Tokyo Olympics 2020: सिंधू-चानू-लवलीना संग 4 ‘सरदार’ दहाड़े…जड़ सोच को पलट दे!: Latest News

Indian Women Hockey Team

भारत ने मेंस हॉकी में ग्रेट ब्रिटेन को हराकर सेमीफाइनल में जगह बना ली. टीम इंडिया की ओर से गोल दागने वाले खिलाड़ी रहे- दिलप्रीत सिंह, गुरजंत सिंह और हार्दिक सिंह. महिला हॉकी टीम के लिए ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ यही काम गुरजीत कौर ने किया. इन ऐतिहासिक उपलब्धि पर फूले न समाते हुए एक उत्साही सज्जन ने सोशल मीडिया पर अपनी छोटी-सी प्रतिक्रिया में लिखा- “ये सरदार बड़े बेदर्द होते हैं. अपनी पर उतर आते हैं, तो सत्ता का गुरुर तोड़ डालते हैं और अंग्रेजों की चूलें भी हिला देते हैं. देखा नहीं आपने, टोक्यो में क्या हुआ!” निश्चित तौर पर मंशा दिलप्रीत, गुरजंत, हार्दिक और गुरजीत के जुझारुपन की तुलना पंजाब के किसानों के आंदोलन से करने की थी.

इस पोस्ट पर राष्ट्रवाद की हालिया परिभाषा में नव दीक्षित एक शख्स ने लंबा जवाबी हमला किया. ऊपर के वाक्यों को ‘जोक की शक्ल में भी अस्वीकार्य कर दिया. लिखने वाले की समझ को खोखली करार किया. सोच को घटिया और दो कौड़ी का बताया. आंदोलकारी किसानों के लिए खालिस्तानी, देशद्रोही, भेड़िया, पा*ल कु* जैसे सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी के स्वच्छंद विशेषणों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें उनके अंजाम तक ऐसी जगह पहुंचाने की चेतावनी दी, जिसे यहां लिखा भी नहीं जा सकता. आखिर में ‘जय हिंद’ कहकर अपनी राष्ट्रभक्ति भी सुनिश्चित करने की कोशिश की. इस प्रकार दो पवित्र शब्द- ‘जय हिंद’ को बड़ी ही चतुराई से अपनी भद्दी भाषा के सामने ढाल बना लिया.

कुतर्क के कीचड़ से हट ले और पलट दे

उत्साह में इमोशनल होकर पोस्ट लिखने वाले सज्जन ने सरेंडर कर दिया और माफी भी मांग ली. माफी मांगने वाला संभवत: तथ्यों और तर्कों पर संघर्ष को आगे बढ़ा सकता था, लेकिन जब सामने कुतर्की में पीएचडी हासिल कोई शख्स खड़ा हो और आपको बेवजह बहस में खींचकर लतपथ करना चाहता हो, तो समझदारी का तकाजा यही कहता है कि हाथ उठा दीजिए और पतली गली से निकल जाइए. भारत की जीत पर उत्साही महाशय ने शायद ऐसा ही किया. मैदान से हटकर सामने वाले की कोशिशों को पलट दिया.

स्वघोषित सरकार समर्थकों की असहिष्णुता के आगे बेबस सरकार?

इन्टॉलरेंस यानी असहिष्णुता. नए दौर का बहुत ही प्रचलित शब्द. मौजूदा सरकार पर असहिष्णु होने के आरोप अकसर लगते हैं. विरोधियों से निपटने के उनके तरीके पर सवाल होते हैं. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? सरकार को देश चलाना होता है, लिहाजा उसके सारे फैसले और एक्शन हर किसी को खुश नहीं कर सकते. लेकिन वे कौन लोग हैं, जो छोटी-छोटी बातों पर ‘फ्री ऑफ कॉस्ट’ राष्ट्रवाद का ऐसा झंडा उठा लेते हैं, जिनके राष्ट्र-लाभ तो संदिग्ध होते ही हैं, उल्टे राष्ट्र-हानि की आशंका रहती है. क्योंकि जब आप कोई काम डंका पीटकर किसी के समर्थन में करते हैं, तो आपके भौंडे ‘विचार प्रदर्शन’ की जिम्मेदारी उस शख्स पर भी आ जाती है, जिसका कथित समर्थन आप बिन मांगे कर रहे होते हैं.

