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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट महाकाल लोक में हुए भ्रष्टाचार से संघ भी नाराज

महाकाल लोक में हुए भ्रष्टाचार की पीएमओ ने तलब की रिपोर्ट, लोकायुक्त की अभी तक की जांच में टेंडर से लेकर निर्माण तक में मिली खामियां ही खामियां
-महाकाल लोक के भ्रष्टाचार की जांच करवाएगा केंद्र
-वर्कऑर्डर के अनुबंध में पत्थर की 60 मूर्तियां बनाने का उल्लेख लेकिन सिर्फ 9 मूर्तियां ही पत्थर से बनाई गई
भोपाल । चुनावी साल में सत्तारूढ़ मप्र की भाजपा सरकार पर महाकाल लोक के निर्माण सहित करीब 225 घोटालों के आरोप कांग्रेस लगा रही है। लेकिन धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा के लिए महाकाल लोक में हुआ भ्रष्टाचार पार्टी की चुनावी सेहत बिगाड़ सकता है। इसलिए अब इस मामले में पीएमओ की एंट्री हुई है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार पीएमओ ने महाकाल लोक के निर्माण की पूरी प्रक्रिया की रिपोर्ट तलब की है। उधर, लोकायुक्त की अभी तक की जांच में टेंडर से लेकर निर्माण तक में भारी खामियां ही खामियां सामने आई हैं। जिसमें बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार का अनुमान लगाया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में हुए भ्रष्टाचार से संघ भी नाराज है। वहीं इसकी शिकायत पीएम तक पहुंच चुकी है।

गौरतलब है कि महाकाल लोक में सप्तऋषियों की 7 मूर्तियां धराशायी होने के बाद लोकायुक्त ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इसकी जांच शुरू कर दी है। लोकायुक्त की शुरुआती जांच में ही धांधलियां उजागर हो रही हैं। लोकायुक्त ये जानकर चौंक गए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में अफसरों ने इतनी गैरजिम्मेदारी से काम किया है।

मूर्तियों की न तो ड्राइंग बनी थी, न ही डिजाइन। टेंडर एग्रीमेंट में जिम्मेदार अफसरों के दस्तखत भी नहीं हैं। मूर्तियों का स्पेसिफिकेशन भी तय नहीं था। लोकायुक्त ने उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड को भेजे नोटिस में ये भी लिखा है कि ऐसा लगता है कि मूर्तियों का निर्माण ठेकेदार की मर्जी से हुआ है। जब अनुबंध में प्रावधान ही नहीं थे तो फिर काम किस आधार पर और कैसे करवाया गया?

सभी मूर्तियां निम्न स्तर की
लोकायुक्त की जांच में सभी मूर्तियां निम्न स्तर की मिली है। गौरतलब है कि महाकाल लोक की मूर्तियां गिरने के बाद लोकायुक्त जस्टिस एनके गुप्ता ने इस मामले में प्राथमिक केस दर्ज किया था।

केस नंबर 0036/ई/2023-24 पर जांच करते हुए लोकायुक्त की तकनीकी टीम 2 जून को उज्जैन पहुंची थी। लोकायुक्त के चीफ इंजीनियर एनएस जौहरी के साथ टेक्निकल टीम ने महाकाल लोक की मूर्तियों का परीक्षण किया था। जांच के दौरान दूसरी मूर्तियों में भी दरारें नजर आई थीं। टीम ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया है कि मूर्तियों का रंग उड़ रहा है। इसके बाद लोकायुक्त ने उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड से इस प्रोजेक्ट की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट, टेंडर दस्तावेज, एग्रीमेंट और भुगतान के पूरे बिल मांगे।

लोकायुक्त ने 20 जुलाई तक जवाब मांगा
महाकाल लोक में मूर्तियों सहित अन्य निर्माणों में मिली खामियों के बाद लोकायुक्त की ओर से उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड को नोटिस भेजकर 20 जुलाई तक 16 सवालों पर जवाब मांगा गया है। लोकायुक्त ने सवाल उठाए हैं कि जब स्पेसिफिकेशन ही तय नहीं थे तो आपने कैसे तय कर लिया कि कौन सी मूर्ति कितनी बड़ी और किस मटेरियल से बनी है? एग्रीमेंट और रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) की स्टडी के बाद लोकायुक्त ने जवाब मांगे हैं। लोकायुक्त संगठन को उपलब्ध कराए गए दस्तावेज के अवलोकन में पाया गया है कि एफआरपी की मूर्तियों की लिस्ट, स्पेसिफिकेशन और उनकी ड्राइंग नहीं है।

