अफगानिस्तान में अवाम का गुस्सा झेल पाएगा तालिबान? क्यों पड़ रही बदलने की जरूरत, यहां समझिए: Latest News

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काबुल से अमेरिका के पैकअप और सरकार गठन की कवायद के बीच अफगानिस्तान में जश्न-ए-सितंबर है. क्या काबुल, क्या कंधार हर शहर में तथाकथित आजादी का जश्न मनाया जा रहा है. अमेरिकी ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर से तालिबान का झंडा लहराया जा रहा है. टैंक्स और रॉकेट लॉन्चर के साथ रैलियां निकाली जा रही हैं. लेकिन काबुल से कंधार तक जो असल फिक्र है..वो है एक ऐसी तालिबानी सरकार की जिस पर दुनिया भरोसा कर सके. इसीलिए इस बार काबुल और कंधार दो पावर सेंटर बनाए जा रहे हैं. सरकार की नीतियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है…खासकर विदेश नीति पर.

तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि वो सबसे अच्छा संबंध चाहता है, किसी को अफगानी जमीन इस्तेमाल करने नहीं देगा. बंदूक से जवाब देने वाला तालिबान मित्रता की बात कर रहा है, सद्भावना का राग अलाप रहा है. तालिबान ने इसके लिए क्या होमवर्क किया है. वो आपको तीन प्वाइंट में समझाते हैं. एक, तालिबान सभी मुल्कों से दोस्ताना संबंध चाहता है. दो, तालिबान का कोई भी लड़ाका किसी विदेशी एम्बेसी में प्रवेश नहीं करेगा बल्कि दूतावासों को सुरक्षा मुहैया कराएगा. नंबर-3, तालिबान ने कहा है कि किसी भी आतंकी संगठन को अफगानिस्तान की सरजमीं पर काम नहीं करने दिया जाएगा.

मतलब दूतावासों की सुरक्षा और आतंकियों पर लगाम के जरिए तालिबान दूसरे मुल्कों को अफगानिस्तान में सुरक्षा का भरोसा दे रहा है और दोस्ती का राग अलाप कर हर मुल्क का ध्यान अफगान की ओर खींच रहा है. तालिबान के पास पाकिस्तान, रूस, चीन, तुर्की, सऊदी अरब, ईरान और कतर का समर्थन पहले से है. अफगानिस्तान पर कब्जे का बाद पहली बार दोहा में भारत के राजदूत और तालिबानी नेता के बीच बातचीत हुई है. बदलते हालात के बीच तालिबान ने अमेरिका से भी रिश्ते सुधारने की बात कही है. और अमेरिका ने भी अफगानिस्तान से राजनयिक और कूटनीतिक रिश्ते जारी रखने के संकेत दिए हैं. इसके कतर की राजधानी दोहा में यूएस सेंटर बनाया गया है.

तालिबान को अफगानिस्तान में कामकाज संभालने की सशर्त मान्यता

तालिबान दुनिया को ये दिखाने की कोशिश में लगा है कि अब वो बदल गया है, उसके तौर तरीकों में बदलाव आ गया है. इस वक्त तालिबान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि दुनिया तालिबान को किस नजर से देखे…क्योंकि तालिबान का इतिहास भविष्य के हर सवाल को संदेह से ढक देता है. अमेरिका समेत दुनिया के हर बड़े देश को तालिबानी ये दिलासा दे रहे हैं कि अब सबसे रिश्ता बनाकर चलेंगे, कूटनीति संबंध कायम करेंगे, तरक्की और कामयाबी की राह पर अफगानिस्तान को लेकर जाएंगे. ऐसा लग रहा है कि दुनिया तालिबान के इस वादे पर यकीन कर रही है.

भारत की अध्यक्षता में यूनाइटेड नेशन्स सिक्यॉरिटी काउंसिल ने एक प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है. प्रस्ताव के तहत तालिबान को अफगानिस्तान में कामकाज संभालने की सशर्त मान्यता दे दी गई है. शर्त के मुताबिक, तालिबान अफगानी धरती पर आतंकवाद और आतंकी संगठन को शरण नही देगा. किसी देश से बदले की भावना नहीं रखेगा और जो देश छोड़ना चाहें उन्हें सुरक्षित जाने देगा. फ्रांस की तरफ से स्पॉन्सर्ड इस प्रस्ताव पर यूके, यूएस और भारत समेत 13 देशों ने सहमति जताई. वहीं वीटो पावर वाले रूस और चीन ने प्रस्ताव से दूरी बना ली.

