भोपाल से बैरसिया तक ‘कचरा प्रबंधन मॉडल’: अब घरों में बनेगी खाद, 500 परिवारों को मिलेगा प्रशिक्षण

भोपाल नगर निगम अब अपने स्वच्छता मॉडल को आसपास के शहरी क्षेत्रों तक विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। इसी क्रम में बैरसिया नगर पालिका को तकनीकी और संसाधन सहयोग देते हुए “घर-घर कचरा पृथक्कीकरण” और “होम कम्पोस्टिंग” अभियान शुरू किया गया है।
अभियान का उद्देश्य केवल सफाई व्यवस्था सुधारना नहीं, बल्कि कचरे को संसाधन में बदलने की संस्कृति विकसित करना है। पहले चरण में 60 परिवारों को गीले कचरे से खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है, जबकि अगले चरणों में 500 परिवारों तक यह मॉडल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
क्यों बदल रही है कचरा प्रबंधन की रणनीति?
भारत के अधिकांश शहरों में कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि गीला और सूखा कचरा एक साथ फेंका जाता है। इससे:
रिसाइक्लिंग मुश्किल हो जाती है,
लैंडफिल का दबाव बढ़ता है,
और जैविक कचरा सड़कर प्रदूषण फैलाता है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यदि घरों से ही गीले और सूखे कचरे को अलग करना शुरू हो जाए, तो कुल कचरे का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर ही प्रबंधित किया जा सकता है।
इसी सोच के तहत “होम कम्पोस्ट है आसान” अभियान शुरू किया गया है।
घरों में खाद बनाने पर क्यों जोर?
विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू गीले कचरे—जैसे सब्जियों के छिलके, बचा भोजन और जैविक अपशिष्ट—से आसानी से जैविक खाद बनाई जा सकती है। इससे:
नगर निकायों पर कचरा परिवहन का बोझ घटता है,
लैंडफिल साइट पर दबाव कम होता है,
और घरों व बागवानी के लिए प्राकृतिक खाद तैयार होती है।
नगर निगम अधिकारियों ने प्रशिक्षण के दौरान नागरिकों को समझाया कि विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन भविष्य के शहरों की आवश्यकता बनता जा रहा है।
भोपाल नगर निगम का “स्वच्छ शहर जोड़ी मॉडल”
भोपाल नगर निगम ने बैरसिया नगर पालिका को स्वच्छता व्यवस्था मजबूत करने के लिए:
4 डोर-टू-डोर कचरा वाहन,
1 रोड स्वीपिंग मशीन,
4 रिक्शा और हैंडकार्ट,
तथा लिटरबिन और कम्पोस्ट यूनिट
उपलब्ध कराए हैं।
यह पहल “स्वच्छ शहर जोड़ी” मॉडल के तहत की जा रही है, जिसमें बड़े शहर छोटे नगरीय निकायों को तकनीकी और संसाधन सहायता देते हैं।
व्यवहार परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती
सतीष मटसेनिया और राकेश शर्मा ने नागरिकों और व्यापारियों से दुकानों के बाहर ढक्कन वाले डस्टबिन रखने तथा सड़क पर कचरा न फैलाने की अपील की।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि “व्यवहार परिवर्तन” है। जब तक नागरिक:
कचरा अलग-अलग नहीं करेंगे,
खुले में फेंकने की आदत नहीं बदलेंगे,
और स्थानीय कम्पोस्टिंग को नहीं अपनाएंगे,
तब तक नगर निकायों की सफाई व्यवस्था सीमित असर ही दिखा पाएगी।
भविष्य के शहरों के लिए संकेत
पर्यावरण योजनाकारों के अनुसार आने वाले वर्षों में भारत के शहरों को “सर्कुलर वेस्ट इकोनॉमी” की ओर बढ़ना होगा, जहां कचरा केवल फेंकने की चीज नहीं बल्कि पुनः उपयोग योग्य संसाधन माना जाएगा।
बैरसिया में शुरू हुआ यह प्रयोग छोटा जरूर है, लेकिन यदि 500 परिवारों का लक्ष्य सफल होता है, तो यह मॉडल अन्य छोटे शहरों और नगरपालिकाओं के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
स्वच्छता विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की स्मार्ट सिटी केवल चौड़ी सड़कें और डिजिटल सिस्टम नहीं होंगी, बल्कि वे शहर सफल माने जाएंगे जो अपने कचरे का स्थानीय और पर्यावरणीय तरीके से प्रबंधन कर सकें।



