भगवान बुद्ध की अष्टधातु प्रतिमा की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक आयोजन भोपाल के राजगिरि बुद्ध विहार में सम्पन्न

भोपाल। राजधानी भोपाल के कोलार रोड स्थित राजगिरि बुद्ध विहार में भगवान तथागत बुद्ध की 4.5 फीट ऊँची अष्टधातु ध्यानमुद्रा प्रतिमा की प्रतिष्ठा का भव्य और आध्यात्मिक आयोजन ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित किया गया। यह प्रतिष्ठा समारोह केवल एक मूर्ति स्थापना न होकर धम्म चेतना के जागरण का दिव्य उत्सव बन गया।
थाईलैंड से आयातित विशेष प्रतिमा
यह विशेष अष्टधातु प्रतिमा थाईलैंड से मंगाई गई, जो करुणा, ध्यान, विवेक और निर्वाण मार्ग का प्रतीक है। मूर्ति की प्रतिष्ठा के साथ ही विहार परिसर ध्यान, शांति और बौद्ध ध्वनि से गुंजायमान हो उठा।
धम्म रैली से आरंभ हुआ समारोह
समारोह का शुभारंभ एक भव्य धम्म रैली से हुआ, जो नयापुरा बस स्टैंड से चलकर विहार परिसर तक पहुंची। इस रैली में हजारों श्रद्धालु, उपासक-उपासिकाएं, भिक्षु समुदाय, महिलाएं और युवा शामिल हुए। रैली के दौरान धम्म गीतों, शील की गरिमा और अहिंसा के संदेशों ने शहर को बौद्ध चेतना से भर दिया।
भंते शाक्यपुत्र सागर थेरो का आशीर्वचन
कार्यक्रम के मुख्य भिक्षु भंते शाक्यपुत्र सागर थेरो ने भावपूर्ण उद्बोधन में कहा:
> “यह मूर्ति केवल धातु नहीं — यह आत्मजागरण की प्रेरणा है। यह ध्यान की आभा है और करुणा की प्रतिध्वनि है। यह हमें भीतर के बुद्ध को पहचानने और जीवन को धम्म मार्ग पर रूपांतरित करने की प्रेरणा देती है।”
विशेष सम्मान और सहभागिता
समारोह में विशेष रूप से डॉ. पोरँचाई और श्री मिथिला चौधरी (थाईलैंड), वरिष्ठ समाजसेवी श्री विनोद वासनिक, भाजपा अध्यक्ष श्री रविन्द्र यती, क्षेत्रीय पार्षद एवं समाजसेवी दीपक ‘गुद्दू’ मनवर सहित अनेक गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया।
महिला मंडल और युवा कार्यकर्ताओं की विशेष भूमिका
समस्त आयोजन का सफल संचालन राजगिरि बुद्ध विहार महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती निर्मला डाकर और सचिव श्रीमती दुर्गा गायकवाड़ के नेतृत्व में हुआ। साथ ही धम्म युवा मंडल के समर्पित कार्यकर्ताओं ने तन-मन-धन से सहयोग देकर आयोजन को सफल बनाया।
आध्यात्मिक गतिविधियों से समृद्ध रहा कार्यक्रम
समारोह में धम्म वंदना, ध्यान सत्र, धम्म गीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, एवं भिक्षु संघ का मार्गदर्शन जैसे विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का समापन बुद्ध वंदना, भिक्षा दान, खीर वितरण, तथा सामूहिक भोज के साथ हुआ।
यह समारोह केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि एक युग की स्मृति बन गया — जहाँ करुणा की मूर्ति प्रतिष्ठित हुई, वहाँ द्वेष मिटा, मैत्री फली-फूली और धम्म पुनः जीवंत हुआ।





