मोतीलाल वोरा जैसा कोई नही

राजेन्द्र कोठारी
मध्यप्रदेश । छत्तीसगढ़ ही नहीं देश की राजनीति में मोतीलाल वोरा का महत्व इसलिए था कि वे साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से राजनीति में आये थे l उन्होने मुख्यमंत्री राज्यपाल केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर रहकर शिखर का स्पर्श किया l उनके साथ ना शुक्ल बंधुओ की तरह समृद्ध पारिवारिक विरासत साथ थी और ना वे अर्जुनसिंह दिग्विजय सिंह की तरह राजघराने और ना कमलनाथ की तरह उद्योगपति की पृष्ठभूमि से आये थे l

1986 में होषंगाबाद बैतूल जिले के आदिवासी किसानों की विभिन्न मांगों को लेकर समता संगठन -किसान आदिवासी संगठन ने भौरा (बैतूल ) से भोपाल तक विशाल पदयात्रा की थी l उस पदयात्रा का एक छोटा सा सिपाही मैं भी था l पदयात्रा का नेतृत्व हमारे दिवंगत साथी राजनारायण और सुनील कर रहे थे l आदिवासी स्त्री पुरुषों ने अपने साथ चार पांच दिन की भोजन सामग्री सामग्री के साथ भोपाल की ओर कूच किया था l और 150 किलोमीटर की दूरी तय कर भोपाल पहुंचे थे l भोपाल में हम लोग जुलूस बनाकर सीधे मुख्यमंत्री के बंगले तक पहुंच गए l उस समय मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा थे l अधिकारियों ने कहा कि 5 लोगो का प्रतिनिधि मंडल अंदर जाकर मुख्यमंत्री से मिल सकता है l हम सब लोग अड़ गए कि हम सब लोग इतनी दूरी से पैदल चल कर यहां आए है इसलिए सब उनसे मिलेंगे l दो तीन घण्टे की बहस और हुज्जत के बाद अंदर से खबर आई कि सबको आने दो l हम सब लोग मुख्यमंत्री आवास में पहली बार अंदर घुसे l वहां एक पांडाल लगा हुआ था सबके बैठने के लिए बिछायत बिछी थी l मुख्यमंत्री वोरा जी और उस समय के इटारसी विधायक विजय दुबे काकू भाई सामने मंच पर आए l हमारे नेताओं ने उनके सामने केसला क्षेत्र में पानी के संकट सहित अन्य मांगों को बिंदुवार प्रस्तुत किया l बारी बारी से हर मांग पर विस्तार से चर्चा हुई l उस समय केसला अंचल के जल संकट के निराकरण के लिए हमारे संगठन ने तवा से पानी लिफ्ट करके लाने का सुझाव दिया था l बाहर हम सरकार के खिलाफ नारे बाजी कर रहे थे और सरकार अंदर इस सौजन्यता से पेश आ रही थी यह देखकर हमें आश्चर्य हो रहा था l  
हम लोग चाहते थे कि मांगो के निराकरण की समय सीमा हो l सरकार ने हर समस्या के समाधान की एक अनुमानित समय सीमा का आश्वासन दिया l ये अलग बात है कि उनमें से अधिकांश मांगे समय सीमा में पूर्ण न हो सकी l उस समय मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने जो शालीनता दिखाई वह निश्चय ही प्रशंसनीय थी l बाद में पदयात्रा करते हुए भोपाल आये सभी 1500 लोगों के घर वापिसी के लिए सरकार ने राज्य परिवहन की बसों का इंतज़ाम किया l 

1991 में भाजपा शासन के दौरान बनखेड़ी में आदिवासियों पर अत्याचार के खिलाफ समता संगठन द्वारा पिपरिया के मंगलवारा चौराहे पर धरना चल रहा था l उस समय मोतीलाल वोरा अपने राजनैतिक प्रवास पर पिपरिया आये थे वे समय निकालकर हम लोगो से मिलने धरना स्थल पर आए और कुछ देर रुक कर सारे घटनाक्रम को समझा l भोपाल जाकर वोरा जी ने बयान जारी कर बनखेड़ी में हुए अत्याचार की निंदा करते हुए न्यायिक जांच की मांग की थी l
यह मुख्यमंत्री के रुप में मोतीलाल वोरा के लोकतांत्रिक व्यवहार का यह एक उदाहरण है जो उनके विरोध में नारे बाजी करने वालो से भी संवाद करता था l जिद्द पर नहीं अडता था l

आज की सरकारों से इस तरह के लोकतांत्रिक व्यवहार की उम्मीद ही नही की जा सकती l आज सरकार की नीतियों के खिलाफ आंदोलन करने वालों को अर्बन नक्सल ,टुकड़ा टुकड़ा गैंग ,खलिस्तानी पाकिस्तानी कहकर दमन किया जाता है l विरोध में उठी कोई आवाज़ बर्दाश्त नही की जाती l ऐसा माहौल बना दिया गया है मानो सरकार का विरोध ही देश का विरोध है और विरोध करने वाले देशद्रोही है l

मोतीलाल वोरा ने एक पत्रकार के रूप में कई वर्ष कार्य किया l उनके राजनैतिक जीवन की शुरुआत संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से हुई थी l बाद में वे तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचन्द सेठी के प्रभाव से काँग्रेस में आये l कांग्रेस में आकर एक सच्चे कांग्रेसी बनकर विभिन्न पदों पर पूर्ण निष्ठा के साथ निर्विवाद रहकर कार्य किया l राज्य के मंत्री मुख्यमंत्री ,केंद्रीय मंत्री राज्यपाल जैसे पदों को सुशोभित किया l कांग्रेसी होकर भी उनके समाजवादी संस्कार सदा उनके साथ रहे l उनके राज में गरीबो किसानों मजदूरों के आंदोलन का ना दमन किया गया और ना उसकी उपेक्षा की गई l उन्होंने वंचित और शोषित वर्ग के लिए जो किया वह कोई अहसान नहीं था बल्कि उसे अपनी सरकार का कर्तव्य माना l 

वोरा जी के बाद हमारा लगभग हर मुख्यमंत्री से वास्ता पढा ( व्यक्तिगत नहीं ) लेकिन वोरा जी जैसी सरलता शालीनता और संवेदनशीलता फिर कभी देखने में नहीं आई l सत्ता के अहंकार ने कभी उनका दिमाग खराब नहीं किया l

मोतीलाल वोरा जी का सादर स्मरण

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