
जोहान्सबर्ग/नई दिल्ली: दक्षिण अफ्रीका आज दुनिया में सबसे ज्यादा बेरोजगारी झेलने वाले देशों में शामिल हो गया है। 33% बेरोजगारी दर के साथ यह देश एक गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है। यह वही दक्षिण अफ्रीका है जो कभी अफ्रीका का सबसे समृद्ध और संसाधन संपन्न देश माना जाता था।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस गिरावट का एक बड़ा कारण है – अत्यधिक आरक्षण प्रणाली। आज दक्षिण अफ्रीका में खेल, शिक्षा, सरकारी नौकरियों से लेकर निजी कंपनियों तक हर क्षेत्र में आरक्षण लागू है। इसका नतीजा ये हुआ कि कुशल और संपन्न वर्ग ने देश को अलविदा कहना शुरू कर दिया। हजारों उद्योगपति और व्यवसायी अपने उद्योग-धंधे बंद कर देश छोड़ चुके हैं।
आरक्षण के दबाव में काम कर रही कंपनियों का प्रदर्शन गिरा है, निवेशकों ने हाथ खींच लिया है और बड़ी संख्या में कंपनियों का बंद होना आम बात बन गई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, आज वहां ‘जय मंडेला’ का नारा तो गूंजता है, लेकिन युवा पीढ़ी बेरोजगारी और हताशा से जूझ रही है।
भारत में भी कुछ सामाजिक-राजनीतिक संगठन लगातार हर क्षेत्र में आरक्षण की माँग कर रहे हैं। अगर भारत ने भी इसी रास्ते को अपनाया, तो सिर्फ आर्थिक दुर्गति नहीं, बल्कि सामाजिक संघर्ष और गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत को आरक्षण नीति की पुनर्समीक्षा करनी चाहिए ताकि योग्यता आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता मिल सके और देश को दक्षिण अफ्रीका जैसी आर्थिक तबाही से बचाया जा सके।





