हम नारे बनाने में बेहतर हैं, पॉलिसी में नहीं : मोटेंक सिंह अहलूवालिया

5वें भोपाल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल हुआ भव्य समापन
- कविता प्रतियोगिता के विजेताओं का हुआ सम्मान
- ज्ञान प्रसारक पुरुस्कार की हुई शुरुआत
- हर व्यक्ति तक टेक्नोलॉजी की पहुंच बेहद जरूरी- राघव चंद्रा
- फिल्म इंडस्ट्री में क्रेडिट कम आइडिया ज्यादा चोरी होता है- प्रवीण

भोपाल। सोसायटी फॉर कल्चर एंड एन्वायर्नमेंट की ओर से भारत भवन परिसर में आयोजित 5वें भोपाल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल के आज तीसरा और आखिरी दिन रहा। तीन दिवसीय इस नॉलेज महाकुंभ में सौकड़ों सेशंस में कई महत्वपूर्ण पुस्तकों और विषयों पर चर्चा हुई। बीएलएफ का समापन श्रीमति लता मुंशी के नृत्य प्रस्तुति से हुई। इसके साथ ही आज कविता प्रतियोगिता के विजेताओं को भी सम्मानित किया है। इसके साथ ही सोसायटी फॉर कल्चर एंड एन्वायर्नमेंट के डायरेक्टर डॉक्टर राघव चंद्रा ने सभी का धन्यवाद देते हुए सफल आयोजन की बधाई दी। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हम अगले साल फिर लौटेंगे और इस नॉलेज महाकुंभ को ज्यादा बड़े स्तर पर पहुंचाएंगे। इसके साथ ही BLF के फाउंडर राघव चंद्रा ने कहा कि 2019 में जब उन्होंने शुरुआत की तो सुशीला देवी जी के नाम पर सम्मान देना तय किया गया। ये अवॉर्ड नॉन फिक्शन के क्षेत्र में महिला लेखिकाओं को दिया जाता है। इस बार का सम्मान अनुराधा रॉय की अर्थ स्पिनिंग किताब को दिया गया। इसके तहत उन्हें सम्मान के साथ ही 2 लाख रुपए का चेक भी प्रदान किया गया। अनुराधा रॉय ने सम्मान दिए जाने पर शुक्रिया अदा किया और कहा कि इतने बेहतरीन लेखकों के बीच सम्मानित होना बेहतरीन है। बीएलएफ में इस बार ज्ञान प्रसारक पुरुस्कार की भी शुरुआत हुई, इसका पहला पुरुस्कार हितेश रूपाणिया (रूपाणिया बुक स्टोर इंदौर) को दिया गया। वहीं, तीसरे दिन रंगदर्शनी दीर्घा में आयोजित संवाद सत्र की शुरूआत बर्ड्स ऑफ लखनऊ पुस्तक पर चर्चा से की गई। इस पुस्तक का लेखन आईएएस श्री संजय कुमार द्वारा किया गया है। संवाद सत्र के दौरान नीरज श्रीवास्तव, पुस्तक के लेखक श्री संजय कुमार, श्री अभिलाष खांडेकर, वरिष्ठ फोटोग्राफर पद्मश्री भालू मोंधे के बीच चर्चा हुई। बर्ड्स ऑफ लखनऊ पुस्तक पर लेखक आईएएस श्री संजय कुमार ने कहा कि जब मैं दिल्ली में स्कूल का स्टूडेंट्स था। उस समय घूमना और साइकलिंग करने का शैक था। मैंने कुछ दिन के बाद एक नेचर क्लब में पार्टिसिपेट किया और क्लब में मुझे सेक्रेरटरी बनाया गया । वहां से पक्षियों पर लिखने का एक पैशन बना। अभी तक 1800 से अधिक कॉपी सेल हो गईं है। वहीं पद्मश्री भालू मोंधे ने कहा कि बर्ड्स ऑफ इंदौर पुस्तक के बारे में बताया कि इंदौर और वेटलैंड के आसपास पाये गये पक्षियों की फोटो भी हैं। बुक में लगभग 267 बर्ड्स के फोटो हैं और अन्य बर्ड्स की फोटो शामिल की जानी है। अनुभव साक्षा करते हुये श्री संजय ने कहा कि वे बरेली में कलेक्टर थे तो एक बार एक क्लास में बैठे 50 से अधिक से बच्चों से एक पक्षी का फोटो दिखा कर पूछा तो उनमें से सिर्फ दो या तीन बच्चों ने बताया कि उन्होंने देखा है। उन बच्चों से पूछा कहां देखा है तो उन्होंने जबाव दिया कि वे जब गाड़ी से कहीं जा रहे थे तो उन्होंने उस दौरान वह पक्षी देखा था। इसलिये आज समय है कि स्कूल में एक जनजागरण करना चाहिये और नई शिक्षा नीति के तहत सिलेबस में जोड़ा जाना चाहिये। यूथ को नेचर के बीच समय व्यतीत करनाचाहिये जिससे वे उसका संरक्षण कर सकें। 

