जौहर : एक दर्दनाक इतिहास, जिसे समझने संवेदनशील दृष्टिकोण की जरूरत

Aalekh : डॉ आर एच लता*
किसी भी ऐतिहासिक घटना को आज के चश्मे से देखकर उस पर सरल शब्दों में ‘कायरता’ या ‘डर’ का ठप्पा लगा देना इतिहास के साथ न्याय नहीं है। विशेषकर जब बात राजपूत और भारतीय क्षत्राणी नारियों के जौहर जैसी अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक परंपरा की हो।
अभिनेत्री स्वरा भास्कर द्वारा क्षत्राणियों के जौहर को कायरता और डर से जोड़कर देखना एक ऐसी ऐतिहासिक दृष्टि है, जिस पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। इतिहास से असहमति हर व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन इतिहास की किसी घटना का मूल्यांकन करने से पहले उस दौर की सामाजिक, राजनीतिक और युद्धकालीन परिस्थितियों को भी समझना भी उतना ही आवश्यक है। मध्यकालीन युद्धों का स्वरूप आज के युद्धों से बिल्कुल अलग था। पराजित राज्य की स्त्रियों और बच्चों की सुरक्षा के लिए उस समय कोई आधुनिक कानूनी या तो संस्थागत व्यवस्था नहीं थी। युद्ध में विजय के बाद महिलाओं के अपहरण, दासता, जबरन विवाह और यौन हिंसा का खतरा वास्तविक था। ऐसी परिस्थितियों में कुछ राजपूत समाजों में जब यह स्पष्ट हो जाता था कि दुर्ग की रक्षा अब संभव नहीं है और शत्रु सेना भीतर प्रवेश करने वाली है, तब महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश करने की परंपरा को जौहर कहा गया। पुरुष योद्धा इसके बाद अंतिम युद्ध जिसे साका कहा जाता था, के लिए निकलते थे।
आज की दृष्टि से जौहर एक अत्यंत पीड़ादायक और त्रासद घटना है। किसी भी स्त्री की मृत्यु को महिमा मंडित करना उचित नहीं है। लेकिन इसे केवल ‘कायरता’ कह देना भी उतना ही अनुचित है। ऐसा करना उन परिस्थितियों, भयावह संकट और मानसिक संघर्ष को नजरअंदाज करना होगा, जिनके बीच ऐसे निर्णय लिए गए।

*पद्मिनी से लेकर हजारों अनाम स्त्रियों तक मृत्यु का सामना ?*

रानी पद्मिनी और चित्तौड़ के जौहर की कथा भारतीय लोकस्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। इतिहास में जौहर की घटनाओं के विवरण अलग-अलग स्रोतों में अलग रूप में मिलते हैं और लोककथाओं तथा ऐतिहासिक प्रमाणों के बीच अंतर करना भी आवश्यक है। लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है कि मध्यकालीन भारतीय इतिहास में ऐसी अनेक स्त्रियाँ थीं जिन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं के कारण युद्ध और राजनीतिक संघर्ष की भयानक परिस्थितियों का सामना किया। उनकी कहानी को केवल रोमांटिक बनाने के बजाय हमें उससे यह सीखना चाहिए कि समाज को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें किसी स्त्री को सम्मान और जीवन के बीच चुनाव ही न करना पड़े। इतिहास की उन स्त्रियों को समझने के लिए भावनात्मक नारों के बजाय संवेदनशील ऐतिहासिक दृष्टि की आवश्यकता है। उनकी पीड़ा को समझना भी जरूरी है और उनके साहस तथा मनोबल को स्वीकार करना भी। यदि कोई महिला अपनी मृत्यु को सामने देखकर भी भय के बजाय अपने निर्णय पर अडिग रहती है, तो उसके मनोबल को समझना आवश्यक है।
हम इतिहास के उन अध्यायों को स्वीकार कर सकते हैं या उनसे असहमत हो सकते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि आज के समाज में किसी महिला के सामने ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आनी चाहिए। लेकिन उन महिलाओं को, जिन्होंने अपने समय की भयावह परिस्थितियों में ऐसा निर्णय लिया, केवल डरपोक या कायर कहना उनके ऐतिहासिक संदर्भ और मानसिक साहस दोनों को नज़रअंदाज़ करना है।
इतिहास की घटनाओं को समझने का अर्थ उनका समर्थन करना नहीं होता। इतिहास का अध्ययन इसलिए किया जाता है ताकि हम यह समझ सकें कि उस समय लोगों ने किन परिस्थितियों में कौन से निर्णय लिए और उन निर्णयों के पीछे कौन से सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम कर रहे थे।

