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क्या मोदी वास्तविक गठबंधन सरकार को पांंच साल चला पाएंगे?


अजय बोकिल वरिष्ठ पत्रकार
लोकसभा चुनाव के झटकेदार नतीजों के कारणों का विश्लेषण राजनीतिक प्रेक्षक लगातार कर रहे हैं, पर इन कारणों में भी गजब का विरोधाभास है। बीजेपी के अपने दम पर बहुमत से काफी दूर रह जाने और कांग्रेस के बढ़कर दो गुना हो जाने का कोई ठोस कारण किसी को समझ नहीं आ रहा। क्योंकि देश में अलग- अलग पाॅकेट्स में अलग- अलग तरह की हवा ज्यादा दिखी। जो फैक्टर यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, मणिपुर व राजस्थान में भाजपा की अकड़ तार- तार करते दिखे, वही फैक्टर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल और उत्तराखंड में भाजपा को मजबूत करते दिखे। भाजपा ने इसे अपनी नीतियों और जनता के विश्वास की जीत कहा तो विपक्ष ने इस जीत को मोदी व भाजपा की नैतिक हार बताकर उनसे इस्तीफा मांगा। बहरहाल इतना तो तय है कि देश में फीकी चमक के साथ ही सही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार एनडीए गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। यहां असल सवाल यह है कि क्या मोदी ऐसी बैसाखी पर टिकी सरकार को पांच साल तक चला ले जा पाएंगे? ये सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि  मोदी की कार्य शैली मूलत: सर्वसत्तावादी और आत्म केन्द्रित  रही है। ऐसे में गठबंधन धर्म निभाते हुए सरकार को सहेजकर चलाना आसान नहीं है। इस देश में गठबंधन धर्म की ईजाद अटलजी ने की थी। क्या मोदी स्वयं में ऐसा कोई बदलाव करने के लिए तैयार हैं, खासकर तब कि जब वो अब स्वयं को परमात्मा का प्रतिनिधि मानने लगे हैं और सत्ता संचालन को ईश्वरीय कार्य।
दरअसल 18 वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में जनता ने किसी भी एक पार्टी के बजाए एक गठबंधन के पक्ष में जनादेश दिया है। इसी के साथ देश फिर 28 साल पुराने  गठबंधन सरकारों के उस दौर में पहुंच गया है, जब चुनाव से पूर्व बना समान विचारों अथवा राजनीतिक स्वार्थो वाले दलों का एक गठबंधन सत्ता में आता था तो दूसरा गठबंधन ही उसे सत्ता से बेदखल करता था। गठबंधन सरकार की अपनी हाथी की चाल होती थी। समन्वय, समझौतों, विवादों के साथ साथ विभेदक तथा दबंगई भरे मुद्दों को कालीन के नीचे सरकाते  हुए सरकार चलानी होती थी। चाहे एनडीए 1 व 2 हो या फिर यूपीए 1 व 2 हो, सभी सरकारें तकरीबन उसी तरीके से चली हैं। इसके कुछ फायदे थे तो कुछ नुकसान भी थे। फायदे ये थे कि ये सरकारें अमूमन अपना वजूद बचाने के लिए उन्हीं मुद्दों पर हाथ डालती थीं, जिनमें न्यूनतम राजनीतिक खतरे होते थे। नुकसान ये था कि किसी भी गंभीर मसले पर साहसिक निर्णय लेना इनके लिए मुश्किल था। यही कारण था कि परमाणु बम विस्फोट, शाइनिंग इंडिया, भाईचारे  की और पाकिस्तान से दोस्ती करने वाली अटलजी  की सरकार भी आठ साल बाद आश्चर्यजनक ढंग से अचानक विदा हो गई तो उसकी जगह अर्थशास्त्री डाॅ.मनमोहन सिंह के नेतृत्व  में आई यूपीए सरकार रोजगार, आर्थिकी और गरीबों की बात करते करते बुरी तरह सत्ता से बेदखल हुई। उस सरकार में जनता के प्रति  प्रतिबद्धता तो थी, लेकिन जनमन को रिझाने वाले फैसले लेने की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी।