हम स्लोगन बनाने में अच्छे हैं, पॉलिसी में नहीं – मोटेंक सिंह अहलूवालिया

योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोटेंक सिंह अहलूवालिया ने अपनी किताब बैक स्टेज पर चर्चा करते हुए कहा कि मैंने योजना आय़ोग के उपाध्यक्ष के रूप में काम किया है। यह बहुत महत्वपूर्ण रोल था। मेरी यह किताब किसी इंसीडेंट की किताब नहीं है और न ही किसी एक सरकार की। मैं 1997 में पहली बार फाइनेंस मिनिस्ट्री में ईकोनॉमिक एडवाइजर बनकर आया। मेरे लिए यह एक बेहतर अवसर था क्योंकि मैं यह जानना चाहता था कि ईकॉनोमिक पॉलिसी कैसे बनती है, उसे कैसे चेंज करते हैं। मेरी यह किताब इन्हीं सब बातों को डिस्क्राइब करती हैं। किसी भी सरकार में जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिये जाते हैं तो उसमें बहुत सारे लोगों की हिस्सेदारी होती है। अगर हम 70 के दशक की बात करें तो उस समय हमारी ईकोनॉमी पॉलिसी ओल्ड फैशन थी। 80 के दशक में उसमें थोड़ा बदलाव आया। 1991 के बाद काफी कुछ सुधार आया, लेकिन उसकी स्पीड भी धीमी ही रही। मोटेंक सिंह अहलूवालिया ने बताया कि वर्ष 2004 में जब मैं मनमोहन सरकार में वापस आया तो मैंने देखा कि सुधार की स्थिति बनने लगी थीं। खासतौर से यूपीए के शुरुआती सात वर्षों का जो कार्यकाल था उसमें हमारी ग्रोथ रेट 8.4 प्रतिशत थी। ऐसी ग्रोथ पहले कभी नहीं हुई। आज जो भारत की स्थिति है उसे देखकर हम कह सकते हैं कि ईकोनॉमी को बेहतर करने में बहुत समय लगा कई सालों की मेहनत के बाद अब हम यहां तक पहुंचे हैं। मोटेंक सिंह ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टी एक दूसरे की निंदा करती ही हैं। लेकिन अगर हम देखें तो यूपीए के आखिरी जो तीन साल का समय रहा है उसमें ग्रोथ रेट काफी धीमी हो गई थी, जिसका बड़ा कारण था कि देश के कई बड़े प्रोजेक्ट की क्लीयरेंस रूक गई थी। मध्यप्रदेश के संदर्भ में चर्चा करते हुए मोटेंक सिंह ने कहा कि आज मध्यप्रदेश से मेरा खास जुड़ाव हैं और मैं यहां आता रहता हूं। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश में जो पीपीपी मोड पर कार्य करने का एक सिलसिला शुरू हुआ है वो अच्छे संकेत हैं। आंध्रप्रदेश में पीपीपी मोड पर मेट्रो ट्रेन का संचालन हो रहा है जो हमारे सामने एक सफल उदाहरण है। कोई भी पॉलिसी हो उसे बहुत ही केयरफुली डिजाइन करना चाहिए। क्रिटिसाइज करना आसान है। केंद्र के पास ज्यादा वित्तीय अधिकार हैं, लेकिन कुछ मामलों में राज्यों को स्वतंत्रता भी है। राज्यों को इनके मुताबिक अच्छी प्लानिंग करनी चाहिए। पॉलिसी पर दर्शक के पूछे गए सवाल पर अहलूवालिया ने कहा की हम नारे लिखने में आगे है, न की पॉलिसी बनाने में। उन्होंने आगे कहा मैं एक किताब लिखना चाहता हूं जो एक साल में तैयार होगी उसमें में इस बात का जिक्र करूंगा कि अगले 20 साल में हमारे लिये क्या है जो बहुत जरूरी है।   

