आतंकवाद अब बर्दाश्त नहीं, केंद्र सरकार लगातार कर रही सख्त कार्रवाई

नई दिल्ली । आज देश में 26/11 को हुए आतंकी हमले की 14वीं बरसी मनाई जा रही है। इसी दिन हम उन 166 लोगों को याद करते हैं जिन्होंने 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले में अपने प्राण गंवाए थे और अनगिनत अन्य जो उस हमले में घायल हुए थे। मुंबई में हुए इस कायराना हमले के बाद सरकार ने पिछले सात-आठ साल में दुनिया को यह मैसेज दे दिया है कि भारत अपने पीठ पर आतंक का घाव अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारत पलटकर मुंहतोड़ जवाब जरूर देगा। यदि गौर करें तो 26/11 अटैक के बाद भारत ने अपनी कथनी को हकीकत में तब्दील करके बताया है। भारत ने ऐसा कोई मौका नहीं गवांया जहां उसने आतंकवाद जहरीला फन न कुचला हो। फिर चाहे वह सीमा पर हो या देश के भीतर। आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए भारत लगातार अपने सुरक्षा तंत्र को मजबूत कर रहा है और पूरे विश्व को इस लड़ाई में एकजुट करने में लगा है।

आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खड़े हुए दुनिया के तमाम देश

गौरतलब हो, बीते माह यानि अक्टूबर 2022 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद रोधी समिति की बैठक में भी भारत ने आतंकवाद से लड़ने के लिए सभी देशों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठने को कहा था। भारत में संपन्न हुए अपने दो दिवसीय सम्मेलन में 29 अक्टूबर को सदस्य देशों से आतंकवादी गतिविधियों को कतई बर्दाश्त नहीं करने की अपील की थी। वहीं आतंकवाद रोधी समिति के सफल नेतृत्व के लिए यूएनएससी के सदस्यों ने भारत को सराहा।

आतंकवाद के अभिशाप को हराने के लिए दुनिया के समक्ष रखी अपनी बात

संयुक्त राष्ट्र में वित्तीय कार्रवाई कार्य बल यानि FTF और एग्मोंट समूह जैसे अन्य मंचों पर भारत ने सुरक्षा परिषद प्रतिबंध व्यवस्था के प्रभावी और पारदर्शी कामकाज को सुनिश्चित करने पर लगातार जोर दिया है और कहा है कि राजनीतिक कारणों से इन पर प्रभाव न पड़े। भारत ने कहा कि आतंकवादी समूहों को सूचीबद्ध करने के उद्देश्य और साक्ष्य आधारित प्रस्तावों, विशेष रूप से वित्तीय संसाधनों तक उनकी पहुंच रुकनी चाहिए। भारत ने यह भी कहा कि आतंकवाद के अभिशाप को हराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और आतंकवादियों तथा उनके प्रायोजकों के खिलाफ ठोस कार्रवाई हो, जिनमें उनके सुरक्षित पनाहगाहों, ठिकानों, प्रशिक्षण शिविरों और वित्तीय और वैचारिक के साथ-साथ राजनीतिक समर्थन संरचनाओं को नष्ट करना शामिल है। भारत ने यह भी कहा कि सभी देशों को आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध, मादक पदार्थो और हथियारों की तस्‍करी के बीच संबंधों को पहचानना चाहिए और इसके लिए प्रयास तेज किए जाने चाहिए। भारत ने सभी देशों से आतंकवादी समूहों द्वारा धन उगाहने और वित्त पोषण के लिए आभासी मुद्राओं जैसी नई और उभरती प्रौद्योगिकियों के उपयोग को रोकने का हल निकालने का अनुरोध किया। भारत के प्रधानमंत्री आतंकवादियों की वित्तीय मदद रोकने के संबंध में पहले भी कह समझा चुके हैं कि एक आतंकवादी को हथियारों और तत्काल सामरिक प्रतिक्रियाओं से बेअसर किया जा सकता है, लेकिन उन्‍हें गैरकानूनी तरीके से मिलने वाले धन को चोट पहुंचाए बिना हम इन रणनीतिक लाभों को गंवा देंगे। इसे पूरी दुनिया को समझने के विशेष जरूरत है।

