कोयले की किल्लत से बिजली संकट, क्या शहर से लेकर गांव तक गुल हो जाएगी बत्ती- जानिए कैसे हैं हालात?: Latest News

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कोयला जिसे ब्लैक डायमंड कहा जाता है, उसकी किल्लत से इस वक्त पूरे देश पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. माना जा रहा है कि कोयले की किल्लत से बिजली संकट शुरू हो गया है, जो आने वाले वक्त में और भी गंभीर होता जाएगा. आज हमने इस विषय पर पूरे देश भर से बड़ी पड़ताल की है. आज आपकी दिवाली काली होने की इस पूरी फिक्र को समझाएंगे. सबसे पहले देश पर मंडराते बिजली संकट की फिक्र, जिसकी आहट तेज होती जा रही है. ब्लैक आउट की आशंका बढ़ती जा रही है और सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार रोशनी के त्योहार दिवाली पर देश अंधेरे में तो नहीं डूबा होगा.

हम आपको उस संकट की आहट से आगाह कर रहे हैं जो हमारे और आपकी चौखट पर खड़ा है. हम ऐसा क्यों कह रहे हैं. इसके पीछे वजह क्या है. ये सवाल आपके मन में जरूर होगा, तो जान लीजिए कि इस संकट के पीछे का कारण है काला हीरा कहे जाने वाले कोयले की किल्लत, जिसकी वजह से बिजली का उत्पादन कम हो रहा है.

इसी मुद्दे पर आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऊर्जा मंत्री आर के सिंह के साथ मीटिंग की. ऊर्जा मंत्री के साथ मीटिंग में कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी भी थे. बैठक में एनटीपीसी, पावर और कोल मिनिस्ट्री के अधिकारी भी शामिल हुए, जिसमें कोयला और बिजली संकट के मौजूदा हालत से निपटने पर चर्चा हुई. हालांकि केंद्र सरकार बार-बार कह रही है कि देश में पावर प्लांट्स की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त कोयला भंडार है. तय मानकों के मुताबिक थर्मल पावर प्लांट्स कम से कम 20 दिन का कोयला स्टॉक करके रखते हैं, लेकिन इस वक्त देश के कई थर्मल पावर प्लांट्स में कोयला है ही नहीं और जहां है, वहां भी ज्यादा से ज्यादा 8 दिन का है. इसलिए ब्लैक आउट का खतरा मंडराने की बात की जा रही है.

भारत में बिजली संकट की आहट!

क्या अगले 6 महीने तक रहेगी बिजली की किल्लत, क्या ये दिवाली ‘ब्लैक आउट’ से होगी काली, ऊर्जा संकट भारी, क्या पहले नहीं की थी तैयारी, ये सवाल और आशंकाएं इसलिए हैं क्योंकि हो सकता है कि चंद दिनों में देश में देखते ही देखते कुछ ऐसा ही अंधेरा कायम हो जाए. शहर से लेकर गांव तक बत्ती गुल हो जाए. फैक्ट्रियां बंद हो जाएं. आपका घर अंधेरे में डूब जाए. फ्रिज, एसी, पंखा, टीवी, मोबाइल सब बंद हो जाएं. बिजली से दौड़ने वाली ट्रेनों और मेट्रो की रफ्तार पर ब्रेक लग जाएं. ये आशंकाएं जाहिर करने के पीछे हमारा मकसद आपको डराना नहीं, बल्कि आपको आगाह करना है, उस संकट से, जो हमारे-आपकी चौखट पर खड़ा है.

देश के इस संकट के मुहाने पर आने की वजह है कोयले की किल्लत, जिससे देश के पावर प्लांट्स बंद होने के कगार पर हैं. देश में 135 कोल पावर प्लांट हैं. जिनसे देश में बिजली की 70% डिमांड पूरी होती है और इन पावर प्लांट्स में सिर्फ 4 दिन का कोयला बचा हुआ है. इनमें से 16 पावर प्लाट्स ऐसे हैं, जिनमें कोयले का स्टॉक खत्म हो चुका है, जिससे कई जगह बिजली उत्पादन ठप या बहुत कम हो चुका है और इस कमी का असर भी तेजी से दिखने लगा है. जिस बिजली के बिना जिंदगी अधूरी लगती है वो गुल हो गई, तो सोचिए फिर क्या होगा.

