मोदी मंत्रिमंडल का बड़ा निर्णय, अब राज्य किसी जाति को OBC घोषित कर सकेंगे; क्या इससे मराठाओं, जाटों, पटेलों को आरक्षण मिलेगा?: Latest News

Maratha Reservation Min

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज एक अहम निर्णय लिया है. इस निर्णय के तहत अब कोई राज्य चाहे तो किसी जाति की पहचान ओबीसी के रूप में कर सकता है और उस जाति को आरक्षण की सुविधा दे सकता है. अब इस विधेयक को संसद में मान्यता दिलानी होगी. केंद्र सरकार अब विधेयक लाती है तो राज्य सरकारों को अपने हिसाब से ओबीसी जातियों को अपने राज्य में शामिल करने का संवैधानिक अधिकार मिल जाएगा. इसका फायदा मराठा, जाट, पटेल, गुर्जर जैसी उन प्रभावशाली जातियों को होगा जो अपने-अपने राज्यों में ओबीसी आरक्षण में शामिल होेने की मांग कर रही हैं.

मराठा, जाट, गुर्जर, पटेल आरक्षण का रास्ता कितना हुआ आसान?

5 मई को मराठा आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी की पहचान करने और सूची बनाने के राज्यों के अधिकार को अवैध बताया था. कोर्ट का कहना था कि 102 वें संविधान के बाद राज्यों को सामाजिक और आर्थिक आधार पर पिछड़ों को पहचान करने और अलग से सूची बनाने का अधिकार नहीं है. ऐसे में केंद्र ही यह तय कर सकता है कि किसी राज्य में कौन सी जाति पिछड़ी है और कौन सी जाति पिछड़ी नहीं. ऐेसे में  अगर राज्य को यह अधिकार नहीं है तो 2018 का महाराष्ट्र में फडणवीस सरकार द्वारा मराठों को दिया गया आरक्षण अपने आप अवैध हो गया.

इस पर सवाल उठे थे और 102 वें संविधान संशोधन अधिनियम के खिलाफ ये तर्क दिया गया कि इससे तो राज्यों के लिए अलग लिस्ट बनाने के विधानसभा के अधिकार की अवहेलना होती है. उच्चतम न्यायालय ने इस बात को समझा और यह माना कि इस मामले का असर सभी राज्यों पर पड़ेगा. इसलिए राज्यों का राय अहम है. उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों से अपनी राय देने को कहा. अब मोदी मंत्रीमंडल की बुधवार (4 अगस्त) की बैठक में यह अधिकार राज्यों को देने का निर्णय किया  है. यानी अब राज्य किसी जाति को ओबीसी की लिस्ट मे शामिल कर सकते हैं. लेकिन महाराष्ट्र के मराठा आरक्षण के संदर्भ में उपसमिति के अध्यक्ष अशोक चव्हाण ने यह दावा ठुकरा दिया है कि इससे मराठा आरक्षण का रास्ता साफ हो गया है.

जब तक 50 प्रतिशत के आरक्षण की सीमा कायम, तब तक कठिन है डगर 

अशोक चव्हाण ने कहा कि जब तक आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक रखी गई है, तब तक मराठा आरक्षण के लिए राह आसान नहीं है. अब इस बात को पहले समझिए. पिछड़ा वर्ग मराठों को पिछड़ा मानने को तैयार नहीं है. ऐसे में पिछड़ा वर्ग अपने हिस्से के कोटे में मराठों को शेयर क्यों देगा? सरकार अगर पिछड़ों के साथ जबर्दस्ती करके मराठों को ओबीसी में शामल कर लेती है तो पिछड़ा वर्ग असंतुष्ट हो जाएगा. सरकार यह जोखिम क्यों लेगी? अब अगर मराठों को अलग से आरक्षण दिया जाता है तो आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत की सीमा को पार कर जाएगी. हालांकि कई राज्यों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत को पार कर चुकी है, लेकिन उन सबके खिलाफ याचिका लंबित है.

हालांकि इसके खिलाफ भी तर्क यह है कि 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं देने का 1992 का सुप्रीम कोर्ट का जो निर्णय (इंदिरा साहनी केस) था वो चूंकि एकमत से नहीं हुआ था, इसलिए उस निर्णय को भंग किया जा सकता है और 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है.

50 प्रतिशत की सीमा क्रॉस किए बिना आरक्षण नहीं, 50 प्रतिशत क्रॉस होना संभव नहीं

यहां अशोक चव्हाण कहते हैं कि केंद्र सरकार अगर सुप्रीम कोर्ट में इस विषय को अच्छी तरह से रखती तो 50 प्रतिशत की सीमा को शिथिल किया जा सकता है. तभी मराठा आरक्षण का मार्ग खुल सकता है. लेकिन यहां पर अशोक चव्हाण या तो विषय को समझ नहीं रहे या विषय को केंद्र के पाले में डाल कर अपने हाथ खड़े कर रहे हैं. उन्हें यह याद रहना चाहिए कि 29 मई को स्थानीय संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण रद्द करते हुए ठाकरे सरकार की पुनर्विचार याचिका को ठुकराते हुआ साफ कहा था कि आबादी के लिहाज से कुछ भाग आरक्षित किए गए हों तब भी आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं दिया जा सकता. सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी साफ निर्देश दिया था कि ओबीसी को 27 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता.

यानी हर हाल में आरक्षण 50 प्रतिशत के भीतर ही वैध है. वरना मिनर्वा मिल बनाम भारत सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया हुआ है कि संसद भी उस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती जो संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर के खिलाफ जाता हो. इस पर अशोक चव्हाण की राय को काउंटर करता हुआ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील डॉ. गुणरत्न सदावर्ते  का तर्क अहम है. गुणरत्न सदावर्ते Tv9 Bharatvarsh Digital से बात करते हुए कहते हैं कि एक बार जब बाबा साहब भीमराव आंबेडकर से जब पूछा गया था कि क्या आरक्षण को इस अनुपात में बढ़ाया जा सकता है. डॉ. आंबेडकर ने साफ कहा था कि नहीं, ऐसा करने से रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन शुरू हो जाएगा. और रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन का मामला संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर को छूता है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले को रिविजिट करने से इनकार कर दिया है.

 

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PRAJA PARKHI: मोदी मंत्रिमंडल का बड़ा निर्णय, अब राज्य किसी जाति को OBC घोषित कर सकेंगे; क्या इससे मराठाओं, जाटों, पटेलों को आरक्षण मिलेगा?: Latest News
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