पुस्तक लिखने के लिए 13 वर्षों तक शोध किया- अमृता निगम
दूसरे सत्र में झांसी की रानी (वृंदावनलाल वर्मा की कृति) पर चर्चा की गई। इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद लेखिका अमृता निगम द्वारा किया गया है। इस चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार श्री बृजेश राजपूत एवं लेखिका अमृता निगम उपस्थित रहीं। चर्चा के दौरान उन्होंने स्वर्गीय श्री वृंदावन के बारे में बताते हुये कहा कि श्री वृंदावन 1906 के आस पास वे ललितपुर में पढ़ाई कर रहे थे। उस समय एक बार कॉलेज में उन्हें पुरस्कार में कुछ पुस्तकें दी गईं थी। पुस्तक को घर ले जाकर उन्होंने पढ़ी उसमें अंग्रेजी लेखक ने पुस्तक में ऐसे वाक्य लिखे थे, जिसे पढ़ने के बाद उन्होंने ठाना कि वे भी ऐसा लिखेंगे जिससे भारत देश में अंग्रेजों की असलियत पता चलेगी। उन्होंने एक पुस्तक लिखी और वह पुस्तक अंग्रेजों ने पढ़ी तो पुस्तक की कॉपियां आग लगा दी गईं और पुस्तक पर बैन लगा दिया गया। वहीं अनुभव को साक्षा करते हुये कहा कि इस पुस्तक को लिखने के लिये श्री वृंदावनलाल जी ने 13 वर्ष तक शोध की थी। वहीं उन्होंने बताया कि झांसी की रानी महारानी लक्ष्मीबाई ने स्वार्थ नहीं बल्कि स्वराज के लिये लड़ाई लड़ी थी। स्वर्गीय श्री वृंदावन द्वारा हिंदी में लिखित पुस्तक झांसी की रानी मैंने 9 साल की उम्र में पढ़ी थी। पुस्तक के लेखन इतना सटिक था कि पुस्तक हर साल एक बार पढ़ती थी। इस पुस्तक का मराठी एव अन्य कई भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका था, लेकिन अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिये मेरे नाना जी ने मुझे प्रेरित किया। पुस्तक में वह अध्याय झकझोर देता है जब रानी लक्ष्मीबाई झांसी छोड़कर जा रही होती हैं। उस समय जगह-जगह जलता झांसी, हाहाकार मचा हुआ होता है। 
 
तीसरे सत्र में हाउ टू राइट अ नोवल, गेट पब्लिश्ड एंड बीकम अ बेस्ट सेलर पर लेखक कर्नल एस पी सिंह एवं डॉ. प्रदीप कपूर के बीच चर्चा हुई। लेखक कर्नल एस पी सिंह ने कहा कि किताब एक बच्चे की तरह होती है, जिसे बड़ी ही संजीदगी के साथ गढ़ा जाता है। उसके हर एक अध्याय को सुसज्जित करने किये एक लेखक कई वर्षों तक प्रयत्न करता है। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में उनके दादा जी स्टोरी टेलर थे और बचपन में वे उनसे कहानियां सुनते थे। धीरे धीरे वे कहानियां स्मृति में बस गईं। आज के नव लेखक को सबसे पहले अपने जॉनर का पता लगा लेना चाहिये जिससे उन्हें पता चल जाये कि वे किस जोन में लिखना चाहते हैं और नव लेखक को उनके जोनर द्वारा लिखी गईं पुस्तकों को पढ़ते रहना चाहिये और छोटी-छोटी कहानियां लिखने से व्याकरण, वाक्य, शब्द संग्रहाण करना आने लगता है। फिर छोटी-छोटी कहानी या 3-4 अध्याय लिखना शुरू करना चाहिये। अपने अध्यायों और कहानी के संग्रहण को लिखने के बाद 3 से 4 बार पढ़ना चाहिये। इसके बाद पुस्तक का ले आउट क्लियर होना बहुत जरूरी होता है।

