नियोलैक्टा मदर्स मिल्क फोर्टिफायर प्रीमैच्योर शिशुओं के लिए वरदान है

नियोलैक्टा मदर्स मिल्क फोर्टिफायर ने बचाई है कई गंभीर नवजात शिशुओं की जान
बेंगलुरु : रियो, नायरा, अनाया और तेजस (बदले हुए नाम), सभी में एक चीज समान है- ये सभी पूरी तरह स्‍वस्‍थ हैं और इनकी ग्रोथ भी बेहतर ढंग से हो रही है। इसका श्रेय जाता है एक अनूठे प्रोडक्‍ट- मदर्स मिल्‍क फोर्टिफायर (एमएमफ) को जिसने इन सभी बच्‍चों में प्रीमैच्‍योरिटी के कारण सामने आने वाली जटिलताओं को कम करने में मदद की है। बोवाइन मिल्क से तैयार होने वाले बाजार में उपलब्ध अन्य फोर्टिफायर की तुलना में, ये फोर्टिफायर जिसने उन्हें विकसित होने और वजन बढ़ाने में मदद की है, वह इंसानी दूध से बना है। इसका परिणाम ये हुआ कि जब उन्‍हें यह देना शुरू किया गया तो अस्पताल से छुट्टी मिलने तक उनका वजन 750 ग्राम से एक बेहतर और स्थिर स्तर तक पहुंच गया। यह अनूठा प्रोडक्ट फिलहाल अभी एशिया के सिर्फ एक ही फर्म में तैयार किया जाता है, जोकि बेंगलुरू स्थित एक भारतीय स्टार्टअप है- नियोलैक्टा लाइफ साइंसेस।
यह सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है, लेकिन हां जब बात जन्म के समय कम वजन और बेहद ही कम वजन वाले शिशुओं की आती है तो इंसानी दूध से बना यह फोर्टिफायर उपचार का सबसे प्रभावी आधार है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (2017 गाइडलाइन्स) द्वारा अनुशंसित किया गया है, खासकर उनके लिये जोकि प्रीमैच्योर पैदा हुए हैं।
मदर्स मिल्क फोर्टिफायर की सफलता के बारे में, सुनील कुमार, कंट्री जनरल मैनेजर, नियोलैक्टा लाइफसाइंसेस का कहना है, “यह हमारे लिए बेहद खुशी की बात है कि हमारे मानव मिल्क-आधारित प्रोडक्ट्स, हमारे स्वामित्व वाले पेंटेट तकनीक द्वारा विकसित किए गए हैं। ये प्रीमैच्योरिटी की जटिलताओं को कम करने और अभी तक हजारों शिशुओं पर प्रभाव डालने में सहायक रहे हैं। हम लगातार देश में एमएमएफ (मदर मिल्क फोर्टिफायर) के फायदों को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि हर संभावित प्रीमैच्योर शिशु की जान बचाई जा सके और भावी पेरेंट्स को एक नई उम्मीद मिल सके।“
जब जन्म के समय नवजात का वजन एक किलोग्राम से भी कम होता है तो उस शिशु को संक्रमण होने का खतरा रहता है और कई बार वह इससे जकड़ा रहता है। संक्रमण का उपचार करने के लिये नियमित रूप से एंटीबायोटिक्स जरूरी होते हैं और लंबे समय तक उसे देने की जरूरत होती है, जिसकी वजह से अस्पताल में रुकने का समय बढ़ जाता है। कुछ मामलों में शिशु फॉर्मूला मिल्क पचा नहीं पाते और शिशुओं को उससे एलर्जी हो जाती है, जैसा कि डॉ. एनिस जॉय द्वारा बताए गए इस अनूठे केस में हुआ। उस बच्चे को बोवाइन मिल्क-बेस्‍ड फोर्टिफायर्स की वजह से काउज मिल्‍क प्रोटीन एलर्जी हो गई, जिससे उसे खाने को पचाने में गंभीर समस्या आने लगी और उसका वजन बढ़ना काफी कम हो गया (5 ग्राम/प्रतिदिन)। इसके बाद उस बच्चे को एमएमएफ दिया जाने लगा और उसमें यह समस्या कम हुई और प्रभावी रूप से वजन भी बढ़ने लगा (30 ग्राम/प्रतिदिन)। एमएमएफ का इस्तेमाल करने के बाद, दुष्परिणाम कम हो गए और वह बच्चा अच्छे वजन के साथ अस्पताल से डिस्चार्ज हुआ।
हैदराबाद के रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में एमएमएफ+ का इस्तेमाल कर, 14 बेहद ही प्रीमैच्योर और कम वजन वाले शिशुओं को बचाया गया। गाय के दूध से बने फोर्टिफायर से दूध को नहीं पचा पाने की परेशानी, सिलसिलेबार लक्षण,या थ्रोम्बोसाइटोसिस वाले नवजात शिशुओं पर रेस्क्यू थैरेपी का उपयोग किया गया था, जैसा कि डॉ. भारद्वाज, एट अल द्वारा बाल चिकित्सा के एक भारतीय जर्नल में प्रकाशित किया गया था। इस अस्पताल की शाखाओं के विभिन्न अस्पतालों में, एक बच्चा 27 हफ्ते में केवल 550 ग्राम वजन के साथ पैदा हुआ, जोकि जन्म के समय रेस्पेरेटरी फेल्यिर के साथ एनआईसीयू में भर्ती हुआ। उस बच्चे में फीड इंटोलरेंस पाया गया और जन्म के 10 वें दिन एनईसी और बीपीडी की वजह से उसका पेट फूल रहा था। डॉ. तेजस के अनुसार, एमएमएफ+ शुरू करने के बाद, बच्चा ठीक हो गया और डिस्चार्ज कर दिया गया।
कंपनी के पास प्रोप्राइटी तकनीक है जिसमें नियोलैक्टा पाउडर के रूप में दुनिया की पहली मां के दूध से बने फोर्टिफायर का उत्‍पदन करता है जो अतिरिक्त प्रोटीन, इम्युनोग्लोबुलिन और एचएमओ का पूरक होता है ताकि बच्चे को छोटे घूंट में एक भरपूर पोषण मिल सके। इसके पाउडर रूप के कारण उत्पाद को कमरे के तापमान से दूर भी ले जाया जा सकता है, जिससे इसका इस्तेमाल करना और कॉम्‍प्‍लायंस आसान हो जाता है।
“यह कंपनी गंभीर तथा खर्च वहन ना कर पाने वाले शिशुओं के लिए, अपने सीएसआर पहल के माध्यम से ‘अमृत’ भी उपलब्ध कराती है, इससे इस साल 200 से भी ज्यादा बच्चे लाभान्वित हुए हैं।”
स्तनपान कराने वाली मांओं द्वारा दिए जाने वाले दूध के संग्रह के लिए नियोलैक्टा ने विश्वसनीय थर्ड-पार्टी एनजीओ, अस्पतालों और डिजिटल माध्यमों के साथ साझीदारी की है। डोनर की सेहत, दूध के दूषित होने और एक्सपायरी को लेकर चिंताओं को खत्म करने के लिए पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और सख्ती से एसओपी द्वारा संचालित होती है।

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