क्या वाकई महात्मा गांधी के कहने पर सावरकर ने अंग्रेजों से मांगी थी माफी? राजनीतिक बहस के बीच समझिए इतिहासकारों की राय: Latest News

Vinayak Damodar Savarkar

वीर सावरकर पर एक बार फिर राजनीतिक विवाद गहरा गया है. विवाद सावरकर के माफीनामे पर है. दरअसल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को कहा कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी महात्मा गांधी के कहने पर मांगी. राजनाथ सिंह के इस दावे के बाद पक्ष और विपक्ष में ठन गई है. कुछ कह रहे हैं कि लंबे समय तक जेल में रहने वाले और जज के सामने भी नहीं झुकने वाले गांधी ने कभी माफी नहीं मांगी तो दूसरे को माफी मांगने के लिए कैसे कह सकते हैं. कुछ कह रहे हैं कि 1915 में जब महात्मा गांधी वतन वापस लौटे थे, तब तक सावरकर दो बार- 1911 और 1913 में दया याचिका दायर कर चुके थे, तो उन्होंने गांधी के कहने पर कैसे माफी मांगी?

वीर सावरकर हिंदुस्तान की सियासत में एक ऐसा नाम, जिसपर विचारधारा की जंग आजादी के पहले से लगातार जारी है. वीर सावरकर के माफीनामे पर भी विचारधारा की तलवारें लगातार खिंचती रही हैं. लेकिन विचारों की इस जंग में एक बार फिर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान से बड़ी बहस छिड़ गई है. सत्ता और विपक्ष के कई नेता, राजनेता और इतिहासकार आमने सामने आ गए हैं. हम आपको सावरकर के माफीनामे पर हर पक्ष की दलील बताएंगे लेकिन पहले विवाद की शुरुआत कैसे हुई ये समझिए.

राजनाथ सिंह ने सावरकर पर उदय माहूरकर और चिरायु पंडित की किताब ‘वीर सावरकर हु कुड हैव प्रीवेंटेड पार्टिशन’ के विमोचन के दौरान मंगलवार को कहा था, “बार-बार ये बात कही गई है कि उन्होंने (सावरकर) अंग्रेजी सरकार के सामने अनेकों मर्सी पेटिशन फाइल की. लेकिन सच्चाई है कि मर्सी पेटिशन उन्होंने अपने को रिहा करने के लिए नहीं फाइल की थी. सामान्यतया एक कैदी को जो अधिकार होता है कि मर्सी पेटिशन फाइल करना चाहे तो वो कर सकता है. महात्मा गांधी ने उन्हें कहा था कि आप मर्सी पेटिशन फाइल करो. महात्मा गांधी के कहने पर उन्होंने मर्सी पेटिशन फाइल की थी.”

ओवैसी ने महात्मा गांधी के खत का ब्यौरा ट्वीट किया

इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद थे. इसी कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद से ही वीर सावरकर को बदनाम करने की मुहिम चल रही है. रक्षा मंत्री और संघ प्रमुख के इस बयान के बाद देशभर में विपक्ष के नेता हमलावर हो गए, लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रिया AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की आई. ओवैसी ने यहां तक कहा दिया कि सरकार सावरकर को राष्ट्रपिता बनाने की तैयारी कर रही है.

ओवैसी ने सावरकर को लिखा गया महात्मा गांधी के ख़त का ब्यौरा भी ट्विटर पर पेश किया. ओवैसी ने लिखा कि सर राजनाथ सिंह यहां सावरकर को लिखा गया गांधी का पत्र है. और इसमें कहीं भी अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगने का ज़िक्र नहीं है. वीर सावरकर के माफीनामे पर विवाद नया नहीं है, लेकिन इस बार बीजेपी भी आक्रामक है और उसी अंदाज में जवाब दे रही है. बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट के जरिए 1921 के महात्मा गांधी के एक बयान का जिक्र किया है.

हालांकि जिस किताब के विमोचन पर विवाद हुआ, उसके लेखक उदय माहुरकर का कहना है कि उनकी किताब में ये तथ्य शामिल नहीं है पर ये सच है कि गांधीजी ने सावरकर की रिहाई का समर्थन किया था. विवादों के बीच वीर सावरकर के पोते विनायक दामोदर सावरकर का भी दावा है कि गांधी जी के कहने पर ही उन्होंने ये चिट्ठी लिखी जिसमें सभी क्रांतिकारियों की रिहाई की मांग थी. वीर सावरकर को लेकर जिस तरह एक पक्ष विवाद पैदा करने की कोशिश करता रहा है, तो दूसरी तरफ ये भी सच है कि वीर सावरकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के आदर्श रहे हैं. ऐसे में क्या सावरकर के माफीनामे पर विवाद खड़ा कर उनके बलिदान को कम करने की कोशिश है.