बहुत गौर से सोचिएगा:- क्या नरेंद्र मोदी सरकार कुछेक विवादित फैसलों से ज्यादा सोशल मीडिया पर कुकुरमुत्ते की तरह उग आए स्वयंभू और अवैतनिक कार्यकर्ताओं की अति उग्र नकारात्मक सोच की शिकार नहीं हो रही है? और क्या ऐसे लोगों की वजह से सरकार अपने अच्छे इनिशिएटिव के लिए पर्याप्त श्रेय भी नहीं हासिल कर पा रही? सोचना सरकार को भी है, देश को भी.

खेल और लोकतंत्र…दोनों के लिए संघर्ष अच्छे हैं

भारतीय महिला हॉकी टीम ने ऑस्ट्रेलिया को हराया. भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने ग्रेट ब्रिटेन को हराया. दोनों ही मुल्क मौजूदा समय में भारत के बेहतरीन मित्रों में शुमार हैं. और जिस देश (जापान) की धरती पर सांसें थाम देने वाले ये मुकाबले चल रहे हैं, उसके साथ भी अपने देश की बेपनाह करीबी है. लेकिन खेलों में जब दो पक्ष आमने-सामने होते हैं, तो उनके बीच राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर क्या चल रहा है इसका कोई मतलब नहीं रह जाता. दोनों की एकमात्र कोशिश अपनी जीत की होती है. और ऐसा तब होता है, जबकि दोनों पक्षों को पता होता है कि सामने वाला जो चाह रहा है, उसकी उस चाहत में भी कोई खोट नहीं है. बावजूद इसके कोई एक पक्ष दूसरे को जीतने की छूट नहीं दे सकता.

इस जंग में सबकी जीत है

लोकतांत्रिक राजनीति में बात इससे थोड़ी अलहदा होती है और थोड़ी एक जैसी भी. यहां जब दो पक्षों में आमना-सामना होता है, तो जरूरी नहीं होता कि दोनों के लक्ष्य एक जैसे देशहित में हों. फिर भी लोकतंत्र दोनों को संघर्ष की इजाजत देता है. ये भी सही है कि कई बार जिसकी जीत होती है, उसका जीतना छोटी अवधि में देशहित में उतना नहीं होता. लेकिन लोकतंत्र लोक की आवाज से चलता है और इसमें भी आखिरकार लोकतंत्र की ही जीत होती है.

लक्ष्य हो समान…तो मतों में भेद से भी बनता है देश महान

भारत में जब सबसे पहले सिखों ने नए कृषि कानूनों के खिलाफ झंडा उठाया, तो उनकी चिंता किसानों के हितों को लेकर थी. इसी प्रकार इससे पहले जब सरकार ने नए कृषि कानून बनाए, तो उसकी चिंता भी किसानों को लेकर ही थी. सवाल उठा कि तब टकराव किस बात का? दोनों ही किसानों की चिंता कर रहे हैं और इस लिहाज से इन दोनों की चिंता देश की चिंता है, फिर विवाद क्यों? लेकिन विवाद रहा, बढ़ा और उस पराकाष्ठा तक गया, जिसकी कल्पना नहीं थी. लेकिन क्या ऐसा होना देशहित के खिलाफ था? इससे क्या किसान आंदोलन के सरदार यानी सिख देश विरोधी हो गए? क्योंकि उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर मोर्चा खोला? सरकार तो ऐसा नहीं कहती! प्रधानमंत्री से लेकर सत्तापक्ष के किसी भी संजीदा नेता ने तो कभी इन प्रदर्शनकारी किसानों को देशद्रोही नहीं कहा ! उल्टे, राजनाथ सिंह समेत सत्ता पक्ष के कुछ और सीनियर नेताओं ने तो आंदोलनकारी किसानों के बारे में ऐसी अनर्गल बातें कहने वालों को खरी-खरी भी सुना चुके हैं.

प्यार के मोहताज और प्रचार के भूखे?

