Afghanistan: तालिबान राज में पाबंदियों की लंबी लिस्ट, आतंक मुक्त करने आया अमेरिका अफगानियों को इस हाल में क्यों छोड़ गया?: Latest News

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बीती रात जैसे ही काबुल एयरपोर्ट से अमेरिका के आखिरी विमान ने टेक ऑफ किया, उसी के साथ अफगानिस्तान 20 साल पुरानी तालिबानी बंदिशों के दौर में पहुंच गया. अफगानियों की तकदीर का रिवर्स गियर लग गया, क्योंकि अफगानिस्तान में सिर्फ सत्ता नहीं बदली है बल्कि पूरे मुल्क की शक्ल और सलीका, नियम और कायदे सब कुछ बदल गए हैं. अफगानियों की जिंदगी फिर से तालिबानी के क्रूर कानूनों की जंजीर में जकड़ने लगी है.

अफगानिस्तान में लोग किसी तरह अपनी जान बचाकर जिंदा हैं क्योंकि कहने के लिए तालिबान बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है. लगातार कह रहा है कि उसने सबको माफ कर दिया है, किसी से बदला नहीं लिया जाएगा लेकिन हकीकत ये है कि तालिबान जो कह रहा है, उसका ठीक उल्टा कर रहा है. हर ओर सिर्फ और सिर्फ बंदूक की नोंक पर निजाम चलाया जा रहा है. जिसका सबूत वायरल हो रहा है एक वीडियो है, जिसमें देखा जा सकता है कि किस तरह एक न्यूज चैनल में एक एंकर को बंदूक की नोंक पर रखा गया है. डरा-सहमा एंकर तालिबानी आतंकियों के बीच ही खबर पढ़ता है. तालिबानियों का स्वागत करता है और फिर तालिबानी आतंकी बिना रोक-टोक अपनी बात कहता है.

शरिया कानूनों के तहत पाबंदियां लागू

ये सब कुछ बताता है कि अफगानिस्तान में तालिबानी राज का अंधेरा छा गया है. भले ही तालिबान खुद को बदला हुआ दिखाने की कोशिश कर रहा है लेकिन वही तालिबान शरिया का हवाला देकर हर दिन फरमान जारी कर रहा है. ठीक वैसे ही जैसे 20 साल पहले करता था. इनमें महिलाओं के लिए बुर्का और हिजाब अनिवार्य कर देना शामिल है, लड़के-लड़कियां साथ पढ़ नहीं सकते..स्कूलों में को-एजुकेशन पर पाबंदी लगा दी गई है, फिल्मों और संगीत पर भी बैन लगा दिया गया है, टेलीविजन पर सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक कार्यक्रम प्रसारित करने की इजाजत है, टीवी पर महिला एंकर्स पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है.

इतना ही नहीं, पुरुषों के लिए भी दाढ़ी रखने का फरमान जारी हो चुका है. जींस-टीशर्ट जैसे फैशनेबल कपड़े नहीं पहने जा सकते है, सिर्फ पारंपरिक पोशाक पहनने का फरमान है. लोगों की गलतियों और गुनाहों की सजा तालिबानी कानून के हिसाब से तय की जाएगी, जिसमें सरेआम लोगों को फांसी दी जाएगी या फिर हाथ-पैर काट दिए जाएंगे. इसके अलावा लोगों को पत्थर से मारकर सजा-ए-मौत भी दी जाएगी.

आज से अफगानिस्तान में सिर्फ तालिबान के संपूर्ण राज की शुरुआत नहीं हुई. बल्कि अफगानिस्तान के लोगों की बदनसीबी भी शुरू हो गई क्योंकि अब चाहकर भी वो अशिक्षा, बेरोजगारी, भुखमरी और बीमारी से नहीं लड़ पाएंगे बल्कि जिहाद के लिए लड़ेंगे. अफगानिस्तान के लोगों का भविष्य अंधेरे में है. ये साफ-साफ दिख रहा है क्योंकि अफगानिस्तान पर राज करने का ख्वाब तालिबान ने पूरा तो कर लिया है लेकिन देश कैसे चलाएगा, ये बड़ा सवाल है.

1 करोड़ बच्चों को फौरन मानवीय मदद की जरूरत

20 साल की जंग के बाद, हजारों जान गंवाने के बाद खरबों का नुकसान उठाने के बाद, बाइडेन की फौज काबुल से रुखसत हो गई. तालिबान को अफगानिस्तान का तख्तोताज सौंप गई और अफगानियों को अधर में छोड़ गई. बेबस और लाचार छोड़ गई. जिसकी गवाह काबुल में एक बैंक एटीएम के बाहर की तस्वीरें हैं. क्योंकि तालिबानी फरमानों के बीच बैंकों ने भी एक फरमान सुना दिया है और वो है एक हफ्ते में सिर्फ 200 डॉलर की निकासी की सीमा. जिसके चलते बैंकों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं, जिनमें लोग भूखे-प्यासे खड़े हैं.

लेकिन मुसीबत सिर्फ इतनी भर नहीं है. बल्कि तालिबान के बंदूक राज में जल्द ही अफगानिस्तान पाई-पाई और दाने-दाने को मोहताज हो सकता है. विश्व बैंक और दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर दुनिया के 60 देशों को अगले 4 साल में अफगानिस्तान को 12 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देनी थी, लेकिन उनमें से ज्यादातर देश इसे फिलहाल के लिए रोक चुके हैं. इस बीच अफगानिस्तान में युद्ध और मौसम की मार से गेहूं की 40 फीसदी फसल तबाह हो गई है और एक तिहाई आबादी दाने दाने के लिए तरस रही है.

