काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का अनोखा आश्चर्य: 314 इमारतों का अधिग्रहण, 390 करोड़ का भुगतान और पेंडिंग केस जीरो: Latest News

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कहा जाता है भारत में शायद ही ऐसा कोई बड़ा प्रोजेक्ट होता है, जिसमें कोई कानून पेच नहीं फंसता. और अगर ये कोई अखंड सत्य नहीं है तो कोई अतिशयोक्ति भी नहीं है. कानूनी अड़ंगा हमारे देश की सच्चाई जिससे ज्यादातर बड़ी योजनाओं या प्रोजेक्ट को दो-चार होना पड़ता है. इसलिए हैरानी नहीं होती जब सेंट्रल विस्टा के पुनर्निमाण से जुड़े फैसले को भी कोर्ट में चुनौती मिल जाती है. और अगर कोई मामला धार्मिक स्थलों से जुड़ा हो तो उसका कानूनी पचड़े में फंसना लाजिमी ही है.

लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसके बावजूद कि इस प्राचीन-ऐतिहासिक स्थल से जुड़े कुछ विवाद कई सालों से चले आ रहे हैं. सच तो ये है कि जिस कॉरिडोर प्रोजेक्ट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 13 दिसंबर को करने जा रहे हैं उससे जुड़ा एक भी कानूनी मामला भारत के किसी भी कोर्ट में पेंडिंग नहीं है.

5000 हेक्टेयर में फैला है प्रोजेक्ट

जमीन और संपत्ति के अधिग्रहण और मुआवजे के बंटवारे से लेकर इन संपत्तियों को किराएदारों और अतिक्रमणकारियों से खाली कराने और प्रभावित लोगों के पुनर्निवास तक न सिर्फ 5000 हेक्टेयर में फैले इस विशालकाय प्रोजेक्ट को रिकॉर्ड समय में पूरा कर लिया गया बल्कि इसमें कोई कानूनी व्यवधान भी नहीं आने दिया गया.

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जब प्रधानमंत्री मोदी इसका उद्घाटन कर रहे हैं तो जहां कुछ लोग इसे बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक कहेंगे और बाकी इसके ईर्द-गिर्द विवाद ढूंढने की कोशिश करेंगे. लेकिन गौर करने की बात ये है कि इस प्रोजेक्ट की नींव पीएम मोदी ने पिछले आम चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले मार्च 2019 में रखी थी. और कई जानकारों का दावा है कि बीजेपी को इसका फायदा भी मिला.

इस प्रोजेक्ट का मकसद काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा नदी को जोड़ना और प्राचीन मंदिर के आसपास मौजूद अवरोधों को हटाना था. ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ब्रीफ बिलकुल स्पष्ट था, उन्होंने कहा था, एक ऐसा रास्ता बनाओ कि मन प्रफुल्लित हो जाए.’ इसका खुलासा कॉरिडोर डिजाइन करने वाले मशहूर आर्किटेक्ट बिमल पटेल ने हाल ही में एक वेबिनार के दौरान किया.

शायद पीएम मोदी का विजन महात्मा गांधी के सपने को साकार करना था, जो एक सदी पहले यानी 1916 में वाराणसी गए थे. उस दौरान उन्होंने मंदिरों के संकरे रास्तों और साफ-सफाई की कमी को लेकर नाराजगी जाहिर की थी. पटेल ने आगे ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए बताया, ‘बीएचयू में अपने भाषण में महात्मा गांधी ने सवाल खड़ा किया कि अगर हमारे मंदिरों की हालत ऐसी ही रहेगी तो भविष्य में हमारे देश का क्या होगा?’

नया कॉरिडोर जब आम जनता के लिए खुल जाएगा तो हर कोई घाट से सीधे भव्य मंदिर तक पहुंच सकेगा. उसे संकरी गलियों वाले रास्तों से नहीं गुजरना होगा.बिमल पटेल ने आगे बताया, ‘गंगा नदी से सीढ़ियों का एक पिरामिड प्रवेश द्वार से होते हुए मंदिर की ओर जाता है, जहां से मंदिर का शिखर धीरे-धीरे दिखाई देता है.’अर्बन प्लानिंग के एक्सपर्ट और दिल्ली में नए संसद भवन और सेंट्रल विस्टा के वास्तुकार पटेल ने खुलासा किया कि इस परियोजना का मकसद शहर के प्राचीन लोकाचार को दिखाना था. यही वजह है कि यहां नए डिजाइन को कोई जगह नहीं दी गई.

इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि इस प्रोजेक्ट को बनाने के दौरान प्राचीन मंदिर और उसके परिसर में कोई संरचनात्मक परिवर्तन नहीं किया गया. पटेल ने बताया कि पूरे काम को ऐसे अंजाम दिया गया जिससे मौजूदा मंदिर क्षेत्र को किसी भी तरह का नुकसान न हो. कॉरिडोर परियोजना पूरी होने के बाद अब मंदिर परिसर पांच लाख वर्ग फीट में फैल गया है, जो पहले की तुलना में करीब 200 गुना बड़ा है. इससे पहले मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं को महज तीन हजार वर्ग फुट की जगह मिलती थी.