संस्कृत में लिखी कविता में होता सही राइम का उपयोग – बिवेक देवरॉय 

एसेंस ऑफ द रामायण, महाभारत और उपनिषद एंड पुराण पर सीनियर इकोनोमिस्ट बिवेक देवरॉय ने कहा कि भारत में अगर सबसे प्राचीन भाषा अगर कोई है तो वो संस्कृत हैं। संस्कृत ही वो भाषा है जिसने भारत के सांस्कृतिक विरासत को महाभारत, रामायण को आकार देने का कार्य किया है। लोगों के लिये संस्कृत भाषा बेहद कठिन भाषा होगी, लेकिन पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि संस्कृत सबसे सरल, आसानी से बोले जाने वाली भाषा है। मैंने 45 वर्ष की उम्र में संस्कृत पढ़ना सीखा। आज के समय में बहुत अंग्रेजी बोलते हैं, लेकिन संस्कृत भाषा की व्याकरण अंग्रेजी की ग्रामर से कई ज्यादा सरल है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा की ग्रामर लॉजिकल और साइंटिफिक है। फिर भी लोग संस्कृत को प्रोफेशन नहीं मानते। मैं यह मानता हूं कि मुझे मेरी किस्मत संस्कृत की तरफ खींच लाई है। हमें एक बात अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि रामायण और महाभारत हमारा इतिहास है। आज जब हम महाभारत की बात करते हैं तो लोगों को सिर्फ यही याद रहता है कि महाभारत में कब कौन सा युद्ध हुआ, किसने किसको मारा। जबकि महाभारत का एक तिहाई भाग पूरी तरह से भौगोलिकता पर आधारित है। बिवेक देवरॉय ने कहा कि आज कल लोग कविता पर बहुत ज्यादा फोकस करते हैं। कविता लेखन को लोग राइम से जोड़ना मानते हैं। बल्कि संस्कृत में लिखी गई कविता ही एकमात्र वो कविता है जिसमें सही राइम का उपयोग होता है। क्योंकि उसमें छंदों का उपयोग होता है। संस्कृत में 1300 से अधिक छंद है। चर्चा के दौरान उन्होंने गायत्री मंत्र की शुद्धता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि गायत्री मंत्र का मूलरूप सावित्री है। जिसे अनुष्ठु छंद कहते हैं। इसके हर लाइन में आठ अक्षर होते हैं। आज भी देश के 7 हजार घरों में संस्कृत भाषा बोली जाती है। डिस्कशन के अंत में उन्होंने आज के युवाओं को कहा कि अगर हमें सही ढंग से भारतीय संस्कृति, उसके इतिहास और विरासत को समझना है तो गूगल और वीकीपिडिया से बाहर निकल किताबों को पढ़िये। 

