से लेकर शास्त्रार्थ तक, संवाद इसका मूल है। लेकिन उपहास और अवमानना इस परंपरा के विपरीत हैं।

हिमालय की तपस्या: आस्था की जीवंत मिसाल

हाल ही में हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों से सामने आया एक दृश्य लोगों को सोचने पर मजबूर करता है। जहां सामान्य व्यक्ति हल्की ठंड में भी घर से निकलना टाल देता है, वहीं माइनस 60 डिग्री तापमान में, बर्फ से घिरे निर्जन क्षेत्र में एक अघोरी साधु बिना वस्त्रों के, एक हाथ पर संतुलन बनाए तपस्या में लीन दिखाई देता है। यह तपस्या किसी प्रदर्शन का नाम नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और आत्मबल का चरम उदाहरण है। यह दृश्य बताता है कि सनातन में वह शक्ति है जो मनुष्य को असंभव परिस्थितियों में भी स्थिर रखती है।

क्या यह केवल आस्था है या साधना की शक्ति?

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि ऐसी कठोर तपस्या क्या केवल शारीरिक क्षमता से संभव है? उत्तर है—नहीं। इसके पीछे दीर्घ साधना, मानसिक अनुशासन और ईश्वर पर अटूट विश्वास है। सनातन की साधना परंपरा मनुष्य को अंतर्यात्रा की ओर ले जाती है, जहां शरीर से अधिक मन और चेतना महत्वपूर्ण हो जाती है।


सनातन की श्रेष्ठता का अर्थ

सनातन की श्रेष्ठता किसी अन्य परंपरा को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि अपने मूल्यों पर दृढ़ रहने में है। यह प्रकृति-सम्मत है। यह काल-परीक्षित है। यह संवाद और सह-अस्तित्व सिखाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आत्महीन आलोचना से ऊपर उठकर आत्मबोध करें। सनातन को समझना, जीना और सम्मान देना, यही इसकी सच्ची साधना है। जब आस्था ज्ञान से जुड़ती है, तब सनातन केवल धर्म नहीं, जीवन का शाश्वत मार्ग बन जाता है।

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