(गोविंद सिंह राजपूत*)
*कुलं पवित्रं जननी कृतार्थाः वसुंधरा पुण्यवतीं च तेन।*
*अपार संवित सुख सागर, अस्मिन्न लीन ब्रम्हाणि यस्य चेतः ।।*
अर्थात् जिसका चित परब्रम्ह परमात्मा में लीन हो गया, जिसका ज्ञान आनंद सागर के सदृश अपार है, ऐसे महापुरूष के जन्म से उसका कुल पवित्र हो जाता है। जन्म देने वाली मां कृतार्थ हो जाती है और उसके चरण टिकने से पृथ्वी पुण्यवती हो जाती है।
दैवी संपदा से संपन्न ऐसे महापुरूष डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के प्रसिद्ध और महान शिक्षाविद् सर आशुतोष मुखर्जी और धर्मपत्नी जोगमाया के यहां द्वितीय पुत्र के स्वरूप में हुआ। पिता श्री सर आशुतोष मुखर्जी ने प्रथम पुत्र रामप्रसाद को पढ़ाई कानून के क्षेत्र में करवाई, वहीं दूसरी और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाया। सर आशुतोष मुखर्जी को बंगाल टाइगर के नाम से भी जाना जाता था। डॉ. श्यामाप्रसाद जी ने कलकत्ता विवि. में शानदार शैक्षणिक रिकार्ड बनाया और वह इंडियन बार के सदस्य बने। 33 साल की कम उम्र में वह कलकत्ता वि.वि. के उप कुलपति (वाइस चांसलर) बने। उन्होंने भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित किया और 1937 में गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर को वि.वि.के दीक्षांत समारोह में बांग्ला भाषा में संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया। पराधीन भारत में भारतीय भाषा में संभवतः यह पहला संबोधन था। 1935 में अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के तहत प्रांतीय सरकार का ढोंग किया गया। फलस्वरूप कलकत्ता में मुस्लिम लीग की सरकार बनी। ऐसे में हिंदू हित की रक्षा हेतु डॉ० श्यामा प्रसाद उपकुलपति पद छोड़कर राजनीति में आये। डॉ० मुखर्जी के प्रेरणास्रोत रहे स्वामी प्रणवानंद जी एवं अखिल भारतीय हिंदू महासभा के नेता वीर सावरकर। डॉ० मुखर्जी 1939 में हिंदू महासभा में शामिल हो गए। डॉ० मुखर्जी के राष्ट्रवादी तौर-तरीकों से महात्मा गाँधी बहुत प्रसन्न थे। महात्मा गाँधी ने कहा पंडित मदन मोहन मालवीय के बाद हिंदुओं के नेतृत्व करने के लिए आपकी आवश्यकता है, इस पर डॉ० मुखर्जी ने कहा कि आप तो मुझे साम्प्रदायिक कहेंगे। गाँधी जी ने उत्तर में कहा, समुद्र मंथन के बाद जिस तरह शिवजी ने विषपान किया था उसी तरह भारतीय राजनीति के विष को पीने के लिए किसी को होना चाहिए। गाँधी जी के आग्रह पर वह आजादी के बाद गठित राष्ट्रीय सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। लॉर्ड माउंटबेटन के षड्यंत्र के तहत भारत विभाजन हुआ। हिंदु बहुल बंगाल को पाकिस्तान में शामिल किए जाने का डॉ० मुखर्जी ने पुरजोर विरोध किया। फलस्वरूप बंगाल के हिंदू बहुल इलाके को भारत के साथ रहने में अग्रणी भूमिका निभाई। इसी बात को लेकर विश्वनेता यशस्वी प्रधान मंत्री श्री 3rd नरेन्द्र मोदी जी ने कलकत्ता की पुण्य वसुंधरा पर अपने संबोधन में उल्लेख किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने डॉ० मुखर्जी की प्रशंसा की। रियासतों के भारत में विलीनीकरण के मुद्दे पर वह सरदार पटेल के साथ रहे। इसीलिए वह प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू से असहमत रहे और मंत्रीमंडल से अलग हो गए। तत्पश्चात् कुख्यात लियाकत अली पैक्ट हुआ जिसे लेकर डॉ. मुखर्जी ने इसे नेहरू जी की नादानी बताते हुए मंत्रीमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इसके पश्चात् वह बिना किसी संगठन के क्रियाशील रहे। डॉ. मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी गोलवलकर जी से मिले। गुरुजी ने उन्हें एक पार्टी बनाने के लिए कहा। फलस्वरूप 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली के आर्य कन्या विद्यालय में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। जो आज भारतीय जनता पार्टी के स्वरूप में विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक दल के रूप में विश्व का नेतृत्व कर रहा हैं। 1951-1952 में प्रथम आम चुनाव हुआ और भारतीय जनसंघ को 3 सीटें मिलीं। नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दुरभिसंधि के चलते जम्मू-कश्मीर के दो प्रधान, दो विधान, दो निशान के कुत्सित षड्यंत्र को समूल नष्ट करने में उन्होंने राष्ट्र की एकता अखंडता को अक्षुण्ण रखने हेतु 23 जून को सुबह 4 बजे अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। ऐसे वीर बलिदानी की रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई, उनकी शहादत को लेकर न कोई जाँच कमेटी बनी न ही कि जम्मू-कश्मीर के किसी अधिकारी तक को दंडित किया गया। राष्ट्र की एकता को लेकर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले प्रथम वीर बलिदानी को शत्-शत् नमन।
(*लेखक मप्र सरकार में खाद्य मंत्री हैं*)