हर व्यक्ति तक टेक्नोलॉजी की पहुंच बेहद जरूरी- राघव चंद्रा

टेक्नोलॉजी को लेकर आयोजित सत्र में टेक गुरू गणेश नटराजन, आंत्रेप्रेन्योर अनिरुद्ध सूरी और भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल के फाउंडर राघव चंद्रा ने चर्चा की। सोसाइटी 5.0 के बारे में बात करते हुए टेक गुरू गणेश नटराजन ने सेशन की शुरुआत की। इसके बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि अब मानव आधारित बदलाव के साथ टेक्नोलॉजी के संविलियन की बात हो रही है। उन्होंने कहा कि बीते दो वर्षों में पढ़ाई का जो नुकसान हुआ है वो बहुत ज्यादा बड़ा है। ई लर्निंग के आंकड़े ऐसे हैं अगर 100 लोग कोर्स करना शुरू करते हैं तो उनमें से केवल 12 लोग ही कोर्स पूरा करते हैं। हमें ये तय कर करना होगा कि टेक्नोलॉजी के कारण लोगों के बीच डिजिटल डिवाइड न पैदा हो। अगर ऐसा हुआ तो टेक्नोलॉजी बहुत मदद कर सकती है। लोगों को सपने देखने होंगे और इन सबसे पहले सपने पूरे करने के लिए रास्ते बनाने होंगे, अगर रास्ते ना बनाते गए तो उनका विश्वास उठ जाएगा, जो एक बुरी स्थिति को जन्म दे सकता है। किसी भी देश को फिजिकल, डिजिटल और सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। इस दिशा में हमारा देश तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। डेटा प्राइवेसी को लेकर गणेश ने कहा कि जल्द ही इसपर बिल आने वाला है। उन्होंने ये भी कहा कि आपके पास अधिकार है कि आप फोन नंबर या अपनी दूसरी जानकारी देने के लिए सीधे इनकार कर सकते हैं। यूरोप में इसे लेकर नियम है, आप किसी का डेटा बिना उसकी अनुमति के उपयोग नहीं कर सकते। टेक गुरु और आंत्रेप्रेन्योर अनिरुद्ध सूरी ने कहा आज लोग दो तरीके के हैं। पहले टेक्नोलॉजी ऑप्टिमिस्ट यानी जो सोचते हैं की टेक्नोलॉजी सब कुछ सही कर देगी। दूसरे वो लोग हैं जो टेक्नोलॉजी पेसिमिस्ट हैं, यानी जो सोचते हैं टेक्नोलॉजी अच्छा और बुरा दोनों कर सकती है। ऐसे लोगों को टेक्नोलॉजी रीयलिस्ट भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी हमारे विचारों को गढ़ने का काम करती है, अगर आप अपने मूल निवास क्षेत्र जाते हैं तो आप कुछ और होते हैं, जबकि अगर आप दिल्ली जाएं तो आप कुछ और होंगे। अनिरुद्ध ने ये भी कहा कि अगर आपका बच्चा दिनभर फोन चला रहा है तो उसकी वैल्यूज अलग होंगी। टेक्नोलॉजी के कारण जो आर्थिक असमानता आ रही है, उसके कारण जियो पॉलिटिकल युद्ध तक हो सकते हैं। बीएलएफ फाउंडर राघव चंद्रा ने कहा कि आखिरी व्यक्ति तक तकनीक की पहुंच होना बहुत जरूरी है, अगर ऐसा नहीं होता तो दिक्कत हो सकती है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी इसमें बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकते है।

क्षेत्रों तक सीमित न रहें बिरसा मुंडा जैसे नायक- तुहीन ए सिन्हा

अपनी किताब बिरसा मुंडा के बारे में तुहीन ए सिन्हा ने आनंदिता पाल और श्रीराम तिवारी से चर्चा की। उन्होंने बताया कि ये किताब नॉवेल की तरह लिखी गई है, लेकिन इस बात का ध्यान रखा गया कि बिरसा मुंडा का किरदार और उससे जुड़े फैक्ट्स को वैसे का वैसा ही पेश किया जाए। 
किताब लिखने का ख्याल कैसे आया इस सवाल का जवाब देते हुए तुहीन ने कहा कि जमशेदपुर में पढ़ने के दौरान बिरसा मुंडा की मूर्तियां देखा करते थे। तब उनके बारे में बात करना भी सही नहीं समझा जाता था। धीरे धीरे ये मत बदला और अब लोग इस बारे में बात करने से कतराते नहीं हैं। ये विचार था, उसके बाद अभी जब महामारी आई तो लगा कि किताब लिखने का इससे सही वक्त नहीं मिलेगा। तभी लिखना शुरू किया। बिरसा मुंडा की कहानी का मुख्य विलेन एक मिशनरी है, अंग्रेज प्लानिंग के तहत धर्मांतरण करवा रहे थे। इसके बाद बिरसा मुंडा ने क्रांति की और एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया। 
ज्यादातर लोग इन क्रांतियों को उस वक्त छोटा समझते थे, लेकिन वक्त बीतने के साथ उसे पीछे मुड़कर देखा गया और उनके बारे में लिखा गया। जनजातीय क्षेत्र में लड़ी जा रही आज़ादी की लड़ाई कई स्तरों पर लड़ी जा रही थी। जमींदारों और मिशनरी जैसे छोटे प्लेयर्स से लोग लड़ते रहे। लेकिन पहले उन्हें अंदाज़ा ही नहीं हुआ कि अंग्रेज़ असली दुश्मन हैं। बिरसा मुंडा को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने से पहले अपने ही लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों को लगा था कि वो मिशनरी से पढ़ कर लौटेंगे और गांव की मदद करेंगे, लेकिन अंग्रेजों का विरोध करने के कारण लोगों ने सोचा कि वो गलत कर रहे हैं। इन नायकों को क्षेत्रीय नायकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ये चुनौती है कि हम इन नायकों को राष्ट्रीय नायक के रूप में सम्मान दें।