तो ये कौन लोग हैं, जो सिखों के हक में जरा-सी बात करते ही काट खाने के लिए दौड़ते हैं? सरकार से किसी इश्यू पर मतभेद रखने को देशद्रोह ठहराकर चीख-पुकार मचा देते हैं? धमकियां देने लगते हैं! इनकी मनोवैज्ञानिक दशा क्या है? क्या ये सिख किसानों को खालिस्तानी कहकर बीजेपी को मजबूत कर रहे हैं? या सकारात्मक पहचान बनाने में नाकाम ये लोग भद्दी गालियां देकर अपने अल्प ज्ञान को ढंकते हुए अपनी ही तरह की मानसिक अवस्था वाले चंद दूसरे लोगों की नजरों में चढ़ना चाहते हैं?

जानी-मानी मनोवैज्ञानिक मनीषा सिंघल कहती हैं- “कुल मिलाकर नीयत खुद को एडवर्टाइज करने की होती है. अच्छे या बुरे, किसी भी तरीके से. इसके लिए मीडिया सबसे अच्छा जरिया है. खुद को विज्ञापित करने के लिए जिनकी पहुंच मेन स्ट्रीम मीडिया तक नहीं होती उनके लिए इन दिनों सोशल मीडिया सुलभ है.”

याद रहे…इस जंग में कोई दुश्मन नहीं

बात चली थी ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों की टोक्यो में प्रतिद्वंद्वियों से भिड़ंत की और इधर किसानों के सरकार से संघर्ष की. न ऑस्ट्रेलियाई हमारे दुश्मन हैं, न ब्रिटिश. लेकिन हम वहां उनसे जबरदस्त तरीके से भिड़े. उसी तरह से देश के अंदर न किसान किसी के दुश्मन हैं और न ही सरकार देश या किसानों की दुश्मन हो सकती है. लेकिन दोनों पिछले 8 महीने से ज्यादा वक्त से संघर्ष में हैं. और सच ये भी है कि इस संघर्ष के ‘सरदार’ पंजाब के सिख ही कहलाएंगे, क्योंकि इसकी बुनियाद उन्हीं ने रखी.

टोक्यो से लेकर भारत तक. किसी के लक्ष्य में कुछ भी गलत नहीं है. सब पाक और पवित्र हैं. क्योंकि हर कोई अपने अधिकार क्षेत्र में और देश-दुनिया में तय नियमों के तहत संघर्ष कर रहा है. टोक्यो में भारतीय खेल का मान और मस्तक ऊंचा उठाने के लिए, जबकि देश में स्वस्थ लोकतंत्र के लिए. और इन दोनों में सरकारों का सहयोग भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने भी खिलाड़ियों को सुविधाएं और सहूलियतें दी हैं. उन्होंने ही किसानों के आंदोलन को जारी रखने की इजाजत दी है.

सिंह इज किंग…तिरंगा उठा और पलट दे

टोक्यो में झंडा बुलंद करने वाले दिलप्रीत सिंह, गुरजंत सिंह, हार्दिक सिंह और गुरजीत कौर भी भारत के बेटे और बेटियां हैं और दिल्ली-पंजाब की सीमा पर किसानों की आवाज उठा रहे सिख भी. रही बात इन सिंह बेटे-बेटियों की, तो इनके जूझारू और आक्रामक खेल ने जिस तरह से सबकुछ पलट दिया, उस पर थोड़ा गर्व करते हुए मौजूदा राजनीति उसे जोड़कर थोड़ी चुटकी ले लें, तो कैसी आपत्ति? ये गर्व भी तो पूरे देश का है. आखिर जब ये देश के लिए अपना काम कर रहे थे, तो इनकी मदद में मैदान से लेकर मैदान के बाहर तक इंडिया का जर्रा-जर्रा भी तो कदम से कदम मिलाकर उनके साथ खड़ा था. अंदर सहयोगी खिलाड़ियों की शक्ल में और बाहर अपार समर्थन की ऊर्जा लेकर.

फिर भी कोई समाज अगर कुछ अतिरिक्त जूझारू है, तो उनके जूझारूपन की प्रशंसा से देश के बाकी लोगों को मान नहीं घट जाता. उल्टे, बाकी लोग उनसे प्रेरणा ही ले सकते हैं. इसमें अपमान देखना जड़वत सोच से पैदा वैचारिक हीनता ही है. याद रहे- ‘सरदार’ मानी सिर्फ सिख नहीं. सरदार यानी लीडर. सिंधु, चानू और लवलीना संग 4 ‘सरदार’ टोक्यो में दहाड़े. जड़वत सोच को पलट दे. उधर भी पलट दे, इधर भी पलट दे.

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