*क्षत्राणी की शक्ति केवल तलवार उठाने में नहीं थी :*

उस समय क्षत्राणी की शक्ति केवल तलवार उठाने या युद्धभूमि में उतरने में नहीं थी। वह संकट में धैर्य, आत्मसम्मान, मानसिक दृढ़ता और निर्णय लेने की क्षमता में भी दिखाई देती थी। आज हमें उसी शक्ति की आधुनिक और सकारात्मक व्याख्या करने की आवश्यकता है, जहां स्त्री भय के आगे झुके नहीं, बल्कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता, कानून और अपने अधिकारों की ताकत के साथ अपने जीवन का निर्णय स्वयं ले।
आज जौहर की आवश्यकता या समर्थन की बात करना न तो उचित है और न ही इसका उद्देश्य होना चाहिए।
आज की भारतीय नारी की शक्ति जीवन चुनने, शिक्षा पाने, आत्मनिर्भर बनने, अन्याय का प्रतिरोध करने और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने में है।लेकिन आधुनिक नारीवाद का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि हम अपने इतिहास की महिलाओं के साहस का उपहास करें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास की त्रासद घटनाओं से सीखें और ऐसा समाज बनाएं, जहां किसी भी महिला को अपने सम्मान और जीवन के बीच चुनाव करने की मजबूरी न हो।
स्वरा जी, इतिहास से असहमति आपका अधिकार है। जौहर जैसी प्रथा पर प्रश्न उठाना भी आपका अधिकार है। लेकिन क्या किसी ऐतिहासिक परिस्थिति में मृत्यु का सामना करने वाली हजारों स्त्रियों को बिना उनके समय, परिस्थितियों और मानसिक अवस्था को समझे ‘कायर’ कहना उचित है? यदि आज हम स्त्री की स्वतंत्रता और गरिमा की बात करते हैं, तो हमें इतिहास की स्त्रियों के प्रति भी वही संवेदनशीलता रखनी चाहिए।
इतिहास की स्त्रियों को आज की राजनीतिक या वैचारिक बहस का आसान निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए ? उनके निर्णयों की आलोचना हो सकती है। जौहर जैसी परंपरा पर सवाल उठाए जा सकते हैं। लेकिन यह बहस तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों और संवेदनशीलता के साथ होनी चाहिए।
जौहर को न तो अंधी श्रद्धा से महिमामंडित करने की आवश्यकता है और न ही अज्ञानतापूर्ण ढंग से उसका अपमान करने की। उसे इतिहास के एक दर्दनाक, जटिल और साहस से जुड़े अध्याय के रूप में समझने की आवश्यकता है। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, आने वाली पीढ़ियों का दायित्व है कि वे ऐसा समाज बनाएं जहां किसी स्त्री को कभी सम्मान और जीवन के बीच चुनाव करने की नौबत न आए।और शायद यही जौहर जैसे त्रासद इतिहास से मिलने वाली सबसे बड़ी सीख है। स्त्री के सम्मान की रक्षा केवल मृत्यु में नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित, स्वतंत्र और गरिमापूर्ण जीवन देने में है।

*(लेखिका भारतीय योगिनी संघ की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)*

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