सच्चे प्रेम की मिसाल : अभिमन्यु और श्रेया की प्रेरक प्रेम कहानी

झारखंड की राजधानी रांची के कांके रोड के निवासी हैं – अभिमन्यु और श्रेया। आज इन दोनों का नाम सच्चे प्रेम, समर्पण और त्याग की अद्भुत मिसाल के रूप में लिया जाता है।

कहानी लगभग 22–23 साल पुरानी है। उस समय अभिमन्यु एक कॉलेज में पढ़ने वाले युवा थे और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात अपनी भाभी की छोटी बहन श्रेया से हुई। धीरे-धीरे बातचीत दोस्ती में बदली और वही दोस्ती कब प्रेम में बदल गई, दोनों को पता ही नहीं चला।

जब दोनों के रिश्ते की जानकारी परिवार वालों को मिली, तो उन्होंने इस रिश्ते को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। दोनों परिवारों की सहमति से शादी तय हो गई। यह साल था 2004 – और उन दिनों दोनों के लिए जीवन का सबसे सुनहरा दौर चल रहा था। घर में शादी की तैयारियां जोरों पर थीं, खरीददारी हो रही थी, खुशियों का माहौल था।

लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।

एक शाम अभिमन्यु, उनके माता-पिता, बहन और श्रेया दिल्ली से मथुरा जा रहे थे। रास्ते में ड्राइवर को झपकी आ गई और गाड़ी भयानक दुर्घटना का शिकार हो गई। इस दर्दनाक हादसे में मौके पर ही अभिमन्यु के माता-पिता और बहन की मौत हो गई।

अभिमन्यु की आँख सीधे अस्पताल में खुली। होश में आने पर उन्हें पता चला कि उनकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है और वे कमर से नीचे पूरी तरह अपाहिज हो चुके हैं। जिंदगी तो बच गई, लेकिन शरीर जीवन भर के लिए साथ छोड़ चुका था।

श्रेया के लिए यह हादसा किसी वज्रपात से कम नहीं था। एक ही पल में होने वाले सास-ससुर और ननद को खो दिया, और जिस जीवनसाथी के साथ नए जीवन के सपने देखे थे, वह हमेशा के लिए बिस्तर पर आ गया।

अपनी हालत देखकर अभिमन्यु ने श्रेया से कहा “तुम कहीं और शादी कर लो। अब मैं तुम्हारे लायक नहीं रहा। मैं सिर्फ एक जिंदा बोझ बन चुका हूँ। तुम्हें मुझसे बेहतर लड़का मिल जाएगा।”

लेकिन श्रेया का जवाब सच्चे प्रेम की परिभाषा बन गया “आप भले ही जीवन भर व्हीलचेयर पर रहें, लेकिन शादी तो मैं आपसे ही करूँगी।” श्रेया के परिवार वालों ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी। उनका एक ही जवाब था “मुझे अभिमन्यु से प्रेम है… उसके शरीर से नहीं, उसकी आत्मा से।” और आखिरकार प्रेम की जीत हुई। तमाम मुश्किलों के बावजूद वर्ष 2010 में अभिमन्यु और श्रेया विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए।

शादी के बाद श्रेया ने एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका की नौकरी शुरू की। उन्होंने न केवल घर संभाला, बल्कि पूरे समर्पण के साथ अभिमन्यु की देखभाल भी की। साल 2019 में आईवीएफ तकनीक के जरिए इस दंपति को जुड़वा बच्चों का सुख प्राप्त हुआ।

आज श्रेया एक आदर्श पत्नी, माँ और शिक्षिका की भूमिका पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। उनके चेहरे पर संतोष, आत्मविश्वास और प्रेम की चमक साफ दिखाई देती है। अभिमन्यु के प्रति उनका समर्पण इस बात का प्रमाण है कि सच्चा प्रेम कभी परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता।

भौतिकवाद से भरे इस दौर में जहाँ रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर टूट जाते हैं, वहाँ श्रेया जैसी महिलाएँ सचमुच अपवाद हैं—एक प्रेरणा हैं, एक आदर्श हैं।

ऐसी महान प्रेमगाथा को दिल से नमन।

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