Power Crisis: केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जारी आरोप-प्रत्यारोप, जानिए बिजली संकट में कितना सच कितनी सियासत: Latest News

Electricity Issue

त्योहार का सीजन शुरू हो चुका है. दशहरा आने वाला है. फिर दिवाली और छठ एक के बाद एक त्योहार आने वाले हैं. लेकिन कोयले की किल्लत की वजह से त्योहारों की रौनक अंधेरे में डूब सकती है. क्योंकि लगातार पावर प्लांट्स में कोयले की कमी के आंकड़े सामने आ रहे हैं.

देश में 135 कोल पावर प्लांट हैं और जहां सिर्फ 4 दिन का कोयला बचा हुआ है. 15 पावर प्लांट्स ऐसे हैं, जिनमें कोयले का स्टॉक खत्म हो चुका है. इससे निपटने के लिए सरकार एक हफ्ते के अंदर डेली कोयला उत्पादन बढ़ाकर 20 लाख टन करने की तैयारी कर रही है और मंगलवार को इस लक्ष्य को हासिल भी कर लिया गया. जब थर्मल पावर प्लांट्स को 20 लाख टन कोयले की सप्लाई की गई.

सूत्रों के मुताबिक ज्यादा से ज्यादा एक महीने में कोयले की किल्लत से निजात मिलने की उम्मीद है और हम भी उम्मीद करते हैं कि वैसा ही हो. लेकिन जिस तरह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं. उसके बाद ये जानना जरूरी हो जाता है कि बिजली संकट में कितना सच है और कितनी सियासत है.

देश में बिजली संकट है भी या नहीं?

एक ओर रोशनी का त्योहार नजदीक आ रहा है. तो दूसरी ओर देश में अंधेरा छाने का डर भी बढ़ता जा रहा है. राज्यों सरकारों की मानें, तो कोयले की कमी के चलते उनके पावर प्लांट्स ठप होने लगे हैं. लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि कोयले की कोई कमी नहीं है.

ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि देश में बिजली संकट है भी या नहीं? अगर है तो इसकी वजह कोयला है या फिर कोरी राजनीति. ये समझने के लिए तमाम दावों और दलीलों को आंकड़ों के आइने में देखना बहुत जरूरी है. खासतौर से दिल्ली, जहां की सरकार लगातार केंद्र सरकार पर सवाल उठा रही है.

दिल्ली सरकार बिजली सप्लाई की कमी बता रही है और ब्लैकआउट की आशंका जता रही है. लेकिन ये सब आंकड़ों के पलड़े पर कहां ठहरता है, अब ये जान लीजिए. जिस NTPC पर दिल्ली सरकार ने कम बिजली देने का आरोप लगाया, उस NTPC की ओर से दिल्ली में पावर सप्लाई से जुड़े 1 से 11 अक्टूबर तक के आंकड़ों का एक ग्राफ शेयर किया.

क्या अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकती हैं राज्य सरकारें?

इसमें दावा किया गया कि दिल्ली को जितनी जरूरत है उतनी बिजली सप्लाई हो रही है और जितनी बिजली दी जा रही है, उसमें से सिर्फ 70 प्रतिशत का ही इस्तेमाल हो रहा है. केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने भी दिल्ली में बिजली सप्लाई को लेकर फैक्टशीट जारी की है. 25 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर के बीच के आंकड़े के मुताबिक 15 दिन में दिल्ली के भीतर बिजली की कोई कमी नहीं थी. ये तमाम आंकड़े उस दौरान के हैं, जब बिजली संकट की आहट की चर्चा और बयानबाजी शुरू हुई थी. लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ संकट-संकट चिल्लाकर राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकती हैं.

इसका जवाब है नहीं. क्योंकि कोयले की किल्लत के पीछे एक बड़ी वजह है मानसून के चलते कोयला उत्पादन प्रभावित होना और ऐसा हर मानसून के दौरान होता है. इसलिए तैयारी भी पहले से करनी चाहिए थी. उदाहरण के लिए जैसे महाराष्ट्र ने की थी. महाराष्ट्र सरकार ने मानसून से पहले बैठक की थी. ताकि बारिश की वजह से कोयले की सप्लाई में कमी ना हो और 3 महीने का स्टॉक सुनिश्चित कर लिया था.

हालांकि उसका ये स्टॉक भी कम पड़ गया क्योंकि कोविड पाबंदियों में छूट के बाद आर्थिक गतिविधियों ने जोर पकड़ा. जिससे बिजली का ज्यादा इस्तेमाल हुआ और उस वजह से कोयले की खपत भी ज्यादा हुई. जिसका नतीजा ये हुआ है कि महाराष्ट्र में कोयले की कमी के कारण 7 बिजली उत्पादन यूनिट बंद हैं. 3500 से 4000 मेगावाट बिजली की कमी है.

हालांकि महाराष्ट्र सरकार भी केंद्र सरकार और कोल इंडिया को कटघरे में खड़ा कर रही है, लेकिन साथ ही ये भरोसा भी दिला रही है कि संकट के बीच भी लोड शेडिंग नहीं होने देगी.

महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान जैसे कई राज्य कोयला संकट के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. लेकिन इस सियासी सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि कई राज्यों ने वक्त रहते कोयले का स्टॉक किया ही नहीं था और अलग-अलग राज्यों को कोल इंडिया को पहले लिए गए कोयले के एवज में 21 हजार करोड़ रुपये चुकाने भी हैं. लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि कोयला सप्लाई में बकाये की बाधा नहीं आने दी जा रही है. ताकि बिजली संकट को टाला जा सके.

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