कृषि कानूनों के खिलाफ इस्तीफे से खाली हुई विधानसभा सीट पर क्यों हुई बीजेपी-जेजेपी की हार?: Latest News

Abhay Chautala

कृषि कानूनों को लेकर देश में सबसे ज्यादा हंगामा हरियाणा में हो रहा है. यहां इन्हीं कानूनों के खिलाफ दिग्गज किसान नेता चौधरी देवीलाल के पौत्र अभय चौटाला (Abhay Chautala) ने 27 जनवरी को विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था. ठीक 279 दिन बाद किसान बहुल इस सीट पर किसानों ने फिर से उन्हें अपना नेता चुन लिया. हम बात कर रहे हैं ऐलनाबाद (सिरसा) विधानसभा उपचुनाव की. जहां से चुनाव जीतकर अभय चौटाला फिर से विधानसभा पहुंच गए हैं. जबकि उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जननायक जनता पार्टी (JJP) दोनों मिलकर चुनाव लड़ रहे थे. कृषि कानूनों लेकर प्रयोगशाला बन चुके हरियाणा में अब चौटाला पहले से अधिक मुखरता से किसानों के समर्थन में आवाज बुलंद करेंगे.

राजनीतिक विश्लेषक इस सीट पर बीजेपी और जेजेपी की संयुक्त हार से अधिक इसे ‘सरकार’ की हार बता रहे हैं. इसे सीएम मनोहरलाल खट्टर और डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला की हार बता रहे हैं. क्योंकि सरकार के सारे मंत्री, पूर्व मंत्री और प्रदेश भर के पदाधिकारी इस चुनाव को जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थे.

सीएम मनोहरलाल खट्टर और डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला (Dushyant Chautala) सभाएं कर रहे थे. इस दौरान भी उन्हें किसानों का विरोध भी झेलना पड़ा. सीएम ने अभय चौटाला पर तंज कसते हुए यहां तक कह दिया था कि विधायक की अकड़ उसके आड़े आ गई इसलिए यह उपचुनाव हो रहा है. लेकिन जनादेश ने सबके मुंह बंद कर दिए हैं.

बीजेपी-जेजेपी मिलकर भी क्यों हार गए उपचुनाव?

खेती-किसानी और ग्रामीण बेल्ट में हुए विधानसभा उपचुनाव में पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल के पौत्र अभय चौटाला ने भाजपा-जजपा प्रत्याशी गोबिंद कांडा को 6739 वोटों से हराया. हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा का कहना है कि राज्य सरकार का अहंकार और उसकी जन विरोधी नीतियों ने इस चुनाव में बीजेपी को शिकस्त दी है.

इसे बीजेपी से अधिक उसके नेतृत्व और रणनीतिकारों की हार व किसानों की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए. जब भी यहां किसान अपनी मांगों को लेकर सड़क पर आए, सरकार ने उन्हें प्यार से समझाने और मनाने की जगह लाठी का जोर दिखाया. जिसके परिणाम स्वरूप हरियाणा सरकार के मुखिया के खिलाफ किसानों में इतना आक्रोश है. किसानों के आक्रोश का ही नतीजा है ऐलनाबाद सीट दोनों मिलकर भी नहीं जीत सके.

इस बयान से समझिए किसानों के प्रति सरकार का प्रेम!

मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर (Manohar lal khattar) खुद को किसान बताते हैं. वो अक्सर कहते हैं कि वह सीएम बनने से पहले भी खेती करते थे और सीएम बनने के बाद भी कर रहे हैं. किसानों की दिक्कतों-परेशानियों से वो भली भांति वाकिफ हैं. लेकिन लट्ठ से जवाब देने की बात कौन भूल सकता है? किसानों का सिर फोड़ देने का आदेश देने वाले एसडीएम की पैरोकारी करने को कौन भूलेगा? कुरुक्षेत्र और करनाल में किसानों पर लाठीचार्ज की घटना क्या हरियाणा के किसान भूल सकते हैं?

सीएम खट्टर ने पिछले दिनों चंडीगढ़ में किसान मोर्चा के एक कार्यक्रम में का था कि “अपने-अपने इलाके के एक हजार लोग लट्ठ लेकर निकलें और आंदोलन कर रहे किसानों का इलाज करें. अब तुम उठा लो लट्ठ और उग्र हो रहे किसानों को ठीक से जवाब दो. कुछ तुम्हारा होगा नहीं, बल्कि दो चार महीने जेल में रहोगे और आकर बड़े नेता बन जाओगे. तुम अपनी जमानत की चिंता मत करो.” हालांकि सीएम ने ऐलनाबाद उपचुनाव से ठीक पहले अपने इस बयान को वापस ले लिया था. लेकिन यह पैंतरा काम नहीं आया.

प्यार की बजाय प्रहार की नीति फेल

कहने को हरियाणा के सीएम खुद को किसान बताते हैं लेकिन किसानों की पिटाई भी सबसे अधिक उन्हीं के राज में हुई है. आमतौर पर उप चुनाव सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में जाता है, लेकिन हरियाणा में ऐसा क्यों हुआ कि बीजेपी-जेजेपी की संयुक्त ताकत के बावजूद उपचुनाव में हार नसीब हुई.

इसके पीछे बीजेपी सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और कार्यकर्ताओं की सुनवाई न होना एक अलग पहलू है. बेलगाम नौकरशाही अलग पहलू है. सबसे अहम मामला कृषि कानूनों (Farm Laws) के खिलाफ आंदोलनरत किसानों की डीलिंग के तरीके का है. जिन्हें सरकार ने प्यार की बजाय प्रहार से डील करने की रणनीति अपनाई. जिसके चलते विपक्ष को केंद्र सरकार के खिलाफ भी सवाल उठाने का मौका मिला.

क्यों बन रही किसान विरोधी होने की छवि

>>किसान आंदोलन की शुरुआत में किसान जब पंजाब से दिल्ली आ रहे थे तब खट्टर सरकार ने सड़कें खुदवाईं, भयंकर ठंड के मौसम में बुजुर्ग किसानों पर भी वाटर कैनन का इस्तेमाल करवाया और रोड ब्लॉक कराए.
>>28 अगस्त 2021 को पुलिस ने करनाल के बसताड़ा टोल प्लाजा पर किसानों पर लाठीचार्ज किया. उसमें सुशील काजल नामक किसान की मौत हो गई. हालांकि सरकार इसे नहीं मानती.
>>किसान हितैषी कहने वाली सरकार किसानों के सिर फोड़ने का आदेश देने वाले एसडीएम आयुष सिन्हा के पैरोकारी में खड़ी रही. इसका किसानों में गलत संदेश गया.
>>10 सितंबर 2020 को ‘किसान बचाओ मंडी बचाओ’ रैली में कुरुक्षेत्र जा रहे किसानों पर लाठीचार्ज हुआ. जिसमें कई बुजुर्ग किसान भी बुरी तरह से घायल हुए थे.
>>10 जुलाई को यमुनानगर में नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों और पुलिस के बीच झड़प हुई.

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