08 दिसंबर को भारत को मिली थी पहली पनडुब्बी 'कलवरी', दुनिया की सबसे घातक पनडुब्बियों में शुमार


भारत की लंबी तटीय सीमा देश की विकास यात्रा के वाहक के रूप में काम करती है। इसलिए इसकी सुरक्षा सामरिक दृष्टि के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी काफी अहम हो जाती है। आजादी के बाद भारतीय तटीय सीमा की सुरक्षा से जुड़े मामलों में आज की तारीख यानि 08 दिसंबर इतिहास में दर्ज है। दरअसल 08 दिसंबर 1967 को पहली पनडुब्बी ‘कलवरी’ को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था। इतिहास में दर्ज यह तारीख भारत की हिफाजत में लगी सेनाओं के लिए खास अहमियत रखती है।

दुनिया की सबसे घातक पनडुब्बियों में शुमार है 'कलवरी'

भारतीय सुरक्षा के लिए अहम नौसेना की पहली पनडुब्बी कलवरी सोवियत संघ से मिली थी। इसका नाम हिंद महासागर में पाई जाने वाली खतरनाक टाइगर शार्क के नाम पर रखा गया। इसके बाद विभिन्न श्रेणियों की बहुत सी पनडुब्बियां नौसेना का हिस्सा बनीं। फ्रांस के सहयोग से देश में ही निर्मित स्कार्पीन श्रेणी की आधुनिकतम पनडुब्बी को 2017 में नौसेना में शामिल किया गया और इसका नाम भी ‘कलवरी’ ही रखा गया। कलवरी को दुनिया की सबसे घातक पनडुब्बियों में से एक माना जाता है। कलवरी समुद्र के नीचे खामोश प्रहरी की तरह रहती है। जरूरत पड़ने पर यह दुश्मन की नजर बचाकर सटीक निशाना लगाने और भारी तबाही मचाने में सक्षम है।

30 हजार KM से अधिक दूरी तय कर पहुंची भारत

सोवियत संघ के रीगा बंदरगाह से यह भारत के लिए चली थी। कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहा रीगा अब लात्विया की राजधानी है। जुलाई 1968 में "कलवरी" भारत के विशाखापत्तनम पहुंची। रीगा से विशाखापत्तनम पहुंचने में इस सबमरीन को तीन महीने लगे थे। इस दौरान इसने 30 हजार 500 किलोमीटर से ज्यादा का सफर किया। जिस दौरान भारत की "कलवरी" रीगा से विशाखापत्तनम की यात्रा कर रही थी। उसी दौरान तीन ताकतवर देशों अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ की तीन सबमरीन समुद्र में डूब गई थीं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में सबमरीन का संचालन कितना कठिन रहा होगा।

30 वर्ष की सेवा के बाद किया गया सेवानिवृत्त

भारतीय नौसेना में शामिल होने के चार साल बाद ही इस सबमरीन ने 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में अपने जौहर दिखाए। इस जंग में 8-9 दिसंबर की रात भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह तबाह कर दिया था। इसे ऑपरेशन ट्राइडेंट नाम दिया गया था। इस ऑपरेशन में इस सबमरीन की अहम भूमिका थी। इसे 31 मार्च, 1996 को 30 वर्ष की राष्ट्र सेवा के बाद नौसेना से सेवानिवृत्त कर दिया गया।

प्रोजेक्ट- 75 के तहत पनडुब्बियों का हो रहा निर्माण

भारतीय नौसेना के प्रोजेक्ट- 75 के तहत कलवरी श्रेणी में आने वाली पनडुब्बियों का निर्माण हो रहा है। कलवरी-श्रेणी में भारतीय नौसेना के लिए बनाई जा रही डीजल-विद्युत से चालित आक्रमणकारी स्वदेशी पनडुब्बियां शामिल हैं। इस परियोजना के तहत भारतीय नौसेना की छह पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक अटैक पनडुब्बियों का निर्माण हो रहा है। प्रोजेक्ट- 75 के तहत बन रही पनडुब्बियों में एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP), स्पेशल ऑपरेशन फोर्स (SOF), एंटी-शिप वारफेयर (AShW) शामिल हैं। पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW), सतह-विरोधी युद्ध (ASuW) और भूमि-हमले की क्षमता होने के कारण ये अत्यधिक शक्तिशाली और स्ट्रटीजिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इससे पहले परियोजना-75 पनडुब्‍बी कार्यक्रम के अन्‍तर्गत कलवारी, खंडेरी, करांज और वेला पनडु‍ब्बियां भारतीय नौसेना में शामिल की गई हैं जबकि पांचवीं पनडुब्‍बी वागशीर का परीक्षण शुरू किया गया है।

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