Fikra Aapki: बेघर होने के बाद भविष्य की चिंता में डूबे खोरी गांव के लोग, नई पीढ़ी को लेकर सता रहा डर: Latest News

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हम मानते हैं कि इस देश के नागरिकों को शिक्षा, सेहत और रोज़गार की जितनी ज़रूरत है, उनके लिए उतना ही ज़रुरी एक किफायती और सुरक्षित मकान भी है.  मकान ऐसा होना चाहिए, जो टेंशन नहीं, बल्कि सुकून दे. हाल ही में देश में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं. दोनों घटनाएं दिल्ली-NCR की हैं और दोनों के पीछे सुप्रीम कोर्ट की सख्ती है. दिल्ली से सटे हरियाणा के खोरी गांव में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हज़ारों अवैध मकानों को हटाया गया. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ही नोएडा में एक बिल्डर के 40 मंजिला अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश भी दिया है.

खोरी गांव में जो अवैध निर्माण हुआ, वो जंगल के बीच हुआ लेकिन नोएडा में जो अवैध निर्माण हुआ वो शहर की चकाचौंध के बीच हुआ. समानता ये है कि दोनों ही जगहों पर हुए अवैध निर्माण में आम आदमी के साथ छल हुआ.

रुका हुआ है 6 लाख मकानों का काम

ये दो उदाहरण तो हम इसलिए दे रहे हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद दोनों घटनाएं चर्चा में थीं. लेकिन हकीकत ये है कि इस वक्त देश भर में करीब 6 लाख मकानों का निर्माण काम रुका हुआ है. इन मकानों की कीमत 5 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है. सबसे खास बात ये कि ये 6 लाख मकान देश के सिर्फ 7 शहरों में हैं और इन सबका निर्माण वर्ष 2014 या उससे पहले शुरू हुआ था. सोचने वाली बात ये है कि अपनी गाढ़ी कमाई से आम आदमी जिस मकान के लिए पैसे लगाता है, उसके बदले में उसे क्या मिलता है.

मोटे तौर पर खरीदार के सामने 4 दिक्कतें आती हैं-

पहली दिक्कत- उसे अपने ही घर की चाबी लेने के लिए सालों साल इंतज़ार करना पड़ता है.

दूसरी दिक्कत- उससे जिस फ्लैट या मकान का वादा किया जाता है, उससे अलग. यानी कम सुविधाओं वाला या कमतर गुणवत्ता वाला फ्लैट दिया जाता है.

तीसरी दिक्कत- मकान खरीदने वाले से कई ऐसी जानकारियां छिपाई जाती हैं, जो उसे हर हाल में पता होनी चाहिए.

चौथी दिक्कत- मकान हैंडओवर करने के बाद भी बिल्डर ख़रीदार को परेशान करता रहता है. इन सभी का नतीजा ये होता है कि उपभोक्ता ही आखिर तक भोगता है.

हम भारत के लोग अगर गरिमा के साथ जीवन जीने का हक रखते हैं तो इसमें घर की भूमिका अहम हो जाती है. लेकिन जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है. भ्रष्ट और शातिर व्यवस्था में घर का सपना लूटघर में तब्दील हो जाता है.  खोरी गांव अरावली की उन पहाड़ियों पर है जिनकी गिनती दुनिया के सबसे पुराने माउंटेन रेंज में होती है. जो गुजरात के चांपानेर से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए 693 किलोमीटर का सफर तय करते हुए दिल्ली तक पहुंचती है. इन्हीं जंगलों में बसा खोरी गांव हाल में उस वक्त चर्चा में आया जब 7 जून को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि वहां जंगल की ज़मीन पर जो अतिक्रमण है, उसे 6 हफ्ते के अंदर हटाया जाए.

इसके साथ ही पहले गांव में बिजली के कनेक्शन काटे गए. फिर पानी के टैंकरों को गांव में घुसने से रोका गया और उसके बाद 17 जुलाई से अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू कर दिया गया. गांव में करीब 5 हज़ार घर थे, जिनके ऊपर बुलडोजर चला दिया गयाऔर इसीके साथ करीब 10 हज़ार लोगों की आबादी बेघर हो गई. जिनके मकान टूटे, उनके पास आधार कार्ड है, मतदाता पहचान पत्र है, पैन कार्ड है, राशन कार्ड है, नगर निगम की तरफ से मिली यहां का पता लिखी प्लेट भी है.और सभी लोगों के पास बिजली का बिल भी आ रहा था.

अस्सी के दशक में इस इलाके में कई ऐसे लोग आकर बसने लगे, जो बॉक्साइट की खदानों में मज़दूरी करते थे. वर्ष 1992 में पहली बार अरावली की खदानों पर रोक लगाई गई. लेकिन तब तक यहां कच्चे मकान काफी संख्या में बन चुके थे. 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने यहां खनन के काम पर पूरी तरह से रोक लगा दी.लेकिन यहां रह रहे मज़दूरों ने मकान नहीं बदले, बल्कि अपने काम-धंधे बदल लिए. कई परिवार ऐसे हैं, जो अब मकान टूटने के बाद. मलबे से ईंटें निकालकर उसे बेच रहे हैं.मजबूरी ऐसी है कि छोटे बच्चों को खुले में छोड़कर काम पर भी नहीं जा सकते.

नई पीढ़ी के लिए मुसीबत

खोरी गांव में कई ऐसे परिवारों से मुलाकात हुई जिनकी तीन या चार पीढ़ियां साथ-साथ रहती हैं. नई पीढ़ी पर हर परिवार ज्यादा ध्यान दे रहा है. बच्चों की पढ़ाई और नौकरी से जुड़े दस्तावेज़ों में इसी खोरीगांव का पता दर्ज है. लेकिन अब तो ये पता भी मिट्टी में मिलकर ला-पता हो गया.

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