एक बार में 75 हजार लोग प्रवेश कर सकेंगे

वेबिनार के दौरान परियोजना से जुड़े सवालों के जवाब देने वाले वाराणसी के नगर आयुक्त दीपक अग्रवाल ने बताया कि मंदिर कॉरिडोर में जगह बढ़ने से अब पूरे परिसर में एक समय में लगभग 50 से 75 हजार श्रद्धालु एक बार में प्रवेश कर सकेंगे, जबकि पहले सैकड़ों की संख्या में ही श्रद्धालु आ पाते थे.यह उपलब्धि हासिल करने और इस विशालकाय कॉरिडोर को बनाने के लिए 300 से अधिक इमारतों को खरीदा गया और उन्हें ध्वस्त किया गया. इस योजना को पूरा करने के लिए राज्य सरकार ने काशी विश्वनाथ विकास बोर्ड बनाया, जिसके माध्यम से भूमि अधिग्रहण और समझौते के लिए बातचीत आदि की गई. इसके अलावा जमीन का अधिग्रहण तेजी से करने के लिए साइट पर ही रजिस्ट्री कार्यालय भी बनाया गया. अग्रवाल ने बताया कि कई संपत्तियों के मालिक विदेश में थे. एक मामले में तो एक ही संपत्ति के 17 मालिक थे. यह बेहद कठिन काम था.

उन्होंने बताया कि सभी प्रॉपर्टियों को मोटे तौर पर तीन श्रेणी में बांटा गया: निजी संपत्ति, ट्रस्ट या बोर्ड की संपत्ति और सेवायत की संपत्ति (भगवान के नाम पर खरीदी गई संपत्ति) में बांटा गया. जमीन और मकान के मालिकों से इन्हें खरीदने से ज्यादा दिक्कत इन संपत्तियों को किराएदारों और अतिक्रमणकारियों से खाली कराने में हुई.

अग्रवाल ने बताया कि सर्कल रेट, सामाजिक-इकॉनमिक प्रासंगिकता, संपत्ति का क्षेत्र समेत अन्य मसलों को ध्यान में रखते हुए प्रॉपर्टी के दाम काफी ज्यादा रखे गए.परियोजना की वजह से विस्थापित हुए लोगों को मुआवजा देने और उनके पुनर्वास आदि को लेकर बोर्ड ने अहम भूमिका निभाई. कई मामलों में संपत्ति पर कब्जे को ही मालिकाना हक माना गया. ऐसे लोगों को मालिकाना हक साबित करने के लिए कोई और कागजात नहीं देना पड़ा.

बोर्ड ने कुल 314 संपत्तियों का अधिग्रहण किया. इसके लिए उनके मालिकों, संरक्षकों और वहां रहने वालों को 390 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. इस रकम में वे 70 करोड़ रुपये भी शामिल हैं, जिन्हें 1,400 किराएदारों, अतिक्रमणकारियों, कबाड़ियों, वेंडर और दुकानदारों के पुनर्वास पर खर्च किया गया.

अग्रवाल के मुताबिक, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों की तरफ से साफ निर्देश था कि इस मामले में विवादों और मुकदमेबाजी से बचते हुए पूरी प्रक्रिया को सुचारू रखा जाए. यही वजह है कि इस प्रोजेक्ट को लेकर अब किसी भी अदालत में एक भी मुकदमा लंबित नहीं है.’

कॉरिडोर की खुदाई के दौरान कई इमारतों में छोटे-बड़े मंदिर मिले. ऐसे में धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए इन स्ट्रक्चर्स के लिए मास्टर प्लान को संशोधित किया गया. कुल मिलाकर 27 देवताओं की मूर्तियां मिलीं, जिन्हें उनकी पूर्व सुंदरता के अनुसार उसी जगह स्थापित कर दिया गया. पटेल ने बताया, ‘खुदाई के दौरान बरामद मंदिरों और मूर्तियों के लिए हमने गेस्ट हाउस और वैदिक केंद्र की जगह में बदलाव किया.’

परिसर में कुल 23 इमारतें

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में अब आधुनिक सुविधाओं के साथ कुल 23 इमारतें हैं, जिनमें मंदिर चौक, पर्यटक सूचना केंद्र, मोक्ष गृह, छोटा अतिथि गृह, संग्रहालय, सिटी गैलरी, फूड कोर्ट, मल्टीपर्पस हॉल, लॉकर रूम और शौचालय शामिल हैं. पटेल के मुताबिक, परियोजना के 5.50 लाख वर्ग फुट क्षेत्र का लगभग 70 फीसदी हिस्सा ग्रीनरी के लिए रखा गया है.

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर परिसर का पुनर्निर्माण करके इसकी भव्यता को दोबारा दिखाना चाहते थे. साथ ही, श्रद्धालुओं के लिए गंगा नदी और मंदिर के बीच का वह रास्ता खोलना चाहते थे, जो प्राचीन काल में संभवत: मौजूद था. लेकिन रिवरफ्रंट के अलावा, श्रद्धालु और पर्यटक गोदौलिया और सरस्वती द्वार के माध्यम से भी मंदिर परिसर में प्रवेश कर सकते हैं.

सबसे बड़ी बात ये कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा को देखते हुए पिछली कमियों को भी दूर कर दिया गया है. नगर आयुक्त दीपक अग्रवाल के मुताबिक, ‘पूरा परिसर स्थानीय पुलिस , पीएसी और सीआरपीएफ की त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में रहेगा. इसके अलावा अतिरिक्त निगरानी के लिए 300 सीसीटीवी कैमरे और बैगेज स्कैनर भी लगाए गए हैं.

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