
नई दिल्ली। सरकारी नौकरियों और भर्ती प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने देशभर में बहस छेड़ दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि ‘जनरल कैटेगरी’ की सीटें किसी एक वर्ग की बपौती नहीं हैं और यदि SC, ST या OBC वर्ग का कोई अभ्यर्थी योग्यता के आधार पर चयनित होता है, तो वह सामान्य (जनरल) सीट पर नियुक्ति पाने का हकदार होगा। इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरक्षण का लाभ केवल आरक्षित कोटे की सीटों तक सीमित है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि आरक्षित वर्ग के योग्य उम्मीदवार जनरल मेरिट में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। यदि कोई SC-ST-OBC उम्मीदवार बिना आरक्षण का लाभ लिए, खुली प्रतिस्पर्धा में मेरिट के आधार पर चयनित होता है, तो उसे जनरल कैटेगरी की सीट पर नियुक्त किया जाएगा। अदालत ने यह भी साफ किया कि इससे सामान्य वर्ग की सीटें समाप्त नहीं होतीं, बल्कि यह संविधान के समानता के सिद्धांत (अनुच्छेद 14 और 16) के अनुरूप है।
क्यों मचा है विवाद
इस फैसले के बाद कुछ वर्गों में यह धारणा बन रही है कि अब “जनरल कैटेगरी की सीटें भी खत्म कर दी गई हैं” और सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए अवसर सीमित हो जाएंगे। सोशल मीडिया पर फैसले को लेकर सरकार और व्यवस्था पर तीखे आरोप लगाए जा रहे हैं। कई लोग इसे सामान्य वर्ग के साथ अन्याय बता रहे हैं, तो वहीं समर्थकों का कहना है कि यह निर्णय मेरिट को प्राथमिकता देता है।
सरकार और संविधान का पक्ष
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कोई नया नियम नहीं, बल्कि पहले से स्थापित संवैधानिक व्यवस्था की पुनः व्याख्या है। संविधान कहता है कि सरकारी नौकरी में समान अवसर सभी नागरिकों का अधिकार है। आरक्षण का उद्देश्य अवसर देना है, न कि मेरिट को खत्म करना।
आगे क्या असर पड़ेगा
इस फैसले का असर केंद्र और राज्यों की सभी सरकारी भर्तियों पर पड़ेगा। भर्ती एजेंसियों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि मेरिट लिस्ट और कैटेगरी का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार हो। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और याचिकाएं व राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिल सकती है।