‘दिल्ली में ज्यादातर प्लांट्स में 1-2 दिन का ही कोयला बचा’

दिल्ली सरकार के मुताबिक ज्यादातर प्लांट्स में 1-2 दिन का ही कोयला बचा है. मतलब दिल्ली में बत्ती गुल होने का खतरा मंडरा रहा है और ये सुनते ही दिल्लीवालों की टेंशन बढ़ गई है. लोग परेशान हैं. घबराए हुए हैं, लेकिन सरकारों के बीच बिजली को लेकर भी सियासत जारी है. कोयले की कमी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन दिल्ली में अभी तक इस वजह से बिजली की सप्लाई पर असर नहीं पड़ा है, ये बात भी ठीक है. लेकिन आशंका आने वाले दिनों को लेकर है. क्योंकि बाकी राज्यों में कोल क्राइसिस के साइड इफेक्ट्स दिखने लगे हैं.

कोयले की सप्लाई पर असर पड़ने से उत्तर प्रदेश में बिजली के उत्पादन में 7478 मेगावाट की कमी आई है, जिसकी वजह से ग्रामीण इलाकों के साथ अब शहरी इलाकों में भी कटौती शुरू हो गई है. कई जिलों में 7 घंटे तक की कटौती हो रही है. एक ओर आम लोगों को परेशानी हो रही है, तो दूसरी ओर फैक्ट्रियों का काम भी रुकने लगा है. कई उद्योगों में बिजली और कोयले दोनों का काम पड़ता है, लेकिन बिजली और कोयले दोनों की कमी से नुकसान और परेशानी बढ़ने लगे हैं.

अब सवाल ये है कि आखिर कोयले की किल्लत अचानक कैसे और क्यों सामने आ रही है, तो ये समझने के लिए पहले आपको देश में बिजली की डिमांड के कुछ आंकड़े देख लीजिए. पिछले साल 4 अक्टूबर को देश में बिजली की डिमांड 159 गीगावाट थी. जो इस साल 15 गीगावाट बढ़कर 174 गीगावाट तक पहुंच गई, लेकिन बिजली की डिमांड इतनी ज्यादा क्यों बढ़ गई. और इसका कोयले की कमी से क्या कनेक्शन है, अब वो भी समझ लीजिए.

दरअसल, कोरोना की दूसरी लहर के चलते लगी पाबंदियां हटने के बाद आर्थिक गतिविधियों ने जोर पकड़ा है. लॉकडाउन की वजह से जो कंपनियां बंद थीं, वो अब धड़ल्ले से चल रही हैं. कंपनियों का प्रोडक्शन बढ़ा है. लिहाजा फैक्ट्रियों में कोयले की खपत बेतहाशा बढ़ी है. दूसरी वजह ये है कि विदेशों में कोयले की कीमत ज्यादा होने से आयात में कमी. इसलिए घरेलू कोयला उत्पादन पर निर्भरता बढ़ गई है. पहले से ही देश की लगभग तीन चौथाई कोयले की जरूरत घरेलू खदानों से पूरी होती है, लेकिन मानसून में भारी बारिश के चलते सप्लाई पर बुरा असर पड़ा.

कोयले की कमी से पंजाब के थर्मल पावर प्लांट भी जूझ रहे

कोयले की सप्लाई में कमी का ही साइड इफेक्ट है बिजली संकट की आहट, जिसकी वजह से देश के कई राज्यों में सैकड़ों शहरों और गांवों में बिजली की कटौती से लोग हलकान होने लगे हैं. एक ओर रोशनी का त्योहार नजदीक आ रहा है, तो दूसरी ओर देश में अंधेरा छाने का डर भी बढ़ता जा रहा है. कोयले की कमी से पंजाब के थर्मल पावर प्लांट भी जूझ रहे हैं. पंजाब के सरकारी और प्राइवेट थर्मल प्लांटों के पास सिर्फ 1 से 4 दिन तक का कोयला बचा है. पंजाब के थर्मल प्लांटों के लिए रोज 22 रैक कोयला चाहिए जो मिल नहीं पा रहा है.

