शिक्षा, संस्कृति और शंकराचार्य पर हुए वैचारिक सत्रों के नाम रहा विश्वरंग 2022

विचारक पवन वर्मा, डॉ. विनय सह्स्रबुद्धे और शिक्षाविद् डॉ. मुकुल कनिटकर ने विभिन्न सत्रों में रखे अपने विचार

भोपाल। विश्वरंग 2022 टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव का दूसरा दिन वैचारिक सत्रों के नाम रहा। इसमें दिन की शुरुआत “अद्वैतवाद, शंकराचार्य और रूमी” विषय पर चर्चा से हुई जिसमें विचारक और लेखक पवन वर्मा ने भारतीय संस्कृति परंपरा एवं अद्वैतवाद पर चर्चा करते हुए कहा, कि वास्तव में हमें यह बात समझने की जरूरत है कि हमारे यहां विचार की परंपरा कितनी बड़ी है। लेकिन अब हम मूल जड़ों से अलग हो रहे हैं और अपने विचारों से भी अलग होते जा रहे हैं। वास्तव में हिंदू धर्म जीवन शैली है, इस जीवन शैली को समझना और उस पर जीवन जीना ही हमारा ध्येय होना चाहिए। उन्होंने आदिशंकराचार्य जी के जन्म से लेकर समाधि की समस्त यात्राओं के बारे में बड़ी बारीकी से उल्लेख करते हुए कहा कि शंकराचार्य की दृष्टि को आज विज्ञान पूर्ण रूप से भी नहीं देख पा रहा है, जो उन्होंने वर्षों पहले देख लिया था। आगे उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अद्वैतवाद दर्शन के अलावा भी और 6 दर्शन है। जिसकी जानकारी कम लोगों को है। इस दौरान श्री संतोष चौबे ने पूछा कि ब्रह्म सूत्र क्या है। इसके जवाब में पवन वर्मा ने कहा कि ब्रह्म क्या है और ब्रह्मांड क्या है, इसके बारे में जानना ही ब्रह्मसूत्र है। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वरंग के निदेशक श्री संतोष चौबे ने की। 

विश्व के कोने-कोने में है भारत की संस्कृति, कला एवं भाषा की समझ की गूंज
द्वीतीय वैचारिक सत्र का आयोजन “भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रभाव” विषय पर मिंटो हॉल के मुख्य सभागार में किया गया। इस सत्र में अध्यक्ष के रूप में विश्व रंग के निदेशक संतोष चौबे तथा आभासी माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष डॉ विनय सहस्रबुद्धे मौजूद रहे। डॉ विनय सहस्रबुद्धे ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत की संस्कृति, कला एवं भाषा की समझ की गूंज विश्व के कोने-कोने में है। इसके लिए भारत की अनाक्रमणकारी नीति, पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान एवं अनिवासी भारतीयों का वैश्विक प्रभाव प्रमुख रूप से कारक है। आज पूरा देश भारत को विश्व गुरु मान रहा है क्योंकि सभी देश अपनी समस्या का समाधान भारत देश के वैचारिक समझ में देखते हैं। संतोष चौबे ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि हम लोगों ने एक पुस्तक प्रकाशित की है जो हिंदी भाषाओं की मौजूदा स्थिति को 40 देशों में दर्शाती है। हमें पूर्ण विश्वास हैं कि इसके विस्तार पर वैश्विक स्तर पर एक समूह के रूप में हम और अच्छे से काम कर सकेंगे। 

चार स्तरों पर कार्य करती है नई शिक्षा नीति
 साहित्य और कलाओं के अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति विषय पर चर्चा करते हुए भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय महामंत्री श्री मुकुल कनिटकर ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति अपनी संरचना, पाठ, प्रविधि व उद्देश्य में भारतीयता पर आधारित है। यह शिक्षा नीति चार स्तरों पर कार्य करती है। पहला, व्यक्ति के स्तर पर- उसके सर्वांगीण विकास के लिए जिसमें कि भावना, बुद्धि, शरीर, मन व आध्यात्मिकता शामिल है। इसी तरह दूसरा सामाजिक स्तर पर है जो सामाजिक योगदान के लिए तत्पर रहे। तीसरा, राष्ट्र निर्माण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो। और चौथा, वह पर्यावरण की चिंता करते हुए विश्व कल्याण के लिए कार्य करने वाला नागरिक बने। इस दौरान सत्र में वक्ता के रूप में पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अंग्रेजी की ज्ञान प्रणाली का विरोध नहीं है। यह स्व की पहचान का एक विशिष्ट उपक्रम है। भारतीयता का अर्थ आत्मा को स्थापित करना है। कार्यक्रम में संतोष चौबे भी उपस्थित रहे।

मंगलाचरण में बाँसुरी की धुन पर हुए सभी मंत्रमुग्ध
पहले दिन की शुरुआत इंदौर से पधारे श्री संतोष संत और उनके द्वारा स्थापित स्वर वेणु गुरुकुल के योग्य शिष्यों के सामूहिक बांसुरी वादन से हुई। श्री संतोष संत ने राग “मंगल भैरव” में बनाई अपनी स्वर रचना की सामूहिक प्रस्तुति से मंगलाचरण की बेला को एक दिव्य अनुभूति प्रदान की। 

समानांतर सत्रों में दिखा साहित्य का समंदर
इसके बाद समानांतर सत्रों की शुरुआत हुई। इसमें “कथेतर गद्य : नयी संभावनाएं” पर बात करते हुए अनिरूद्ध उमट ने संस्मरण का वाचन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता ओम थानवी ने की। साथ मे बतौर वक्ता शरद कोकास भी उपस्थित रहे। 
'लेखक से मिलिये' कार्यक्रम में सक्रिय हस्ताक्षर युवा कथाकार चंदन पांडे और मो आरिफ से रचना प्रक्रिया पर बातचीत की। इस दौरान चंदन पांडे ने कहा कि किसी भी लेखक के लिये सबसे ज़रूरी खोज रहती है कि जो चल रहा होता है उसमे खुद को अलग से कैसे आइडेंटिफाई करें। साथ ही मो आरिफ ने अपनी कहानी 'दिल पत्थर' पर बात करते हुए कहा कि हर समाज में अलग अलग समूहों के बीच फ्रिक्शन बना ही रहता है। 
इसके विश्व कविता, भारतीय स्त्री लेखन : विश्व दृष्टि, चित्रकला- चित्र और चित्रण, अनुवाद का अंतः राग, कथेतर गद्य़ : नयी संभावनाएं, हिंदी-उर्दू प्रेम कविताएं, राजनीति, कहानियां और साहित्य, विश्वरंग की विश्वदृष्टि और पत्रिकाएं एवं लेखक से मिलिए सत्रों का आयोजन हुआ।

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PRAJA PARKHI: शिक्षा, संस्कृति और शंकराचार्य पर हुए वैचारिक सत्रों के नाम रहा विश्वरंग 2022
शिक्षा, संस्कृति और शंकराचार्य पर हुए वैचारिक सत्रों के नाम रहा विश्वरंग 2022
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