क्या अफगानिस्तान फिर से आतंकी संगठनों का बनेगा महफूज ठिकाना, जानिए किस मॉडल पर विचार कर रहे हैं तालिबानी?: Latest News

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अफगानिस्तान पर इस वक्त भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया की नजर टिकी है क्योंकि हर देश को डर है कि खुद को बदला हुआ तालिबान कहीं बाद में बड़ी फिक्र ना बन जाए. तालिबानी हुकूमत के बीच पलायन का सिलसिला रुका नहीं है. काबुल एयरपोर्ट से अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद भी देश छोड़ने की होड़ खत्म नहीं हुई है. लोग अब हजारों मील चलकर सीमा पार कर रहे हैं. एक वीडियो में दिख रहा है कि हजारों की संख्या में अफगानी महिलाएं जिनमें गर्भवती महिलाएं भी शामिल हैं. इनके अलावा बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान तालिबान के साए से दूर जा रहे हैं. अफगानिस्तान से विदा ले रहे हैं. बताया जाता है कि इनमें से कई लोग ऐसे हैं, जो पहाड़ों और रेतीले रास्तों से होकर हजार, 1500 किलोमीटर पैदल चलकर सीमा पार कर रहे हैं और जान की दुहाई देकर पाकिस्तान, तुर्की और ईरान में शरण ले रहे हैं.

अफगानिस्तान से पलायन का एक और वीडियो देखा जा सकता है कि कैसे जान जोखिम में डालकर अफगानी नागरिक सीमा पार कर रहे हैं. बॉर्डर पार करने के लिए लड़के-लड़कियां, हर उम्र के लोग ट्रक के नीचे छुप जाते हैं. सीमा पर धीरे चलते ट्रक के नीचे छुपकर ये लोग बॉर्डर पार कर जाते हैं. इन्हीं में से कुछ लोग पकड़े जाते हैं. तो इन्हें वापस अफगानिस्तान भेज दिया जाता है. बताया जाता है कि दूसरे देश में पलायन करने के लिए अफगानी कई दिनों तक अफगान सीमा पर रहते हैं और किसी भी सूरत में अफगानिस्तान से निकल कर दूसरे देश में शरण लेना चाहते हैं.

इस बीच ये फिक्र बड़ी होती जा रही है कि अफगानिस्तान में कब बनेगी तालिबान सरकार? कैसी होगी तालिबान की समावेशी सरकार? क्योंकि काबुल पर तालिबान के कब्जा किए 17 दिन हो गए और दो दिन पहले अमेरिका ने भी अफगानिस्तान से अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया. ऐसे में हर कोई जानना चाहता है कि क्या अफगानिस्तान में वाकई बदली हुई तालिबानी सरकार नजर आएगी. क्या नई सरकार सबको साथ लेकर सरकार चलाएगी या फिर अफगानिस्तान फिर से आतंकी संगठनों का महफूज ठिकाना बन जाएगा?

अब्दुल हकीम हक्कानी को चीफ जस्टिस बनाया जा सकता है

सबसे पहले जानते हैं कि तालिबान कैसे अपनी सरकार में अपना स्थायी भविष्य देख रही है. दरअसल तालिबान ने कहा है कि हम सरकार के कुछ मॉडल्स पर विचार कर रहे हैं और इसमें इस्लामी राज भी शामिल है. इसके लिए छात्रों, विद्वानों, धार्मिक नेताओं और पूर्व मुजाहिद नेताओं से तालिबान बातचीत कर रहा है. CNN की रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान ईरान मॉडल के आधार पर अफगानिस्तान में सरकार बनाने का प्लान बना रहा है. इसमें अफगानिस्तान एक ऐसा इस्लामिक देश बनेगा, जहां पर सुप्रीम लीडर ही देश का मुखिया होगा. वो सबसे उच्च राजनीतिक और धार्मिक पद पर होगा और ये राष्ट्रपति से भी ऊपर होगा.

माना जा रहा है कि अफगानिस्तान में ये पद हिबातुल्ला अखुंदजदा को दिया जाएगा. अखुंदजदा की काउंसिल में 11 से 72 लोग हो सकते हैं और इसका हेडक्वार्टर कंधार में होगा. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार की एग्जिक्यूटिव ब्रांच का मुखिया प्रधानमंत्री होगा, जो मुल्ला अब्दुल गनी बरादर या मुल्ला याकूब में से कोई होगा. तालिबान का सह-संस्थापक बरादर इस वक्त राजनीतिक धड़े का हेड है और दोहा में मौजूद टीम का हिस्सा है. वहीं मुल्ला याकूब मुल्ला उमर का बेटा है जो संगठन के धार्मिक और वैचारिक मुद्दों को देखता है. इनके अलावा अब्दुल हकीम हक्कानी को चीफ जस्टिस बनाया जा सकता है.

ये तो हुई ऊपरी रूपरेखा. इनसाइड स्टोरी ये है कि इस वक्त पंजशीर को छोड़कर बाकी जिन 33 प्रांतों पर अफगानिस्तान का नियंत्रण है. उनके नेता या सरदारों से तालिबान की बातचीत चल रही है. तालिबान उनसे सौदेबाजी कर रहा है या उनका सरेंडर चाह रहा है. तो आइए जानते हैं कि ये गैर तालिबानी कौन हैं, जो तालिबान के लिए सिरदर्द बने हुए हैं. ये वो चेहरे हैं कि जिन्हें अफगानिस्तान का वॉर लॉर्ड्स कहा जाता है, जो तालिबान से खुलकर लड़ाई लड़ते हैं और एक इस्माइल खान को छोड़कर बाकी वार लॉर्ड्स तालिबान की पकड़ से बाहर हैं. अब आपको इनके बारे में सिलसिलेवार तरीके से बताते हैं.

