
भोपाल, । विश्व की सबसे बड़ी हस्तलिखित श्रीरामचरित मानस की रचना करने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि और प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार खोबरे (अरुण अज्ञानी) को पीपुल्स यूनिवर्सिटी, भोपाल में विशेष सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने और भारतीय संस्कृति के महाकाव्यात्मक ग्रंथ श्रीरामचरित मानस को एक नए कीर्तिमान के रूप में प्रस्तुत करने के लिए दिया गया।
मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा मंत्री व विनियामक आयोग के चेयरमैन ने किया सम्मानित
इस गरिमामयी अवसर पर मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री श्री इंदर सिंह परमार, निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के चेयरमैन डॉ. भरत शरण सिंह, तथा पीपुल्स यूनिवर्सिटी की प्रो. चांसलर श्रीमती मेघा विजयवर्गीय की उपस्थिति में डॉ. खोबरे को सम्मानित किया गया।
“समग्र शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ. हरीश राय (कुलपति, पीपुल्स यूनिवर्सिटी) और डॉ. खेमसिंह डहेरिया (कुलपति, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय) भी मौजूद थे।
लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ डॉ. खोबरे का नाम
डॉ. खोबरे का नाम हाल ही में लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। इससे पूर्व उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड, OMG बुक ऑफ रिकॉर्ड, भारत वर्ल्ड रिकॉर्ड, ग्लोबल गोल्ड टैलेंट रिकॉर्ड, रॉयल सक्सेस इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड, मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड और वंडर बुक ऑफ रिकॉर्ड जैसी अनेक प्रतिष्ठित विश्व रिकॉर्ड पुस्तकों में दर्ज हो चुका है।
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त
डॉ. खोबरे को अब तक कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें शामिल हैं:
इंडियन आइकॉन अवॉर्ड
एक्स्ट्राऑर्डिनरी पर्सनालिटी ऑफ इंडिया और वर्ल्ड
संत श्री भूरा भगत रत्न राष्ट्रीय सम्मान
उत्कृष्ट मीडिया गुरु शिक्षक सम्मान 2022
इंडियाज बेस्ट मीडिया टीचर अवॉर्ड
ग्लोबल एपेक्स अवॉर्ड
उत्कृष्ट लोक कवि सम्मान
कतिया विभूति सम्मान आदि।
रामभक्ति को समर्पित यह अद्भुत उपलब्धि
मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बदनूर गांव में जन्मे डॉ. खोबरे वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं और जनसंपर्क अधिकारी, संपादक, विशेष अधिकारी और सांस्कृतिक समन्वयक जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन भी कर रहे हैं।
सम्मान प्राप्त करते हुए उन्होंने कहा,
“यह सब प्रभु श्रीराम और पवनपुत्र हनुमान जी की कृपा और प्रेरणा से संभव हुआ है। इसलिए यह सम्मान मैं समर्पित करता हूं अपने आराध्य रामजी और हनुमान जी को।”





