हिंदुत्व, सोशल मीडिया और ब्राह्मण समाज पर उठते सवाल
पिछले दस–पंद्रह वर्षों में भारतीय सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में एक दिलचस्प और विरोधाभासी बदलाव देखने को मिला है। एक ओर ब्राह्मण समाज के भीतर उदारवादी सोच का विस्तार हुआ है, तो दूसरी ओर पिछड़े और दलित वर्गों में राजनीतिक गोलबंदी और पहचान-आधारित एकजुटता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। यह परिवर्तन केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया और वैचारिक प्रचार के माध्यम से समाज के भीतर गहराई तक पैठ बना चुका है।
आलोचकों का तर्क है कि इस दौर में हिंदुत्व के नाम पर सबसे अधिक वैचारिक ‘ब्रेनवॉश’ हिंदी भाषी ब्राह्मण समाज का हुआ है। सोशल मीडिया विशेषकर व्हाट्सएप पर हर सुबह फर्जी या भ्रामक संदेशों के फॉरवर्ड ने कथित राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नाम पर एकतरफा धारणाएँ गढ़ीं। विडंबना यह रही कि कई बार इन संदेशों को साझा करने वाले यह समझ ही नहीं पाए कि वे कब राजनीतिक प्रचार के औज़ार बन गए।
इसी संदर्भ में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरुद्ध चलने वाला ऑनलाइन आक्रोश उल्लेखनीय है। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों में ब्राह्मण हैंडल्स और इंफ्लुएंसर्स की सक्रियता पर सवाल उठते रहे हैं। यह बहस केवल किसी एक नेता के समर्थन या विरोध की नहीं, बल्कि राजनीतिक असहमति के सभ्य तरीकों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की है। यह भी एक कड़वा सत्य है कि पहचान की राजनीति ने संवाद को ध्रुवीकृत किया है। जहां पिछड़े और दलित वर्गों ने संगठन और प्रतिनिधित्व को अपनी ताकत बनाया, वहीं ब्राह्मण समाज का एक हिस्सा वैचारिक विविधता के बावजूद डिजिटल प्रचार के शोर में अपनी स्वतंत्र सोच खोता दिखा। परिणामस्वरूप, तथ्यों की जगह भावनात्मक नारों ने ले ली।
समाधान किसी समुदाय को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि आलोचनात्मक सोच, मीडिया साक्षरता और तथ्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा देने में है। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा जब असहमति सम्मानजनक, आलोचना तथ्यपरक और राजनीतिक भागीदारी विवेकपूर्ण होगी, चाहे वह किसी भी समुदाय से क्यों न आए।
उदारता बनाम गोलबंदी: बदलती सामाजिक-राजनीतिक धारणाओं का आईना