आज पूरे विश्व में 40 से 42 चीतों की प्रजाति हैं
डॉ. दिव्यभानू चावड़ा ने चीता द लास्ट एंड द लीस्ट विषय पर चर्चा करते हुए विश्व और भारत के इतिहास में चीतों के महत्व पर जानकारी दी। उन्होंने पीपीटी प्रजेंटेशन के माध्यम से हाल ही में मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के कूनो पालपुर में नामीबिया से लाये गये चीतों पर बात करते हुए बताया कि जिस समय भारत में नामीबिया से यहां चीते लाये जाने की योजना पर काम चल रहा था तो काफी लोगों ने यह सवाल उठाये कि वहां के वातावरण और हमारे यहां के वातावरण में काफी अंतर है यहां चीते सर्वाइव नहीं कर पायेंगे। लेकिन मैं इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं था। क्योंकि वो चीते हैं उन्हें पता होता है कि उन्हें किस जगह पर किन परिस्थितियों में सर्वाइव करना है। मैंने नामीबिया से चीतों को लेकर आने वाली ट्रांसपोर्ट एडवाइजर लोरीमॉकर से बात की और उन्होंने जिस जिम्मेदारी के साथ पूरे रूल्स को फॉलो किया उसका परिणाम है कि आज चीते कूनो पॉलपुर में अच्छी तरह से सर्वाइव कर रहे हैं। भारत में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 40 साल पहले टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किये थे। आज हमारे पास सिर्फ 3 से 4 हजार टाइगर है। इस दौरान डॉ. चावड़ा ने बताया कि 1860 में दाहोद, छिंदवाड़ा, बरार, सरगुजा, ग्वालियर, सिवनी, सीधी, जबलपुर ये वो जगह हैं जहां पर पहले चीते थे, लेकिन धीरे-धीरे वहां से चीते विलुप्त होते गये। आज पूरे विश्व में 40 से 42 चीतों की प्रजाति है। ईरान और एशिया और अफ्रीकन और इंडियन चीता एक समान दिखाई देते हैं।

बॉलीवुड से बॉक्स और ऑफिस दोनों गायब हो चुका है- प्रवीण 
बॉक्स ऑफिस फ्रॉम बुक्स पर चर्चा करने के लिए रेणु कौल, हरिंदर सिक्का, प्रणीण मुरछल्ले और नेहा श्रीवास्तव शामिल हुईं। इस चर्चा में हरिंदर सिक्का ने अपनी किताब राजी के बारे में बात की। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि उनकी पुस्तकों में औरत ही क्यों हीरो होती हैं। इसके साथ ही सिक्का का कहना है कि पंजाब और हरियाणा के लोग गुरुनानक साहब को फॉलो नहीं कर रहे हैं बल्कि उन्हें बेच रहे हैं। कोई भी पगड़ी पहना हुआ इंसान सिक्खिज्म को नहीं जानता हैं। वहीं ऑथर और फिल्ममेकर प्रवीण ने बताया कि इन दिनों बॉलीवुड से बॉक्स और ऑफिस दोनों ही गायब हैं। फिल्म इंडस्ट्री में एक राइटर की चुनौतियों के बारे में कहा कि यहां बहुत जल्द हमारे आइडिया गायब हो जाते हैं। आइडिया हमारा होता है लेकिन उसपर नाम किसी और का दिखाई देता है। मेरे तीन आइडिया के साथ ऐसा हो चुका है।

