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जल्द भुगतान के लिए आयकर के नियम की मार

लोन लेकर व सोना गिरवी रख चूका रहे छोटे-मध्यम उद्योग

भोपाल । छोटे उद्योगों को उनकी उधारी जल्द चुकाने के लिए सरकार ने नियम लागू कर दिया है। नियम जारी वित्त वर्ष में लागू हुआ और साल बीतते-बीतते उद्योगों के ही पसीने इससे छूटने लगे हैं। जिन छोटे उद्योगों को राहत दिलाने के नाम पर यह नियम लागू हुआ था, उन्हीं पर नियम भारी पड़ रहा है। आयकर की मार से बचने के लिए जल्द भुगतान की गरज से उद्योगों को लोन लेने से लेकर सोना गिरवी रखने तक के कदम उठाने पड़ रहे हैं। कर विशेषज्ञों ने नियम को अव्यावहारिक और कठोर बताते हुए इसमें बदलाव की मांग उठाना शुरू कर दी है।

1 अप्रैल 2023 से आयकर में एक नया प्रविधान लागू कर दिया गया था। नियम के अनुसार माइक्रो-स्माल इंडस्ट्री से किसी भी कारोबारी ने कोई माल-सेवा ली है तो उसका भुगतान अधिकतम 45 दिन में करना होगा। यदि भुगतान 31 मार्च यानी वित्त वर्ष खत्म होने बाद भी बाकी रहा तो यह पैसा खर्च में नहीं जुड़ेगा, बल्कि आय मानकर उस पर आयकर चुकाना पड़ जाएगा। यानी उस भुगतान पर 30-35 प्रतिशत तक के टैक्स का भार संबंधित कारोबारी पर आ जाएगा।

माइक्रो यूनिट वे हैं जिनका प्लांट और मशीनरी में निवेश एक करोड़ और टर्नओवर 5 करोड़ तक हो। स्माल यूनिट वे हैं जिनका प्लांट में निवेश 10 करोड़ और टर्नओवर 50 करोड़ तक हो। सीए स्वप्निल जैन के अनुसार इस प्रविधान का असर ये हो रहा है कि भले ही क्रेता-विक्रेता के पुराने व्यापारिक अनुभव और रिश्ते ऐसे रहे हो कि वे अपनी सुविधा से कुछ महीनों तक उधारी पर व्यापार करते रहे हो, लेकिन अब आयकर के नियम के डर से वे लंबी उधारी नहीं ले पा रहे। ऐसे में कई उद्योगों ने छोटी इकाइयों से माल-सेवा लेने से परहेज शुरू कर दिया है। इस नियम की चपेट में छोटे-मध्यम उद्योग खुद भी आ गए हैं, उन्हें खुद भी अपने सप्लायर को पैसा चुकाना पड़ रहा है। भले ही उनके पास पूंजी और तरलता का अभाव हो। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो न केवल उन पर टैक्स की मार पड़ेगी, बल्कि उनकी बैलेंस शीट खराब होने से उनकी वित्तीय साख भी बिगड़ जाएगी।

गिरवी पर लोन ले रहे उद्यमी

सीए और कर विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ छोटी यूनिटों का पैसा चुकाने के लिए कई मध्यम उद्योगों को सोना-संपत्ति गिरवी रखकर लोन लेना पड़ रहा है। 31 मार्च तक पैसा चुकाने की हड़बड़ी बाजार में दिख रही है। सीए ब्रांच इंदौर के पूर्व अध्यक्ष पंकज शाह के अनुसार यह नियम अव्यावहारिक और कठोर है। इसका असर ये होगा कि न केवल छोटे-मध्यम उद्योगों का व्यापार कठिन हो जाएगा, बल्कि कारोबार बड़े कार्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में जाने की आशंका बनी रहेगी। आने वाले आम बजट में इस प्रविधान में बदलाव होना जरूरी है।

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