बच्चों में ब्रेन स्ट्रोक और मिर्गी की बढ़ती चुनौती के बीच एम्स भोपाल की पहल, ‘बाल न्यूरोरेडियोलॉजी’ पर विशेषज्ञों ने दी नई चेतावनी

भोपाल । बच्चों में मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों को लंबे समय तक केवल दुर्लभ समस्या माना जाता रहा, लेकिन अब चिकित्सा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि न्यूरोलॉजिकल विकारों की समय पर पहचान न होने से हजारों बच्चे स्थायी शारीरिक और मानसिक जटिलताओं की ओर बढ़ सकते हैं। इसी चुनौती को केंद्र में रखते हुए एम्स भोपाल में बाल न्यूरोरेडियोलॉजी (Pediatric Neuroradiology) विषय पर विशेष सतत चिकित्सा शिक्षा (CME) कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का मुख्य फोकस बच्चों में मस्तिष्क संबंधी रोगों की शुरुआती पहचान, सुरक्षित इमेजिंग तकनीकों और आधुनिक उपचार रणनीतियों पर रहा। विशेषज्ञों ने कहा कि न्यूरोइमेजिंग तकनीकों में हो रही प्रगति अब उन बीमारियों को भी शुरुआती स्तर पर पकड़ने में मदद कर रही है, जिन्हें पहले देर से पहचाना जाता था।

क्यों बढ़ रही है Pediatric Neuroimaging की जरूरत?

भारत में बच्चों से जुड़ी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का वास्तविक आंकड़ा अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ पाया है, क्योंकि ग्रामीण और छोटे शहरों में विशेषज्ञ जांच सुविधाओं की कमी बनी हुई है। लेकिन बड़े अस्पतालों में आने वाले मामलों से यह स्पष्ट हो रहा है कि मिर्गी, जन्मजात मस्तिष्क विकार, स्ट्रोक, न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां और डिमायलिनेटिंग डिसऑर्डर तेजी से चिकित्सकीय चिंता का विषय बन रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में न्यूरोलॉजिकल रोगों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य विकास संबंधी समस्याओं जैसे दिखाई देते हैं। कई मामलों में बच्चा बोलने में देरी, बार-बार बेहोशी, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या व्यवहारिक बदलाव दिखाता है, लेकिन सही न्यूरोलॉजिकल जांच देर से हो पाती है।

यहीं पर बाल न्यूरोरेडियोलॉजी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां MRI और अन्य उन्नत इमेजिंग तकनीकों के जरिए मस्तिष्क की सूक्ष्म संरचनात्मक और जैविक असामान्यताओं की पहचान की जाती है।

किन बीमारियों पर हुई सबसे ज्यादा चर्चा

कार्यक्रम में बच्चों में होने वाले स्ट्रोक, मिर्गी, ल्यूकोडिस्ट्रॉफी और एक्वायर्ड डिमायलिनेटिंग डिजीज जैसे जटिल विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि बच्चों में स्ट्रोक को अभी भी अक्सर “एडल्ट डिजीज” मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि समय पर पहचान न होने पर यह स्थायी न्यूरोलॉजिकल नुकसान का कारण बन सकता है।

वहीं ल्यूकोडिस्ट्रॉफी जैसी दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियां मस्तिष्क की श्वेत पदार्थ (White Matter) संरचना को प्रभावित करती हैं और धीरे-धीरे बच्चे की न्यूरोलॉजिकल क्षमता कमजोर होने लगती है। इन रोगों में जल्दी निदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

रेडिएशन सुरक्षा और बच्चों की संवेदनशीलता पर विशेष जोर

CME के दौरान केवल रोग पहचान ही नहीं, बल्कि बच्चों में सुरक्षित जांच पद्धतियों पर भी विशेष ध्यान दिया गया। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि बच्चों का शरीर वयस्कों की तुलना में विकिरण (Radiation) के प्रति अधिक संवेदनशील होता है, इसलिए इमेजिंग तकनीकों का उपयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए।

आज चिकित्सा जगत में “Radiation Optimization” एक बड़ा विषय बन चुका है, जिसमें न्यूनतम जोखिम के साथ अधिकतम सटीक जांच पर काम किया जा रहा है। यही कारण है कि आधुनिक Pediatric Imaging Protocols अब विशेष रूप से बच्चों के लिए डिजाइन किए जा रहे हैं।

राष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

कार्यक्रम में एम्स नई दिल्ली के विशेषज्ञ डॉ. अतिन कुमार तथा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) के डॉ. चंद्रजीत प्रसाद ने उन्नत न्यूरोइमेजिंग तकनीकों और जटिल मामलों के प्रबंधन पर अनुभव साझा किए।

इसके अलावा कॉन्ट्रास्ट एजेंट्स से होने वाली एलर्जी और संवेदनशीलता की रोकथाम पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि आधुनिक इमेजिंग में उपयोग होने वाले कॉन्ट्रास्ट पदार्थों की सुरक्षा पर लगातार शोध हो रहा है, ताकि बच्चों में जांच से जुड़े जोखिमों को न्यूनतम किया जा सके।

क्यों महत्वपूर्ण हैं ऐसे CME कार्यक्रम?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल साइंस इतनी तेजी से बदल रही है कि केवल मेडिकल डिग्री पर्याप्त नहीं रह गई। डॉक्टरों को नई तकनीकों, प्रोटोकॉल और रिसर्च अपडेट्स से लगातार जुड़ा रहना पड़ता है।

विशेष रूप से न्यूरोरेडियोलॉजी जैसे क्षेत्रों में AI-सहायता प्राप्त इमेज विश्लेषण, हाई-रिजोल्यूशन MRI और जेनेटिक-इमेजिंग इंटीग्रेशन जैसी तकनीकें भविष्य की चिकित्सा को बदल रही हैं। ऐसे में CME कार्यक्रम चिकित्सकों को नवीनतम वैश्विक मानकों से जोड़ने का माध्यम बनते जा रहे हैं।

भविष्य में क्या बदल सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में Pediatric Neuroimaging केवल बीमारी पहचान तक सीमित नहीं रहेगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण, जेनेटिक डेटा और इमेजिंग के संयोजन से “प्रेडिक्टिव न्यूरोलॉजी” का नया मॉडल विकसित हो सकता है, जहां बच्चों में गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकारों की संभावना पहले ही आंकी जा सकेगी।

एम्स भोपाल में आयोजित यह कार्यक्रम संकेत देता है कि भारत के सरकारी चिकित्सा संस्थान अब केवल उपचार केंद्र नहीं, बल्कि उन्नत चिकित्सा शिक्षा और भविष्य की स्वास्थ्य तकनीकों के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी अपनी भूमिका मजबूत कर रहे हैं।

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