Gen Z ट्रेंड और ‘भाभी कल्चर’ पर बहस: नए वर्ष के आगाज के साथ महिलाओं ने खूम छलकाए जाम ओर पब क्लब में खूब थिरकीं 


सोशल मीडिया और शहरी जीवनशैली में इन दिनों एक नई बहस तेज़ हो गई है। चर्चा का केंद्र हैं तथाकथित “Gen Z कल्चर” और उससे जुड़ती दिखाई दे रही विवाहित महिलाएं, जिन्हें आम बोलचाल में “भाभियां” कहा जा रहा है। पब, बार और क्लबों में शराब पार्टी, सोशल ग्रुप्स और टूर प्रोग्राम—इन सबको लेकर समाज में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह महिला-पुरुष समानता का प्रतीक है या भारतीय संस्कृति और संस्कारों से विचलन।

“भाभियां भी Gen Z से कम नहीं” वाली सोच

शहरों खासकर दिल्ली की पॉश कॉलोनियों और सोसाइटियों में यह धारणा तेजी से फैल रही है कि अब भाभियां भी Gen Z युवाओं से कम नहीं रहीं। पब, बार और क्लबों में शराब पार्टी करना, ग्रुप बनाकर देर रात तक एन्जॉय करना—इसे कुछ लोग महिला सशक्तिकरण और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ रहे हैं। समर्थकों का तर्क है कि इससे होटल, बार और टूरिज्म इंडस्ट्री को लाभ होता है और अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
समानता के नाम पर सवाल

महिला-पुरुष समानता की बात जब कंधे से कंधा मिलाकर चलने तक पहुंची है, तो सवाल उठाया जा रहा है कि महिलाएं इन गतिविधियों में पीछे क्यों रहें। आज की महिलाएं शिक्षा, करियर और सामाजिक जीवन में पुरुषों को टक्कर दे रही हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि समानता का अर्थ हर उस आदत को अपनाना नहीं हो सकता, जिसे समाज लंबे समय से अनुचित मानता आया है।


भारतीय संस्कृति बनाम आधुनिक ट्रेंड

आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखने वाले वर्ग का मानना है कि भारतीय संस्कृति, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों में इस तरह के कृत्यों को कभी स्वीकार नहीं किया गया। उनके अनुसार, यह केवल महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला विषय है। इसी सोच के तहत कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि इस स्थिति के लिए केवल महिलाएं नहीं, बल्कि उनके पति और माता-पिता भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने संस्कारों की दिशा में पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं किया।




धार्मिक यात्राएं और दोहरा जीवन?

दिलचस्प पहलू यह भी है कि ऐसी ही कई महिलाएं अपने अलग-अलग ग्रुप्स के साथ नियमित रूप से गोवर्धन, मथुरा, मेहंदीपुर बालाजी, महाकाल, विभिन्न बाबाओं और कथा वाचकों के आश्रमों में टूर प्रोग्राम भी बनाती हैं। इसे लेकर सवाल उठते हैं कि क्या यह आधुनिकता और धार्मिकता का विरोधाभास है या केवल जीवनशैली का संतुलन।


यह पूरा मुद्दा केवल “भाभी बनाम Gen Z” का नहीं, बल्कि आधुनिकता, समानता, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन का है। समाज में यह बहस आगे भी जारी रहेगी कि आज़ादी और सशक्तिकरण की सीमा कहां तक होनी चाहिए, ताकि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ टकराव न हो।

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