मूर्तियों के स्पेसिफिकेशन जैसे एफआरपी में उपयोग में आने वाले रेजिन, रिएन्फोर्समेंट, थिकनेस, मूर्तियों की स्टेबिलिटी के लिए स्कलेटन के लिए कौन सा मटेरियल उपयोग में लाया जाएगा, इसकी कोई जानकारी नहीं है।
60 मूर्तियों की जगह 9 ही बनीं पत्थर की
अनुबंध के अनुसार एफआरपी की 100 व पत्थर की 60 मूर्तियों का निर्माण व स्थापना का प्रावधान था।

पहले ये कहा गया था कि मूर्ति अनुभवी व्यक्ति संस्था से बनवाई जाएगी। टेंडर दस्तावेजों में ऐसा कोई पेपर नहीं है, जिसमें अनुभव का उल्लेख हो। इससे साफ है कि ठेकेदार को एफआरपी की मूर्तियां बनाने का अनुभव नहीं था, फिर भी उसे वर्कऑर्डर क्यों दिया गया? 7 मार्च 2019 को एमपी बावरिया, सूरत एवं डीएच पटेल व मेसर्स गायत्री इलेक्ट्रिकल्स वड़ोदरा को वर्कऑर्डर जारी किया गया था।

अनुबंध में पत्थर की 60 मूर्तियां बनाने का उल्लेख था, लेकिन नवग्रह की 6 फीट ऊंची सिर्फ 9 मूर्तियां ही पत्थर से बनाई गई। ऐसे ही एफआरपी की 100 मूर्तियां बनाने का उल्लेख था, लेकिन इसकी 106 मूर्तियां स्थापित करवाई गईं। दस्तावेज से ये भी पता चलता है कि जिस ऊंचाई की मूर्तियां टेंडर में बताई गई थीं, उससे भी हटकर अन्य ऊंचाइयों की मूर्तियां बनाई गई हैं। इससे साफ है कि मूर्तियों का निर्माण अनुबंध के अनुसार न करवाकर ठेकेदार की मनमानी से हुआ है।

इसमें संबंधित अधिकारियों की संलिप्तता होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। सवाल ये भी उठता है कि जब अनुबंध में ये प्रावधान नहीं थे, तब किस आधार पर व कैसे काम करवाया गया? यह कैसे सुनिश्चित किया गया कि एफआरपी की मूर्तियों के लिए जो निविदा दर मंजूर की गई है, उसी अनुसार ठेकेदार ने काम किया है। ये किस आधार पर तय हुआ कि ठेकेदार द्वारा बनाई गई मूर्तियां स्वीकार योग्य हैं।

मूर्तियों के लिए कोई स्पेसिफिकेशन तय नहीं
लोकायुक्त की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि आरएफपी के सेक्शन 35 में दिए स्पेसिफिकेशन के अवलोकन में पाया गया है कि एफआरपी की मूर्तियों के लिए कोई स्पेसिफिकेशन तय नहीं किए गए थे। एग्रीमेंट की स्टडी में पता चला है कि स्मार्ट सिटी उज्जैन लिमिटेड की ओर से किसी अधिकारी के अनुबंध में हस्ताक्षर नहीं है। ऐसे में इसे अनुबंध नहीं कहा जा सकता है।

अनुबंध की किस शर्त के तहत टेंडर में एफआरपी की मूर्तियों के लिए स्वीकृत दर को मंजूर किया गया, यह स्पष्ट नहीं है। उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड के दस्तावेज से साफ है कि मूर्तियों की दरें ऊंचाई के हिसाब से बुलाई गई, जबकि भुगतान वर्गफीट में किया गया। जबकि अनुबंध में इसका कोई प्रावधान ही नहीं है। एफआरपी की मूर्तियों का सरफेस एरिया किस प्रकार मापा गया? क्या बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक में इस पर कोई निर्णय हुआ, उसकी सत्यापित प्रति।

पीएमओ के लिए तैयार हो रही रिपोर्ट
सूत्रों का कहना है कि पीएमओ से रिपोर्ट तलब करने की खबर आने के बाद से ही अधिकारी रिपोर्ट तैयार करने में जुट गए हैं। इस मामले में कांग्रेस का आरोप है कि गुजरात की कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया है। मप्र के अफसरों ने गुजरात लॉबी के दबाव में नियमों का ध्यान नहीं रखा और महाकाल लोक में बड़ा भ्रष्टाचार किया गया है। अगर पूरे महाकाल लोक के निर्माण की जांच कराई जाए तो इसमें ऐसी खामियां निकलेंगी जो भविष्य में जानलेवा साबित हो सकती हैं।

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