चुनावी दौर में EVM कितनी सुरक्षित, जानें सबकुछ


इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (जिसे ईवीएम भी कहा जाता है) एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है जिसका प्रयोग मतदाता चुनावों के दौरान मतदान करने के लिए करते हैं । भारत मे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के प्रयोग से पहले बैलेट पेपर के माध्यम से मतदान किया जाता था और मैनुअल गिनती होती थी। फर्जी मतदान और बूथ कैप्चरिंग के कारण पेपर बैलेट विधि की व्यापक रूप से आलोचना के बाद ईवीएम को प्रयोग मे लाया गया। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को 1990 के दशक में राज्य के स्वामित्व वाली इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स ने मिलकर विकसित किया। ईवीएम का प्रयोग 1998 और 2001 के बीच भारतीय चुनावों में चरणबद्ध तरीके शुरू किया गया। लेकिन अभी समय-समय पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से छेड़छाड़ के आरोप लगते रहे हैं।

भारत मे ईवीएम की शुरुआत

भारत मे ईवीएम का पहली बार प्रयोग 1982 में केरल के परावुर विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव मे सीमित संख्या में मतदान केंद्रों पर किया गया था। आम चुनाव मे ईवीएम का पहली बार इस्तेमाल 1999 में गोवा विधानसभा (पूरे राज्य) चुनाव में किया गया था। इसके बाद 2004 में लोकसभा चुनावों के लिए केवल ईवीएम का उपयोग करने का फैसला किया गया।

ईवीएम काम कैसे करती है?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम ) मे दो यूनिट – कंट्रोल यूनिट और बैलट यूनिट होती है। ये दोनों यूनिट एक केबल के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े रहते है। ईवीएम की कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी के पास रखी जाती है। बैलट यूनिट को मतदाताओं द्वारा मत डालने के लिए वोटिंग कंपार्टमेंट केअंदर रखा जाता है। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि मतदान अधिकारी आपकी पहचान की पुष्टि कर सके। मशीन पर अभ्यर्थी के नाम और / या प्रतीकों की एक सूची उपलब्ध होगी जिसके बराबर में नीले बटन होंगे। मतदाता जिस अभ्यर्थी को वोट देना चाहते हैं उनके नाम के बराबर में दिए बटन दबा सकते हैं।

 

कितनी सुरक्षित है ईवीएम ?

ईवीएम बिजली से नहीं बल्कि बैटरी द्वारा संचालित होती हैं। कंट्रोल यूनिट और बैलट यूनिट दोनों इकाइयाँ एक दूसरे के बिना काम नहीं कर सकती हैं। चुनाव के दिन मतदान समाप्त होने के बाद दोनों यूनिटों को अलग कर बंद और सुरक्षित जगहों पर रख दिया जाता है। ईवीएम को कुछ इस प्रकार से बनाया गया है कि मतदाता एक बार इसमें मतदान करने के बाद जितना भी चाहें दूसरी बार मतदान नहीं कर सकता है। कंट्रोल यूनिट और बैलट यूनिट दोनों इकाइयाँ में कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। उनके हार्डवेयर, डिजाइन को निर्माण के समय केवल एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है और उन्हें वापस प्रोग्राम नहीं किया जा सकता है। ईवीएम को और ज्यादा सुरक्षित करने के लिए ईवीएम को संचालित करने के लिए बिजली की जगह बैटरी का विकल्प चुना गया है। भारत में वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन वीवीपीएटी क्षमता के साथ एम 3 संस्करण की प्रयोग हो रही है। चुनाव आयोग द्वारा एम3 संस्करण की ईवीएम का हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को एक विशेष मतदान इकाई के साथ काम करने में सक्षम बनाया है। जिससे मशीन के साथ छेड़छाड़ करना और मुश्किल हो जाता है। सुरक्षा के मद्देनजर ईवीएम को कई परतों में सील भी किया जाता है।

VVPAT का प्रयोग

ईवीएम की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने के बाद चुनाव आयोग ने प्रोफेसर पी वी इंदिरेसन (आईआईटी-एम के पूर्व निदेशक) की अध्यक्षता में पेपर ट्रेल शुरू करने की संभावना को लेकर एक समिति का गठन किया गया। अध्ययन के बाद समिति ने वीवीपीएटी प्रणाली शुरू करने की सिफारिश की। अब मतदाताओं को मतदान के बाद एक प्रिंटआउट मिलता है जिसमे उस पार्टी का चुनाव चिह्न होता है जिसे मतदाता ने वोट किया है। 9 अप्रैल 2019 को, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के चुनाव आयोग को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में वीवीपीएटी पेपर ट्रेल सिस्टम का उपयोग करने का आदेश दिया।

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