भाजपा ने 2014 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर नया दांव खेला। मोदी ने जनता में उम्मीदें जगाईं और स्वर्णिम भारत का सपना दिखाया। मोदीजी ने कई साहसिक (जिन्हें दुस्साहसिक भी माना गया) फैसले किए, उन्हें लागू भी किया। ‘सबका साथ’ के नारे के साथ उन्होंने वोटों की धार्मिक गोलबंदी भी पुख्ताे की। अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर निर्माण का फैसला अदालत से करवाकर मंदिर को साकार किया। नोटबंदी लागू की, जीएसटी लागू किया। तीन तलाक पर कानून बनाकर मुस्लिम महिलाअों का भला किया तो दूसरी तरफ मुसलमानों को नाराज भी किया। भाजपा और आरएसएस का कोर एजेंडा कश्मीर से धारा 370 हटाई तो पड़ोसी देशों में रहने वाली गैर मुस्लिमो को भारत की नागरिकता देने सीएए कानून बनाया। इसके बाद उनका इरादा समान नागरिक संहिता लागू करने का था। लेकिन यह मामला अब अधर में लटक सकता है। कुल मिलाकर यह छवि बनाई गई कि मोदी सिर्फ कहते ही नहीं, वैसा करते भी हैं। उन्होंने अपनी एक वैश्विक छवि भी बनाई साथ में अपने कट्टर हिंदू होने का संदेश भी हर पल दिया। उनके कई फैसलों से लोगों को कष्ट भी हुआ, लेकिन व्यापक हितों के संदर्भ में दस साल तक जनता मोदी को खुले मन से सपोर्ट करती रही। बावजूद इस हकीकत के कि मोदी सारा कुछ खुद ही करते हैं। वही प्रधानमंत्री हैं और मंत्री भी हैं और सचिव भी। वही संगठन के भी नियंता हैं और वही भारत के एकमेव भाग्य विधाता हैं, जिनकी नीयत पर संशय करना भी पाप है। मोदी की यह कार्यशैली विपक्ष तो छोडि़ए खुद भाजपाइयों पर भी भारी पड़ने लगी थी। सत्ता और संगठन में उनका वजूद शो पीस से ज्यादा नहीं रह गया था। भाजपा व संघ का विचार मानो मोदी का विचार बन गया और पार्टी व संघ की सोच मोदी की सोच तथा गारंटी में तब्दील हो गई। ‘हम’ की भाषा पूरी तरह ‘मैं’ और उससे भी आगे सिर्फ ‘मोदी’ में तब्दील हो गई। ‘प्रधान सेवक’ का ‘परम पिता’ के रूप में यह रूपातरंण जनता देख रही थी। कुछ को उसमें देवत्व दिख रहा था तो कुछ की नजर में यह दानवत्व का बीज था।
लगता है कि मतदाता के विवेक ने देवत्व और दानवत्व की इस लक्ष्मण रेखा को भांप लिया और लोकसभा चुनाव में मोदी को तीसरी बार सत्ता सौंपकर भी अंकुश अपने हाथ में रख लिया। इसी तरह विपक्ष को मजबूत किया, लेकिन सत्ता से दूर रखा। मतदाता के मन में एक बड़ा भय लोकतंत्र के अनिष्ट का था। जनतांत्रिक व्यवस्था के अधिनायकत्व में बदलने की आशंका का था। इसमें आंशिक सचाई थी तो काल्पनिक आशंकाएं भी थीं। जैसे कि संविधान बदलकर देश को आजादी के पहले वाले दौर में ठेल देने की कोशिश, आरक्षण समाप्त करने का डर, समूची सत्ता अमीरों के हाथ में दे देने का भय, प्रतिरोध के हर स्वर को खामोश कर देने का डर, यूपी में तो चुनाव बाद सीएम योगी को हटाने की सुरसुरी, इस चुनाव में संघ के हाथ खींच लेने की चर्चा तथा भौतिक विकास को ही सर्वस्व मान लेने का भ्रम भी शामिल था। अर्थ व्यवस्था उड़ रही थी, गरीब का दिल बैठा जा रहा था। हिंदू एकता के नारे में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिता और अधिकारों के खो जाने डर भी शामिल था। एक सुदृढ़ और विकसित भारत सभी देखना चाहते हैं, लेकिन किस कीमत पर और किसके लिए, इस पर मतभेद साफ उभर आए। यह संदेश जाने लगा कि मोदी उस तेज भागते सुपरफास्ट इंजन की तरह हैं, जिसे पीछे चलने वाले डिब्बों की फिकर ही नहीं