अब्दुल रशीद दोस्तम अफगानिस्तान के पहले उपराष्ट्रपति

67 साल के अब्दुल रशीद दोस्तम अफगानिस्तान के पहले उपराष्ट्रपति रह चुके हैं. माना जाता है कि 9/11 हमले के बाद अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार को गिराने में दोस्तम ने अमेरिकी सेना की काफी मदद की थी. दोस्तम का अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों यानी जॉजन, बाल्क और फरयाब के इलाकों में दबदबा है. बताया जा रहा है कि दोस्तम इस वक्त उज्बेकिस्तान में हैं. पंजशीर घाटी में नॉर्दर्न अलायंस के लड़ाकों का हौसला बढ़ाते ये हैं. अहमद मसूद एंटी तालिबान नेता अहमद शाह मसूद के बेटे हैं. इस वक्त अहमद मसूद की अगुवाई में ही नॉर्दर्न अलायंस के लड़ाके तालिबानियों से लड़ रहे हैं. तालिबान भी इनसे सुलह के लिए बातचीत कर रहा है.

अफगानिस्तान के वॉर लॉर्ड्स में तीसरा नाम है- अता मोहम्मद नूर. जिन्होंने 1996 में अहमद शाह मसूद के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाया था. मोहम्मद नूर 2004 से जनवरी 2018 तक बल्ख प्रांत के गवर्नर रहे. बल्ख प्रांत पर तालिबान के कब्जे के बाद से वो गायब हैं. माना जा रहा है कि ताजिकिस्तान के इलाके में चले गए हैं. अफगानिस्तान के वॉर लॉर्ड्स में बड़ा नाम इस्माइल खान भी हैं. 2001 में तालिबान को सत्ता से बेदखल करने में अमेरिका को भी इनका साथ लेना पड़ा था. ताजिक समुदाय के इस्माइल खान का हेरात प्रांत में अच्छाखासा प्रभाव है. ये करजई सरकार में जल मंत्री रहे और इन्हें ईरान और भारत का समर्थन हासिल है.

इनके अलावा अमरुल्ला सालेह काबुल पर तालिबान के कब्जे से पहले अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति थे. और इस वक्त पंजशीर में हैं और अहमद मसूद के साथ मिलकर तालिबान के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. अफगानिस्तान में ऐसे और भी वॉर लॉर्ड्स हैं. जिन्होंने तालिबान की चिंता बढ़ा दी है. सूत्र बताते हैं कि तालिबान चाहता है कि अपने-अपने प्रांतों और समुदायों में प्रभाव वाले इन लोगों से ठोस बातचीत हो और उन्हें सरकार और शासन में अहम जगह दी जाए, ताकि तालिबान की समावेशी सरकार ठीक से चल पाए.

अफगानिस्तनान की आबादी में सबसे ज्यादा 42 फीसदी पश्तून

तालिबान को डर है कि अगर वॉर लॉर्ड्स को नहीं मनाया गया, तो वो कभी भी पलटवार कर सकते हैं और तालिबान के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, जबकि वॉर लॉर्ड्स अब इतने बिखरे हुए हैं कि उनके पास तालिबान की शरण में जाने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है. अब यहां समझने वाली बात ये है कि आखिर सरकार गठन से पहले तालिबान इन्हें मनाना क्यों चाह रहा है? इस सवाल का जवाब अफगानिस्तान की डेमोग्रेफी में छिपा है. आप मैप में जितने रंग देख रहे हैं. उससे अफगानिस्तान की डेमोग्रेफी साफ हो रही है. इसमें नीले रंग का क्षेत्र पश्तून क्षेत्र है. पीले रंग का इलाका उज्बेक आबादी का है. हल्के नीले रंग का क्षेत्र हजारा समुदाय का है. और हरे रंग के जो इलाके दिख रहे हैं. वहां ताजिकों की आबादी रहती है.

अफगानिस्तनान की आबादी में सबसे ज्यादा 42 फीसदी लोग पश्तून हैं. दूसरे नंबर पर ताजिक आते हैं. जिनकी जनसंख्या करीब 27 फीसदी है. इनके अलावा हजारा 9 पर्सेंट. और उज्बेक आबादी 8 प्रतिशत है और अफगानिस्तान की इन्हीं डेमोग्रेफी को देखते हुए तालिबान चाह रहा है कि सरकार गठन में इन सभी समुदायों की भागीदारी हो. इसलिए इनके नेताओं को मनाने की कवायद चल रही है. इसके अलावा बाकी गुटों से भी तालिबान की बातचीत जारी है. जानकार ये भी बताते हैं कि इस बार तालिबान वाकई बदला हुआ दिख रहा है. सरकार बनाने में मेच्योर बिहेव कर रहा है. और ये अफगानिस्तान के लिए अच्छे संकेत हैं. अब आपको बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान किस कदर अपनी छवि बदलने में जुटा है.

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PRAJA PARKHI: क्या अफगानिस्तान फिर से आतंकी संगठनों का बनेगा महफूज ठिकाना, जानिए किस मॉडल पर विचार कर रहे हैं तालिबानी?: Latest News
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