हालात धीरे-धीरे और बिगड़ने की आशंका है और उसका सबसे बड़ा शिकार बनेंगे अफगानिस्तान के बच्चे. यूनिसेफ के मुताबिक, अफगानिस्तान के करीब 1 करोड़ बच्चों को फौरन मानवीय मदद की जरूरत है. उन्हें खाने-पीने का सामान और दवाएं मुहैया कराए जाने की जरूरत है. लेकिन बंदूक के जोर पर अफगानिस्तान पर कब्जा करने वाले तालिबानियों को कोई परवाह नहीं है. उन्हें परवाह है, तो सिर्फ अपने हितों की, चीन-पाकिस्तान से गठजोड़ की क्योंकि चीन और पाकिस्तान ही हैं, जो सबसे ज्यादा मुखर होकर तालिबान के सुर में सुर मिला रहे हैं.

लाखों करोड़ के खनिज संपदा पर चीन की नजर

चीन की बात करें, तो वो जो कुछ भी कर रहा है, अपनी फितरत के मुताबिक कर रहा है. अपने फायदे के लिए तालिबान के साथ खड़ा है. चीन की नजर अफगानिस्तान की 200 लाख करोड़ रुपए की खनिज संपदा पर है. चीन दुनिया के सबसे बड़े रेयर अर्थ मैटेरियल और लीथियम भंडार पर कब्जा चाहता है. और पाकिस्तान, अफगानिस्तान की सरजमीं पर आतंकवाद की नई और बड़ी फैक्ट्री बनाना चाहता है. जिसका इस्तेमाल तालिबान अमेरिका के खिलाफ कर सके और पाकिस्तान हिंदुस्तान के खिलाफ.

अब अमेरिका से बार-बार ये सवाल पूछा जाएगा कि वो अफगानिस्तान में क्या टारगेट लेकर गया था. अगर उसे 9/11 का बदला लेना था तो ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में बिना बेस बनाए भी मारा जा सकता था. अगर अफगानिस्तान में लोकतंत्र बहाल करना था और आतंक मुक्त करना था तो अमेरिका आज उसे फिर से आतंकियों के हाथों में सौंपकर क्यों चला गया. अगर आप 20 साल के पूरे सफर को समझेंगे तो ये एक मिस्ट्री की तरह नजर आएगी.

भविष्य में अमेरिका का इतिहास जब-जब पढ़ा जाएगा, 30 अगस्त को आधी रात के बाद आई तस्वीरों को दोबारा जरूर देखा जाएगा. क्योंकि इन तस्वीरों में सुपरपॉवर की सबसे बड़ी शर्म छिपी है, पराजय छिपी है और एक अदना से मुल्क से भाग जाने की हड़बड़ी छिपी है. जो दो दशक के अपने सच्चे साथी ट्रेंड डॉग्स तक को तालिबान के रहमो करम पर छोड़कर भाग गए.

अफगानिस्तान में 4 दशक तक चला युद्ध

अमेरिका की इस शिकस्त के पीछे चार चेहरे हैं और चार अध्याय भी. जिनमें जो बाइडेन का चैप्टर है सरेंडर, तो डोनाल्ड ट्रंप का चैप्टर है ब्लंडर, बराक ओबामा का चैप्टर है लूजर तो जॉर्ज डब्ल्यू बुश का चैप्टर है फाउंडर. इन अध्यायों को समझने के लिए 80 और 90 के दशक के अफगानिस्तान को समझना जरूरी है. जब इस मुल्क पर सोवियत सेना का कब्जा था. तब पाकिस्तान को डर था कि रूस अपना दायरा दक्षिण की तरफ बढ़ाकर बलूचिस्तान तक ले जा सकता है. इसलिए पाकिस्तान ने तब अपने सदाबहार दोस्त रहे अमेरिका के साथ मिलकर कट्टरपंथ को हवा देनी शुरू की.

तब अमेरिका अपनी अकड़ में युद्ध में कूदा था और पाकिस्तान अपने डर से युद्ध में कूदा था. पाकिस्तान, अमेरिका और सऊदी अरब ने अफगानिस्तान के लड़ाकों को गुप्त रूप से आर्थिक और हथियारों की मदद देनी शुरू की और अफगानिस्तान में कट्टरपंथ की ताकत इतनी बढ़ी कि 1992 में रूस जैसे शक्तिशाली देश को भगा दिया. इसके बाद सत्ता के लिए अफगानिस्तान में कलह मच गई. कट्टरपंथी लड़ाके आपस में सत्ता हासिल करने के लिए लड़ने लगे और चार साल तक अफगान अवाम गृहयुद्ध में फंसी रही.

सत्ता के इसी वैक्युम का फायदा उठाकर तालिबान खड़ा हुआ. पश्तो कबीलाइयों ने पाकिस्तान बॉर्डर के मदरसों से पश्तो नौजवानों को अपने संगठन में भर्ती किया और तालिबान के फाउंडर मुल्ला मोहम्मद उमर ने संगठन को इतना आगे बढ़ाया… कि दो साल के अंदर 1994 तक अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो गया और दो साल के अंदर तालिबान ने 1996 में काबुल में सरकार बना ली. अफगानिस्तान में गृहयुद्ध जारी रहने तक दुनिया खामोश बैठी रही लेकिन तालिबान की सरकार बनते ही अमेरिका का रोल पलट गया.

UNSC में 1267 प्रस्ताव पास हुआ जिसमें तालिबान और अलकायदा को आतंकवादी संगठन करार दिया गया और उस पर हर तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए. इन प्रतिबंधों ने तालिबान की तो कमर तोड़ दी, लेकिन गृह युद्ध की राख से निकला अलकायदा, एक घातक आतंकवादी संगठन बनकर उभरा. उसके बाद जो कुछ हुआ, वो देखकर अमेरिका ही नहीं… पूरी दुनिया दहल गई.

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