देश में चला छापेमारी अभियान

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र व खुले और विविध समाजों में से एक भारत दशकों से आतंकवाद का शिकार रहा है, लेकिन जब से केंद्र में पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी है आतंकवाद का असर कम होता चला गया है। यही कारण है कि बीते 6-7 साल में देश में आतंकवादी घटनाओं का ग्राफ तेजी से गिरा है। इस बारे में हाल ही में ‘नो मनी फॉर टेरर’ मंत्रिस्‍तरीय सम्‍मेलन में पीएम मोदी ने कहा “हम एक अकेले हमले को भी कई हमलों की तरह मानते हैं। एक जनहानि भी अनेक जनहानि के बराबर है। इसलिए, जब तक आतंकवाद जड़ से खत्म नहीं हो जाएगा, हम चैन से नहीं बैठेंगे।” “अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद नाम की कोई चीज नहीं है। यह मानवता, स्वतंत्रता और सभ्यता पर हमला है। इसकी कोई सीमा नहीं है।”

आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस अपना रहा भारत

याद हो पीएम मोदी ने कहा था कि “केवल एक समान, एकीकृत और जीरो टॉलरेंस का दृष्टिकोण ही आतंकवाद को पराजित कर सकता है।” “आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को इसकी कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए।” ये आदेश मिलने के पश्चात भारत सरकार ने यही रुख अपनाया है। केवल इतना ही नहीं केंद्र सरकार की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति कारगर भी साबित हो रही है। आतंकवाद पर निर्णायक जीत हासिल करने के लिए NIA और अन्य एजेंसियों को मजबूत किया जा रहा है, 2024 से पहले सभी राज्यों में NIA की शाखा स्थापित करके आतंकवाद-रोधी नेटवर्क खड़ा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। बीते दिनों देश में NIA और ED द्वारा बड़े छापेमारी अभियान चलाए गए जिन्होंने देशविरोधी

गतिविधियों और आतंकवाद को रोकने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। वहीं हमारी सीमा सुरक्षा और तटीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीमावर्ती राज्यों को केंद्रीय एजेंसियों और सुरक्षाबलों के साथ मिलकर अधिक समन्वित प्रयास करने की दिशा में बड़ा कदम उठाए गए हैं।

नॉर्थ-ईस्ट बना विकास का हॉट-स्पॉट 

गौरतलब हो, जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट, जो पहले कभी हिंसा और अशांति के हॉट-स्पॉट होते थे, वे अब विकास के हॉट-स्पॉट बन रहे हैं। यानि बीते 8 साल में पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा की स्थिति में काफी सुधार हुआ है और 2014 के बाद से उग्रवाद की घटनाओं में 74%, सुरक्षा बलों के हताहतों की संख्या में 60% और नागरिकों की मृत्यु में लगभग 90% की कमी आई है। इसके अलावा NLFT, बोडो, ब्रू, कारबी आंगलोंग समझौते करके क्षेत्र में चिरस्थायी शांति स्थापित करने के प्रयास किए गए हैं जिनके अंतर्गत करीब 9 हजार से अधिक उग्रवादियों ने सरेंडर किया है। नॉर्थ ईस्ट में शांति बहाल होने से 60% से अधिक क्षेत्रों से AFSPA को हटा लिया गया है। वहीं वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा की घटनाओं में 77 प्रतिशत की कमी आई है और इन घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में 85% से अधिक की कमी दर्ज की गई है। इसे सरकार की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर में शांति और प्रगति की हुई नई शुरुआत

याद हो, 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के बाद से वहां शांति और प्रगति की एक नई शुरुआत हुई है। 5 अगस्त, 2019 के पहले के 37 महीनों और बाद के 37 महीनों की अगर तुलना की जाए तो आतंकवादी घटनाओं में करीब 34% और सुरक्षाबलों की मृत्यु में 54% की कमी दर्ज की गई है। यही है वर्तमान सरकार की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति जिसने ये निर्णायक जीत हासिल करने के लिए एनआईए और अन्य एजेंसियों को मजबूत किया है। फिलहाल देश में 2024 से पहले सभी राज्यों में एनआईए की शाखा स्थापित करके आतंकवाद-रोधी नेटवर्क खड़ा करने के और तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं यानि भारत अब तब तक नहीं रुकेगा जब तक कि वह आतंकवाद का नाम-ओ-निशान नहीं मिटा देगा।

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