है। हालांकि मोदी ने ऐसी आशंकाअों को निराधार बताते हुए कई बार इसका खंडन भी किया। लेकिन संदेह के बादल आखिर तक छंट नहीं पाए। इसका सबसे बड़ा कारण तो संवादहीनता थी। भारतीय लोकतंत्र के 70 साल के इतिहास में ये पहले 10 साल थे, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष में संवाद और समन्वय न्यूनतम स्तर पर था। यह धारणा बनी कि  मोदी खुद ही फैसले लेकर बाकी लोगों को न्यायाधीश की तरह सुना देते हैं। सारी शक्तियां पीएमअो में सिमट गई थीं। मंत्री के पास फाइल पर चिडि़या बिठाने से ज्यादा कुछ बचता नहीं था। यह स्थिति भी उस लोकतांत्रिक शासन के अनुरूप नहीं थी, जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी।
ऐसा नहीं है कि मोदी पर से पूरे देश का विश्वास उठ गया है। क्योंकि जिस संविधान के बदलने और आरक्षण खत्म होने का डर यूपी, बिहार, महाराष्ट्र या और कुछ दूसरे राज्यों  के अोबीसी दलितों और आदिवासियों को सता रहा था, वह मप्र सहित चार राज्यों  के दलित आदिवासियों को नहीं लगा। उल्टे मप्र सहित चार राज्यों में भाजपा के प्रति इन वर्गों का समर्थन और मजबूत हुआ। वैसे भी संविधान किसी विशेष राज्य या जाति के लिए नहीं बदला जा सकता। 
मतदाता की खूबी यह है कि वह सत्ताधीशों के मन और नीयत  को भी पढ़ लेता है। लेकिन  मतदाता का शक यदि दूर न हो तो वह चुनाव में सत्ताधीशों को पुरस्कार या तिरस्कार के रूप में परिणत होता है। शायद इसी सं‍भावित भय ने पूर्ण बहुमतवाली पार्टी की सरकार को अपूर्ण बहुमत वाले दल की गठबंधन सरकार में तब्दील कर दिया। यूं कहने को तो 2014 व 2019 में भी एनडीए गठबंधन की ही सरकारें थीं, लेकिन उसका समूचा ‍िनयंत्रण मोदी और भाजपा के हाथ में था, क्योंकि वह अपने दम पर बहुमत में थी। अब वैसा नहीं हो सकेगा। अगर एनडीए की सरकार पांच साल चलनी या चलानी है तो संवाद को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर तथा पारदर्शिता को दूसरे नंबर पर रखना होगा। अपने पूर्वाग्रह थोपने की जगह सबकी राय से काम करना होगा। बीते दस सालो में मोदी सरकार के कई निर्णय ऐसे थे, जिन पर फैसले से पहले ही यदि परस्पर संवाद कर आम सहमति बनाने की कोशिश की गई होती तो विवाद ही नहीं होते। तीसरा, विपक्ष का सम्मान किए बगैर सरकार चलाना नामुमकिन होगा। यह जताना होगा कि विपक्ष केवल एक संवैधानिक प्रावधान भर नहीं है, लोकतंत्र की एक जीवंत आवश्यकता है। न सिर्फ विपक्ष बल्कि स्वयं भाजपा के अन्य नेताअों और सहयोगी दलो को भी पूरा सम्मान देना होगा, वरना कब कौन समर्थन वापस लेकर सत्ता की जाजम खींच ले, कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह सब करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को ज्यादा उदार, सहिष्णु और विकेन्द्रीकृत सत्ता का हामी होना पड़ेगा। राजनीतिक तोड़फोड़ का खेल अब पहले सा नहीं चल सकेगा। संक्षेप में कहें तो उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी की शैली में काम करना होगा ( उनकी गलतियों को छोड़कर)।  क्या मोदी ऐसा कर पाएंगे, यह लाख टके का सवाल है? क्योंकि मोदी की यह फितरत नहीं है। दूसरे, क्या मोदी ऐसे किसी मुद्दे पर सरकार गिराएंगे, जिससे उन्हें और भाजपा को राजनीतिक लाभ हो? सवाल कई हैं और इसी के साथ मोदी 3.0 पर प्रश्नचिन्ह भी !

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