दिखावे वाली शादी से रीति रिवाज़ों की तरफ मुड़ना होगा- अमिता निगम सहाय

रंगदर्शिनी के सभागार में आजोजित सत्र में शादी के मुद्दे पर 2 मतों की सार्थक बातचीत हुई। 
लेखिका अमिता निगम सहाय ने शादी से जुड़ी कुरीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने शादी नामक संस्था के जरिए पुरुषों को दिए जाने वाले महत्व पर सवालिया निशान लगाए। उन्होंने कहा कि पितृसत्तात्मक समाज में होने वाली शादियों में हमेशा वधु के परिवार और वधु को छोटा समझा जाता है। 
अमिता ने कहा कि हम शादी के रीति रिवाज़ों के बारे में कम सोचते है लेकिन खाने, फैशन और स्टैंडर्ड्स के बारे में ज़्यादा सोचते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि शादी और दहेज प्रथा के कारण लड़कियों को आर्थिक बोझ के तौर पर देखा जाता है। इसी के कारण देश में लिंगानुपात कम है।वहीं, डॉक्टर किरण चड्ढा ने अपनी किताब मैजिक ऑफ़ इंडियन वेडिंग्स के बारे में बात की। उन्होंने शादियों और उससे जुड़ी प्रथाओं पर अपना विचार बताया। डॉक्टर किरण ने किताब में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हर एक प्रकार और हर एक क्षेत्र की शादियों का ज़िक्र किया है और उससे जुड़ी हर छोटी बड़ी बातें लिखी हैं।
 डॉक्टर किरण ने बताया कि किताब में उन संस्कारों को जगह दी गई है, जो शादी को पवित्र बनाते हैं। इसमें उस विश्वास को भी महत्व दिया गया है, जो एक पति पत्नी के बीच होना चाहिए। 
डॉक्टर किरण ने कहा कि पहले कई बुराइयां थी, लेकिन अब शादी को लेकर काफ़ी अच्छी बातें हुई हैं। आज लड़के की उसी तरह आरती उतारी जाती है, जिस तरीके से लड़की के पैर धोए जाते हैं। उन्होंने आगे कहा कि शादी से ही समाज को मजबूती मिलती है, इसी के चलते ये संस्था हज़ारों साल से चली आ रही है।

हमने चीन के मंसूबों का अंदाज़ा लगाने में गलती की- मनोज जोशी

अंतरंग सभागार में भारत और चीन के मुद्दे पर एक सार्थक सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में रक्षा रणनीतिकार मनोज जोशी और एंबेसडर जितेंद्र मिश्रा ने शिरकत की। मनोज जोशी की लिखी किताब का नाम अंडरस्टैंडिंग द इंडिया चाइना बॉर्डर है। चीन के मुद्दे पर किताब लिखने को लेकर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए मनोज जोशी ने कहा कि ये किताब एक पत्रकार के तौर पर लिखी गई है। इसके जरिए भारत - चीन के मुद्दे और हिमालय क्षेत्र में किस तरह की स्थिति बन रही है ये समझाने की कोशिश की है।
इसकी शुरुआत गलवान में सैनिकों की शहादत के बाद हुई। उन्होंने बताया कि 1800 से ज़्यादा इलाकों में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर विवाद है। अफगानिस्तान से लेकर नेपाल तक भारत और चीन के बीच कोई बॉर्डर निश्चित नहीं था। ये दोनों देशों के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठकर तय करना था लेकिन ये टलता रहा। मनोज जोशी ने बताया कि बीते वक्त में कई बार विवाद हो चुके थे। 2002 में पीएम वाजपाई ने बीजिंग पहुंच कर बातचीत की। मुद्दा सुलझने की स्थिति भी बन चुकी थी, लेकिन वो हो न सका। भारत और चीन के रिश्तों के बीच गलवान एक अहम मोड़ हो सकता है। इसके पहले 1975 में किसी सैनिक की विवादित इलाके में मौत हुई थी। ऐसे में ये चिंता का विषय हो सकता है। 
तिब्बत का पठार एकदम समतल है, हम उसपर नज़र भी रखते हैं। हमने देखा कि वहां पर जमावट हो रही है, लेकिन हम ये समझते रहे कि चीन केवल अभ्यास कर रहा है। हमें जब तक उनके मंसूबों का अंदाज़ा लगा, तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। हमने भी सैनिक भेजे लेकिन तब तक चीन हमें लगभग ब्लॉक कर चुका था।

