क्या खेती-किसानी के लिए फायदेमंद है MSP? क्यों छिड़ी है इस पर महाभारत, समझिए इस रिपोर्ट में: Latest News

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के कृषि कानून की वापसी के ऐलान के बाद आज यानी बुधवार को कैबिनेट मीटिंग में कृषि कानूनों की वापसी के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. लेकिन किसानों की जिद है कि उनकी और भी मांगें मानी जाएं. खासकर MSP पर अनिवार्य कानून बने.

लेकिन आज हम विश्लेषण कर रहे हैं कि सिर्फ MSP से किसानों का भला नहीं होने वाला है. तो क्यों न किसानों के लिए MSP का मतलब मिनिमम सपोर्ट प्राइस नहीं बल्कि मैक्सिम सपोर्ट प्राइस होना चाहिए. एक ऐसा सिस्टम बनना चाहिए जिसके जरिए किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य के सहारे ना रहकर अधिकतम समर्थन मूल्क की ओर खुद को फोकस करें.

क्या MSP पर कानूनी गारंटी की मांग जायज है? क्या खेती-किसानी के लिए MSP फायदेमंद है? आखिर MSP पर महाभारत क्यों छिड़ी है? जबकि सरकार ने MSP को और अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए एक कमेटी के गठन की घोषणा की है. तो आइए आपको सिलसिलेवार तरीके से MSP की ABCD और कृषि जगत की सच्चाई समझाते हैं.

दरअसल, MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वो मिनिमम रेट होता है जिस पर सरकार किसानों के अनाज खरीदती है. MSP की घोषणा सरकार की ओर से साल में दो बार रबी और खरीफ के मौसम में बुआई से पहले की जाती है. ताकि किसानों को जिन फसलों पर एमएसपी दी जा रही है उनके उत्पादन के लिए प्रोत्साहन मिले और किसानों के अनाज कम से कम MSP रेट पर बिके, ताकि उन्हें उपज का सही मूल्य मिले.

अभी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी CACP की सिफारिश पर सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा करती है जिनमें सात अनाज..धान, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार, रागी और जौ, पांच दलहन..चना, अरहर, उड़द, मूंग और मसूर, सात तिलहन और चार नकदी.. कपास, गन्ना, खोपरा और जूट की फसलें हैं.

MSP की चेन को समझिए.

यहां ध्यान देनेवाली बात ये है कि फल, सब्जियां या मवेशियों से मिलने वाले दूध जैसे उत्पाद इनमें शामिल नहीं हैं.इसके अलावा सरकार गेंहू, चावल के अलावा कपास जैसी एक दो और फसलें ही MSP के रेट पर किसानों से खरीदती है. ऐसे में ये समझना मुश्किल नहीं है कि MSP की कानूनी गारंटी में किस कदर की चुनौतियां सामने आएंगी? जानकार ऐसा क्यों कह रहे हैं.. इसके लिए अब आप MSP की चेन को समझिए.

किसान अपनी फसल खेत से राज्यों की अनाज मंडियों में पहुंचाते हैं. इन फसलों में गेंहू और चावल को फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया MSP दर से खरीदती है. FCI किसानों से खरीदे इन अनाजों को गरीबों के बीच सस्ती दर पर देती है. लेकिन FCI के पास अनाज का स्टॉक इसके बाद भी बचा ही रहता है.

सीएसीपी की रिपोर्ट भी कहती है कि एफ़सीआई के गोदाम में गेहूं और चावल मिला कर सरकार के पास 74.3 मिलियन टन का भंडारण है, जो 41 मिलियन टन होना चाहिए. यानी भारत के पास ज़रूरत से 33.1 मिलियन टन ज्यादा गेहूं और चावल स्टोर है.

अब यहां दो बातें समझिए, पहली ये कि शांता कुमार की रिपोर्ट कहती है कि MSP का लाभ देश के सिर्फ 6 फीसदी किसानों को मिलता है और दूसरा ये कि FCI जिस PDS यानी जन वितरण प्रणाली के तहत MSP पर अनाज खरीदकर गरीबों को बांटता है वो दुनिया की सबसे मंहगी खाद्य सुरक्षा प्रणाली में से एक है. ऐसा क्यों? इसे डिटेल में फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन रहे आलोक सिन्हा ने समझाया है..आलोक सिन्हा के मुताबिक FCI को MSP के ऊपर मंडी से गेंहू खरीदने के लिए 14 फ़ीसदी प्रोक्युरमेंट कॉस्ट यानी मंडी टैक्स, आढ़ती टैक्स, रूरल डेवलपमेंट सेस, पैकेजिंग, लेबर, स्टोरेज देना पड़ता है. फिर 12 फ़ीसदी उसे वितरित करने में ख़र्च करना पड़ता है जो लेबर, लोडिंग और अनलोडिंग पर खर्च होता है और 8 फ़ीसदी होल्डिंग कॉस्ट यानी रखने का खर्च आता है. यानी एफसीआई एमएसपी के ऊपर गेंहू खरीदने पर 34 फ़ीसदी अधिक ख़र्च करती है. मतलब, अगर गेंहू की एमएसपी 2000 रुपए प्रति क्विंटल है तो पीडीएस में जनता को बांटने में सरकार को लगभग 2680 रुपये प्रति क्विंटल खर्च करना पड़ता है

इसके अलावा FCI को 8 फीसदी लो क्वालिटी फसल भी लेनी होती है. उसका नुकसान अलग से होता है.यानी MSP से ना तो देश के 82 करोड़ किसानों को लाभ मिल पाता है..और ना ही एग्रीकल्चर इकोनॉमी मजबूत होती है और ना ही सरकार की कृषि नीति को कामयाबी मिल पाती है.

अनिल घनावत ने क्या कहा?

ये हाल तब है जब सरकार गेहूं, चावल, कपास जैसे कुछ अनाजों को ही MSP रेट पर खरीद रही है. तीन कृषि कानूनों की स्टडी के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाए पैनल के सदस्य और किसान नेता अनिल घनावत कहते हैं कि 23 फसलों पर एमएसपी दिए जाने की मांग को अगर सरकार मान लेती है तो इससे देश दिवालिया होने की कगार पर आ जाएगा.

कृषि अर्थशास्त्री विजय सरदाना कहते हैं कि केंद्र सरकार की कमाई ही सालाना 16.5 लाख करोड़ रुपए है जबकि अगर उसे सभी 23 फसलों की खरीद एमएसपी पर करनी पड़े तो सरकार को इसके लिए 17 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़े सकते हैं.

MSP पर अनिवार्य कानून संभव नहीं है. इसके पीछे तर्क ये भी दिया जा रहा है कि अगर सरकार 23 जिंसों पर MSP कानून बना देती है. तो दूसरे किसान भी अपनी फसलों को लेकर इसी तरह की मांग करेंगे.

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PRAJA PARKHI: क्या खेती-किसानी के लिए फायदेमंद है MSP? क्यों छिड़ी है इस पर महाभारत, समझिए इस रिपोर्ट में: Latest News
क्या खेती-किसानी के लिए फायदेमंद है MSP? क्यों छिड़ी है इस पर महाभारत, समझिए इस रिपोर्ट में: Latest News
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