मालगाड़ी गार्ड की संक्रांति (लघु कथा)

सुबह साढ़े चार बजे साइन ऑफ के बाद लॉबी से बाहर निकल कर जब जब गहरी श्वास लेकर बाहर छोड़ी तो सहसा अपने अधूरे पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों की याद हो आई। थकान भरे किन्तु तेज़ कदमों से लाइनें पार करता हुआ एस. एस. ई. (पी वे) के कार्यालय का जुगाड वाला शॉर्ट कट मार कर 12 बंगले के खेल मैदान से होता हुआ जब घर पहुंचा तो जानकारी मिली कि आज तो मकर संक्रान्ति है! 

          सिंगाजी साइडिंग से तीन दिन के अज्ञातवास के पश्चात त्योहार के दिन घर पहुंचने की प्रसन्नता इस प्रकार हुई मानो विश्व विजय प्राप्त की हो। सुबह नहा धोकर तैयार हुआ तो श्रीमती जी बोली कि बाज़ार से दही ले आइए। में झट से थैला लेकर, उल्लासित हृदय से बाजार की ओर बढ़ गया। प्रसन्नता के अनेक भाव चेहरे पर आते जाते थे कि तभी एक रिटायर्ड गाड़ी बाबू मिल गए। ओपचारिक नमस्कार के आदान प्रदान के पश्चात सज्जन ने पूछ लिया कि "गार्ड साहब, बहुत प्रसन्न प्रतीत हो रहे हो? मैने भी कहा कि " हां, आज मकर संक्रान्ति है इसलिए थोड़ा सा आनंद का अनुभव कर रहा हूं। सज्जन ने फिर पूछा " तनख्वाह तो 14 के बजाय पहली को मिलती हैं ना? मैने कहा हां। तो क्या फिर पैसेंजर में तरक्की हो गई क्या? मैने उत्तर दिया, नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। चलिए ठीक है और संक्रान्ति की शुभकामनाएं देकर सज्जन, मेरी प्रसन्नता की संदिग्धता को अपने मन में दबाकर भारी मन से अपने रास्ते हो लिए और में अपना झोला घुमाता हुआ घर की ओर चल दिया।

कभी कभी प्रसन्नता का कारण अभिव्यक्ति बहुत विचित्र हो जाती है जो स्वयं के लिऐ तो बहुत बड़ी होती है किंतु अन्य किसी को व्यक्त करते हुए प्रसन्नता के अवमूल्यन का भय रहता है। अब इतना सब कुछ कैसे समझाता? उन्हें में कैसे बताता कि मकर संक्रान्ति से सूर्य देव उत्तरायण होने लगते है जिससे पृथ्वी पर उनकी ऊष्मा में शने शऩे वृद्धि होती है तथा कड़ाके की सर्दी से कांपती रातों की लंबाई घटती है और उष्मित दिनों की अवधि धीरे धीरे बढ़ती है। कंपकपाती, ओस से भीगी रातों की हड्डियों को गलाने वाली ठंड की विदाई होने का समय आया है, अब भला मालगाड़ी के गार्ड के लिए इससे बेहतर भी कोई कारण हो सकता है प्रसन्न होने का?


स्वरचित
मनोज कुमार शर्मा
मालगड़ी गार्ड
भोपाल



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