तकनीकी क्षेत्र से हिंदी भाषा का वैश्विक विस्तार संभव हैः संतोष चौबे

रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में प्रवासी दिवस एवं हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में परिसंवाद का आयोजन
आज हिंदी में रोजगार उपलब्ध कराने की है जरुरतः नारायण कुमार
भोपाल। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में प्रवासी भारतीय साहित्य एवं संस्कृति शोध केंद्र की ओर से ‘विष्व में हिंदी, हिंदी का विष्व’ विषय पर परिसंवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि  नारायण कुमार, मानद निदेशक अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद दिल्ली एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री शिवकुमार सिंह, प्राध्यापक (भारतीय अध्यापन और हिन्दी) लिस्बन विष्वविद्यालय, पुर्तगाल उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री संतोष चौबे, कुलाधिपति, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय ने की।  
इस मौके पर नारायण कुमार ने कहा कि विश्व हिंदी दिवस और विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी भाषा को वैष्विक फलक प्रदान करता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि हिंदी का विश्व सिर्फ हिंदी भाषी और भारतीयों से ही नहीं बनता इसको फ्रेंच, डच, पुर्तगीज जैसे देशों ने भी संभव बनाया। कहने का आषय है कि विष्व में हिंदी के विस्तार में दूसरे देषों का भी योगदान रहा है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि विष्व में हिंदी का प्रचार-प्रसार सिर्फ हिंदी भाषी के लोग ही नहीं बल्कि भारत के बाहर के लोगों द्वारा भी किया गया। इसी के साथ उन्होंने कहा कि गिरमिटिया देषों में हिंदी का वैविध्य काफी बड़ी रहा। आज प्रषासनिक स्तर पर हिंदी में पढ़ने वालों को रोजगार उपलब्ध कराने की दिषा में काम करने की आवष्यकता है।  
इस मौके पर डॉ शिवकुमार सिंह ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानक पर हिंदी विष्व भाषा के रुप में खरी उतरती है। इसीलिए हिंदी को विष्व की हिंदी भाषा कहना अतिष्योक्ति नहीं होगी। आज हिंदी को वैश्विक फलक और सशक्त करने की दिशा में रोजगार की भाषा बनाना जरूरी है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि हिंदी को शिक्षा प्रणाली से अलग भी देखे जाने की जरूरत है। आज जरूरत है हिंदी को व्यापार की भाषा, रोजगार की भाषा, तकनीक की भाषा बनाने की।
वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री संतोष चौबे ने कहा कि भाषा का फैलाव सांस्कृतिक विस्तार से होता है। इसलिए जैसे-जैसे भारतीय संस्कृति का विकास होगा, वैसे-वैसे भारतीय भाषा का विकास होगा। इसके अलावा उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन शैली जैसे-जैसे स्वीकार्य होगी भारतीय भाषा का विस्तार उसी अनुरूप में होगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा का विस्तार तकनीक के क्षेत्र और आंतरिक स्तर पर जबतक नहीं होगा तब तक हिंदी को भाषा के रूप में वैश्विक फलक मिलना संभव नहीं है। इसके अलावा उन्होंने हिंदी भाषा को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ समन्वय और सम्मानजनक रिश्ता कायम करने की बात कही।  
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के प्रवासी भारतीय साहित्य एवं संस्कृति शोध केंद्र की समन्वयक डॉ मौसमी परिहार और सलाहकार डॉ जवाहर कर्णावट उपस्थित थे। आभार और धन्यवाद ज्ञापन अधिष्ठाता डॉ संगीता जौहरी ने दिया।  





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