जगजीत ने आम आदमी के सरोकार, दर्द और तकलीफ को गजलों में ढाला - राजेश बादल 

दास्तान-ए-जगजीत किताब के माध्यम से वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने जगजीत सिंह के जिंदगी के पन्ने पलटने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि इस किताब को लिखने में उन्हें छह वर्ष का समय लगा। भारत में अक्सर पाया गया है कि जब कोई इंसान दुनिया से चला जाता है तो हम उसे भूल जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बार-बार याद रहते हैं लेकिन उनकी कहानियां हम भूल जाते हैं। उदाहरण के तौर पर मो. रफी। रफी के गाने गाने याद है, लेकिन रफी वहां तक कैसे पहुंचे किसी को याद नहीं। जगजीत सिंह गजल के सम्राट है और उनका स्थान कभी नहीं भर पायेगा। उनकी दास्तां तकलीफ देह है, संघर्ष भरी है। जगजीत सिंह का रुझान संगीत और गीत की ओर था इसलिए उनके पिता ने उन्हें छगनलाल शर्मा जी से संगीत की शिक्षा दिलवाई। पिता की इच्छा था कि वे आध्यामिक गायन करें। लेकिन जगजीत सिंह महत्वाकांक्षा अलग थी। वे खामोशी के साथ मुंबई चले गये। वहां जाकर उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने कई होटलों और पार्टियों में रफी, हेमंत, तलत मेहमूद, किशोर कुमार के गीत गाये। राजेश बादल ने बताया कि जगजीत ने भारत में गजलों को जो स्थान दिया वो स्थान बेगम अख्तर के निधन के बाद से खाली पड़ा था। गजल की शास्त्रीयता के आधार पर उन्होंने अपने आप को प्रतिष्ठित किया। इससे गजल को भी एक सम्मानजनक स्थान मिला। 60 के दशक में यह माना जाता था कि गजल तो महफिलों की चीज है जो बड़े और अमीर लोग इसका शौक रखते हैं। जगजीत ने आम आदमी के सरोकार, दर्द और तकलीफ को गजलों में ढाला। जैसे ही वो गजलों में आया तो लोगों को लगा जैसे उनकी बात गजलों में उतर आई।

महिलाओं को 3 पहलुओं पर निवेश करना जरूरी  

अपनी किताब इक्वल येट डिफरेंट पर बात करते हुए अनिता बोगले ने महिलाओं और उनसे जुड़े मुद्दों पर प्रकाश डाला। किताब के टॉपिक और नाम पर बात करते हुए अनिता ने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि वो इस मुद्दे पर किताब लिखेंगी। लेकिन उन्होंने ये देखा कि आज भी महिलाएं लीडर के रोल में नहीं हैं। अगर वर्कफोर्स देखा जाए तो वो ठीक संख्या में हैं, लेकिन अगर लीडरशिप के रोल में देखें तो वहां तक 10 फीसदी से भी कम महिलाएं होती हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, इसी का पता करने और समाधान निकलने के लिए मैंने रिसर्च पर आधारित किताब लिखने का फैसला किया। किताब किसी काविरोध करने के लिए नहीं लिखी गई है, ना ये पुरुषों के खिलाफ है ना ही देश पर आधारित है।
खुद पर और अपने करियर पर निवेश करना
अनिता ने बताया कि महिलाओं को 3 क्षेत्रों में खास तौर पर निवेश करना ज़रूरी है -
*सपोर्ट सिस्टम अपनी टीम/क्रू बनाने में निवेश करना होगा। 
*अपनी कमियां सुधारने के लिए खुद पर निवेश करना जरूरी है। इसके लिए महिलाओं को कोर्सेज करने चाहिए। 
*अपने व्यापार के हर पहलू को समझना भी महिलाओं के लिए जरूरी है।
महामारी ने बताया कि पुरुष भी पोछा लगा सकते हैं, किचन में काम कर सकते हैं। लेकिन वर्क फ्रॉम होम के दौरान महिलाओं के साथ परेशानी भी हुई। महिलाओं के पास अक्सर एक स्विच होता है, जिसके जरिए वो ऑफिस मोड या घर के मोड में आती हैं, लेकिन महामारी में इससे।खिलवाड़ हुआ। 
महिलाएं अक्सर अचानक से चीज़ें छोड़ देती हैं, इसके बजाय उन्हें वक्त लेना चाहिए। एक अच्छा पति और एक अच्छी नौकरी ढूंढना महिलाओं के लिए जरूरी है। एक अच्छा पति आपको अर्श पर पहुंचा सकता है, या फर्श पर ला सकता है। फिर भी महिलाओं से लोग कहेंगे कि आप कुछ नहीं कर सकते, लेकिन आपकी चमड़ी मोटी होनी चाहिए।

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