रूस और चीन ने न तो पक्ष में वोट किया और न ही विपक्ष में वोट दिया. UNSC में इस प्रस्ताव के पास होने से साफ है कि तालिबान ने बेहद होशियारी से दुनिया के देशों को साध लिया है. ऐसे में क्या ब्लडबाथ से बचकर तालिबान दुनिया के साथ ही आम अवाम को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगा.

हजारों लोग देश छोड़ने के लिए बॉर्डर की ओर निकल रहे

सोशल मीडिया पर तालिबान का नाम डालते ही जो तस्वीरें सामने आती हैं, वो तस्वीरें होती हैं क्रूरता और दहशत की जो बात-बात में बम बरसाते हैं…गोलियां चलाते हैं, आम अफगानियों का खून बहाते हैं. ऐसी क्रूरता, जो महिलाओं और बच्चों को बेहरमी से सजा देते हैं.. कोड़े बरसाते हैं, नाक-कान काट लेते हैं. अब सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई पहले की तरह तालिबान क्रूरता कर ही नहीं रहा है या क्रूरता की तस्वीरें सामने नहीं आने दे रहा. इसे चालाक तालिबान के सत्ता में काबिज होने के बाद अफगानिस्तान से आती कुछ तस्वीरों से समझना होगा.

अफगानिस्तान-पाकिस्तान बॉर्डर पर हजारों लोग देश छोड़ने के लिए बॉर्डर की ओर निकल रहे हैं. ये वो लोग हैं, जिन्हें तालिबान से डर है, जिन्हें ये भी नहीं मालूम कि जाना कहा हैं. पता है तो बस इतना कि अफगानिस्तान में नहीं रहना है. भले ही वो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान ही क्यों ना हो. इनमें बीमार भी हैं, बच्चें भी हैं, महिलाएं और बुजुर्ग भी. यही हाल ईरान-अफगानिस्तान बॉर्डर पर हैं. इस रास्ते पर पलायन कर रहे लोगों का पूरा कारवां नजर आ रहा है. जिसे रास्ते में सैकड़ों पहाड़ी नदियां पार करनी है, सैकड़ों किलोमीटर लंबा रेगिस्तान पार करना है.

तालिबान का असली चेहरा आना अभी बाकी!

अफगानिस्तान से बॉर्डर पार करने के बाद इन्हें ईरान में दाखिल होना है. फिर करीब डेढ़ हजार किलोमीटर के सफर के बाद टर्की में शरण लेनी है. कुछ लोग टर्की से यूरोप और ब्रिटेन का भी रुख करना चाहते हैं. दिन हो या रात का अंधेरा, अफगानिस्तान से ईरान पलायन करने के लिए लोगों का तांता लगा हुआ है और इनकी संख्या भी हजारों में है. हैरानी की बात ये है कि सामने से पलायन करते लोगों को देखने के बावजूद तालिबान इन्हें छू तक नहीं रहा. जबरन इस भीड़ को रोकने की कोशिश तक नहीं कर रहा. अलबत्ता.. बात-बात पर गोलियां बरसाने वाला तालिबान अब अपील पर उतर आया है. अपील ये कि जो लोग देश से बाहर जाना चाहते हैं वे कमर्शियल उड़ानों के दोबारा शुरू होने के बाद उचित दस्तावेजों के साथ और ‘सम्मानजनक तरीके’ से विदेशों की यात्रा कर सकते हैं.

तालिबान का ये बदलाव समझना मुश्किल नहीं है. एक क्रूर शासन और अवाम को कुचलने के बावजूद तालिबान 20 साल पहले अपनी सत्ता को उखड़ते भी देख चुका है और शायद ये ही वजह है कि तालिबान अपनी अवाम की नजरों में हैवान से मसीहा बनने की कोशिश में जुटा है. तालिबान ये जानता है कि जितना खून बहेगा, उतना ही आम अवाम का खून खौलेगा. और इसकी तस्दीक कर रहे हैं तालिबान के कुछ फैसले. तालिबान ने कैमरे के सामने कहा कि हम शरिया व्यवस्था के तहत महिलाओं के हक़ तय करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. महिलाएं हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने जा रही हैं. ये बात अलग है कि तालिबान का असली चेहरा आना अभी बाकी है.

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अफगानिस्तान में अवाम का गुस्सा झेल पाएगा तालिबान? क्यों पड़ रही बदलने की जरूरत, यहां समझिए: Latest News
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