बैडमिंट कोर्ट की जमीन को बदल दिया वर्ल्ड क्लास म्यूजियम में

भोपाल ।।क्रिएटिंग अ प्राइेट म्यूजियम चैलेंजेस एंड थ्रिल्स विषय पर आयोजित सेशन में मेस्को कैमरा के फाउंडर आदित्य रॉय ने मीरा दास से डिस्कशन करते हुए अपनी पूरी यात्रा की जानकारी दी। आदित्य ने बताया कि म्यूजियम सिर्फ किसी चीज को दर्शाने का स्थान नहीं है। वह एक ऐसी जगह है जहां लोग आये और वहां प्रदर्शित की गई चीजों को देखकर उससे संवाद करना शुरू करें। आदित्य ने बताया कि मेरे जीवन की कहानी बहुत ही रोचक है। मेरी शुरुआत फोटोग्राफी से हुई थी। लेकिन आज मैं एक म्यूजियम क्यूरेटर बन गया हूं। मेरे पिता ने पहली बार मुझे 17 साल की उम्र में कैमरा लाकर दिया था। जिज्ञासावश मैंने स्क्रू ड्राइवर से उस कैमरे को खोल दिया। क्योंकि मैं यह देखना चाहता था कि आखिर यह कैमरा काम कैसे करता है। वर्ष 2016-17 तक मेरे पास 7 हजार कैमरों का कलेक्शन तैयार हो गया। मैंने कुछ लोगों को देखने को बुलाया। उन्हीं में से मुझे किसी ने मुझे सीनियर फोटो जर्नलिस्ट कुलवंत राय के बारे में बताया। कुलवंत राय आजादी के पहले के फोटोग्राफर थे और उन्होंने महात्मा गांधी से लेकर अनेकों स्वतंत्रता सेनानियों की रैलियों, बैठकों के फोटोग्राफ क्लिक किए हुए थे। मेरे परिवार से किसी तरह से उनका परिचय निकल गया। 1984 में उनकी मौत के कुछ वर्षों बाद उनके द्वारा दिया गया एक पैकेट मैंने खोला। वह पैकेट देखकर मैं बुरी तरह से हैरान हो गया। उस पैकेट में फ्रीडम मूवमेंट के 10 हजार से अधिक निगेटिव थे। बस यहीं से मेरे दिमाग में एक म्यूजियम तैयार करने का आइडिया क्लिक किया। म्यूजियम तैयार करने के लिये मुझे एक अच्छी जमीन की आवश्यकता थी। मेरी यह तलाश तब पूरी हुई जब गुड़गांव में मुझे एक बैडमिंट कोर्ट दिखा मैंने उसे म्यूजियम के रूप में डेवलप करने का फैसला किया। 2018 में मैंने उसका निर्माण कार्य शुरू किया। उस समय न मेरे पास कोई आर्किट्रेक्चर था और ना रिसोर्सेस। लेकिन मैंने अपने दोस्तों से बात की और उन्होंने मुझे इसे तैयार करने के लिये मोटिवेट किया। धीरे-धीरे मैंने काम करना उसमें आरंभ किया। जैसे-जैसे म्यूजियम का काम होता गया मैं वहां काम करने वाले मजदूरों से इतना जुड़ गया कि मैंने उनके 10 हजार से अधिक फोटो ग्राफ काम करते हुए समय के क्लिक किये। आज इस म्यूजियम में वीकेंड पर 500-600 लोग विजिट के लिये आते हैं। लगभग तीन से चार साल की मेहनत के बाद मेरा म्यूजियम पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ। भारत में मार्च में होने वाली जी20 समिट की बैठकों के दौरान यहां आने वाले डेलिगेट्स को भी इस म्यूजियम में घुमाने का प्रस्ताव आया है।


आर्किटेक्चर डिजाइन के समय सोशल रिस्पांसबिलिटी न भूले

सस्टेनेबल आर्किटेक्चर पर पुणे से आये 80 वर्षीय आर्किटेक्ट और प्लानर क्रिस्टोफर बेनिंजर ने रीमा हूजा और सविजा राजे के साथ डिस्कशन किया। इस दौरान क्रिस्टोफर ने अर्बन प्लानिंग, एन्वायरमेंट फ्रेंडली बिल्डिंग डिजाइनिंग के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वे मूलतः अमेरिका से हैं जहां उन्होंने अपनी आर्किटेक्चर की पढ़ाई की। लेकिन अपने गुरु बालकृष्ण वल्लभ से प्रभावित होकर उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि चुना। क्रिस्टोफर कहते हैं कि वे 23 साल की उम्र से आर्किटेक्ट की फील्ड में काम कर रहे हैं। उन्हें ट्रेवलिंग का काफी शौक था। यही कारण है कि ट्रेवलिंग के दौरान उनकी मुलाकात कई सीनियर आर्किटेक्ट से हुई उनके द्वारा बनाई गई बिल्डिंग डिजाइन को देखकर वे काफी प्रभावित हुए और उन्होंने आर्किटेक्टचर के फील्ड में आने का निर्णय लिया। क्रिस्टोफर ने कहा कि किसी भी बिल्डिंग के निर्माण में प्लानिंग बहुत महत्वपूर्ण होती है। जरूरी है कि हम वॉक थ्रू आर्किटेक्ट बनाने के बजाय एक बेहतर प्लानिंग तैयार करें इस दौरान सोशल रिस्पांसबिल्टी को हमें बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए। क्योंकि एक अच्छा आर्किटेक्ट लोगों की जिंदगी बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। हमारी कोशिश होना चाहिए कि हम ऐसी बिल्डिंग डिजाइन करें जो प्रकृति से जुड़ी हो और लोगों को एक बेहतर और एन्वायरमेंट फ्रेंडली वातावरण मिले। अपनी खुद की एक बिल्डिंग डिजाइन के बारे में उन्होंने बताया कि पुणे में एक बड़े बिजनेसमैन ने उन्हें एक कमर्शियल बिल्डिंग डिजाइन करने को कहा। जिसमें उन्होंने फुटप्रिंट बहुत कम रखा। इससे बिल्डिंग ने कम जगह घेरी और बेहतर बिल्डिंग बनकर तैयार हुई। उन्होंने बताया कि कई बार क्लाइंट अपने फायदे के बारे में सोचते हुए आपसे ऐसी बिल्डिंग डिजाइन बनाने को कहेंगे जो उन्हें फील गुड नहीं देगी। इसलिए बेहतर है कि हम क्लाइंट को एजुकेट करें। मैंने भी यही किया और उसी कमर्शियल डिजाइन के अंदर मैंने गार्डन, रिवर, फॉरेस्ट को इन्बिल्ड करते हुए डिजाइन किया जो बाद में लोगों को बहुत पसंद आया।

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