उम्मीद हालात सुधरने की है, लेकिन जो मौजूदा हालात हैं, वो फिक्र बढ़ा रहे हैं क्योंकि पंजाब में 13 अक्टूबर तक रोजाना तीन घंटे तक बिजली कटौती जारी रहेगी. कोयले की कमी के कारण कोल पावर प्लांट अपनी क्षमता के 50 प्रतिशत से भी कम पर काम कर रहे हैं.

कोयले की किल्लत की वजह से महाराष्ट्र में भी बिजली संकट गहराता नजर आ रहा है. महाराष्ट्र में 13 थर्मल पावर प्लांट बंद करने पड़े हैं. इससे 3330 मेगावाट बिजली की कमी होने लगी है. महाराष्ट्र में हर दिन करीब डेढ़ लाख मीट्रिक टन कोयले की जरूरत है, लेकिन मौजूदा हालात में महज 75 हजार मीट्रिक टन कोयले की आपूर्ति हो पा रही है, जिससे बिजली उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.

देशव्यापी कोयले के संकट के कारण बिहार में भी बिजली की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है. इन दिनों बिहार के ग्रामीण इलाकों में 7 से 9 घंटो तक लोड शेडिंग हो रही है. एनटीपीसी से बिहार को 4500 मेगावाट की जगह सिर्फ 3200 मेगावाट बिजली ही मिल रही है, जिसकी वजह से बिहार के कई इलाकों में आम लोग और कारोबारी सब परेशान हैं. देशव्यापी कोयला संकट का असर अब सबसे अधिक कोयला खनन करने वाले राज्य झारखंड में भी देखने को मिल रहा है. यहां भी बिजली की किल्लत हो रही है.

मेगावाट बिजली की डिमांड है. बिजली की सप्लाई महज 1098 मेगावाट है. बिजली की इस कमी का असर रांची समेत तमाम जिलों में देखने को मिल रहा है. मध्य प्रदेश में भी बिजली संकट आने वाले दिनों में परेशानी बढ़ा सकता है. प्रदेश में बिजली की डिमांड 10 हजार मेगावाट तक पहुंच चुकी है, जबकि 3900 मेगावाट ही बिजली का उत्पादन हो पा रहा है. एक ओर कोयले की कमी है, तो दूसरी ओर बिजली उत्पादन में उसी कोयले की बर्बादी भी हो रही है.

मध्य प्रदेश के पावर प्लांट्स में 88 हजार मीट्रिक टन अतिरिक्त कोयला फूंका

मध्य प्रदेश के पावर प्लांट्स में 88 हजार मीट्रिक टन अतिरिक्त कोयला फूंक दिया गया. एक यूनिट बिजली बनाने के लिए 620 ग्राम कोयला लगता है, लेकिन मध्य प्रदेश में उससे ज्यादा यानी 768 ग्राम कोयला इस्तेमाल किया गया, जिसके चलते 1 से 9 अक्टूबर तक 30 करोड़ रुपए कीमत के कोयले की बर्बादी हुई. एक ओर बिजली का संकट है, इसके लिए कोयले की कमी जिम्मेदार है, लेकिन दूसरी ओर बिजली की बर्बादी भी एक बड़ी वजह है.

पूरी दुनिया की बात करें, तो 6% से 8% बिजली बर्बाद होती है, लेकिन हमारे देश में करीब 20% बिजली बर्बाद हो जाती है इसलिए जरूरी है कि बिजली की बर्बादी रोकी जाए, जिससे बिजली की बढ़ी डिमांड को पूरा किया जा सकेगा. तो इसके साथ ही ये भी जरूरी है कि बिजली उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता भी कम करनी होगी. देश में 60% बिजली थर्मल पावर प्लांट से बनती है. 12% बिजली हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में बनती है. विंड, सोलर और दूसरे रिन्यूअल एनर्जी सोर्स से 26%, न्यूक्लियर सोर्स से 2 फीसदी बिजली बनती है.

साफ है कि हमें ऊर्जा के दूसरे स्रोतों पर ज्यादा काम करने की जरूरत है, लेकिन ये एक-दो दिन में नहीं होगा. इसके लिए वक्त लगेगा. पुख्ता प्लानिंग और इरादों के साथ सरकार को कोयले पर निर्भरता घटाने के लिए आगे बढ़ना होगा. इस बीच राहत भरी खबर ये है कि सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड के मुताबिक अगले एक-दो हफ्ते में हालात स्थिर होने की पूरी उम्मीद है.

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