विक्रम संपत ने भी किताब में लिखी गांधी और सावरकर की बात

सवाल ये है कि क्या गांधीजी ने सावरकर के परिवार को कोई चिट्ठी लिखी थी. चर्चित लेखक विक्रम संपत ने अपनी किताब ‘सावरकर: एक भूले-बिसरे अतीत की गूंज’ में इसपर रौशनी डाली है. अपनी किताब में विक्रम संपत्त ने बताया है कि वीर सावरकर के भाई नारायण राव सावरकर ने 18 जनवरी 1920 को महात्मा गांधी को चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी में नारायण राव सावरकर ने अपने भाइयों की रिहाई सुनिश्चित कराने के लिए गांधीजी से सलाह और मदद मांगी थी.

इस चिट्ठी के जवाब में महात्मा गांधी ने 25 जनवरी 1920 को नारायण राव सावरकर को चिट्ठी लिखी. अपनी चिट्ठी में गांधीजी ने कहा कि वे इस संबंध में बहुत कम सहयोग कर सकते हैं. चिट्ठी में गांधीजी ने कहा था कि मेरी राय है कि आप एक संक्षिप्त याचिका तैयार कराएं. गांधीजी ने कहा था कि याचिका में केस से जुड़े तथ्यों का जिक्र हो कि आपके भाइयों द्वारा किया गया अपराध पूरी तरह राजनीतिक था. गांधीजी ने कहा था कि जैसा कि मैंने आपसे पिछले एक पत्र में कहा था मैं इस मामले को अपने स्तर पर भी उठा रहा हूं. विक्रम संपत के मुताबिक, महात्मा गांधी ने 26 मई 1920 को यंग इंडिया में ‘सावरकर बंधु’ नाम से एक लेख लिखकर भी उनकी रिहाई के लिए आवाज उठाई थी.

हमने वीर सावरकर के इतिहास की पड़ताल की तो पता चला कि रिसर्चर और लेखक अक्षय जोग ने भी उनपर रिसर्च की है. अक्षय जोग ने एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है- वीर सावरकर- आक्षेप और वास्तविकता. हमने उनसे बात की. जोग का भी यही कहना है कि गांधीजी ने सावरकर की रिहाई का समर्थन किया था.

इंदिरा गांधी ने सावरकर के बारे में क्या लिखा?

इतिहास की इस फिक्र में आपको एक और पन्ना पलटना होगा और वीर सावरकर से जुड़े विवाद के बीच आपको ये भी समझना होगा कि देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके बारे में क्या सोचती थीं. सावरकर को लेकर इंदिरा गांधी के विचार… राष्ट्रीय स्मारक को लिखी उनकी एक चिट्ठी में मिलती है.

20 मई 1980 को इंदिरा गांधी ने स्मारक के सचिव पंडित बाखले को ये पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने लिखा था- ‘मुझे आपका 8 मई 1980 को भेजा पत्र मिला. वीर सावरकर का अंग्रेजी हुक्मरानों का खुलेआम विरोध करना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक अलग और अहम स्थान रखता है. मेरी शुभकामनाएं स्वीकार करें और भारत माता के इस महान सपूत की 100वीं जयंती के उत्सव को योजनानुसार पूरी भव्यता के साथ मनाएं.’

इतना ही नहीं…इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में वीर सावरकर के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया था. साथ ही सावरकर ट्रस्ट को अपने कोष से 11 हजार रुपए का दान भी दिया था. और तो और… 1983 में फिल्म डिवीजन को वीर सावरकर पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का आदेश भी दिया गया था. ताकि आने वाली पीढ़ियों को ‘इस महान क्रांतिकारी’ के बारे में न सिर्फ पता चल सके बल्कि पीढ़ियां जान सकें कि वीर सावरकर ने देश की आजादी में क्या और किस तरह से योगदान दिया.

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क्या वाकई महात्मा गांधी के कहने पर सावरकर ने अंग्रेजों से मांगी थी माफी? राजनीतिक बहस के बीच समझिए इतिहासकारों की राय: Latest News
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