Fikr Aapki: अफगानिस्‍तान में तालिबान के नाम पर चीन और पाकिस्‍तान का खतरनाक खेल, मिस्‍ट्री से समझे ‘लिबरल चेहरे’ का सच: Latest News

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अफगानिस्‍तान एक जमाने से विदेशी ताकतों के लिए मैदान-ए-जंग रहा है, जहां वो अपनी ताकत आजमाते रहे हैं. 19वीं सदी में अफ़ग़ानिस्तान उस ग्रेट गेम का गवाह रहा है जिसमें यहां नियंत्रण के लिए ब्रिटेन और रूस की भीषण दुश्मनी हुई. ‘द ग्रेट गेम’ सौ साल पहले ख़त्म हो गया लेकिन अफ़ग़ानिस्तान को नियंत्रित करने के लिए एक अलग तरह का संघर्ष आज भी जारी है. जिसमें सामने से तालिबान दिख रहा है लेकिन पर्दे के पीछे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय ताकतें अपना हित साध रही है. ये देश हैं रूस, चीन और पाकिस्तान. अफ़ग़ानिस्तान पर दबदबा कायम करने के लिए तीनों तालिबान के टीचर बन बैठे हैं, लेकिन इसमें सबसे खतरनाक खेल चीन और पाकिस्तान खेल रहा है.

अपनी उदार छवि पेश कर रहा है तालिबान

विरोधियों को माफी, महिलाओं को समान अधिकार और आजादी. एक आतंकी संगठन तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने जब पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो दुनिया से यही वादा किया. 1990 के दशक जैसे क्रूर नियम-कानून लागू नहीं होंगे. महिलाओं और मीडिया को पूरी आजादी होगी. तालिबान आज दुनिया से वही कह रहा है, जो दुनिया सुनना चाहती है. हालांकि दुनिया को तालिबान के इन बयानों पर भले ही भरोसा ना हो लेकिन इतना तो तय है कि इस बार तालिबान उदार छवि पेश कर रहा है. ऐसे में ये समझना जरूरी है कि नए तालिबान का टीचर कौन है.

समझिए चीन और पाकिस्‍तान का खतरनाक खेल

तालिबान को ये सब कौन सिखा रहा है. क्या चीन, पाकिस्तान इसके पीछे है? तालिबानियों की रणनीति और बयान देखकर साफ लगता है कि इसके पीछे पूरी सोची समझी प्लानिंग है. चीन-पाकिस्तान का खतरनाक खेल है. कैसे इसे समझिए. जहां तमाम देश काबुल में फंसे अपने नागरिकों को निकालने में जुटे हैं वहीं चीन ने तालिबान से दोस्ती का ऐलान कर दिया है. पाकिस्तान ने कहा कि तालिबान ने अफगानिस्तान में गुलामी की जंजीरें तोड़ दी है. चीन और पाकिस्तान दोनों ही दुनिया के उन चुनिंदा देशों में भी शामिल हैं, जिनके दूतावास अफ़गानिस्तान में तालिबान के क़ब्ज़े के बाद भी ना सिर्फ खुले हैं बल्कि पूरी तरह वर्किंग हैं.

तालिबान ने भी काबुल में इन दोनों देशों की एंबेसी की सुरक्षा अपने हाथों में ले ली है. एक तरफ जहां अफगानिस्तान से हैरान-परेशान लोगों की तस्वीरें सामने आ रही है. वहीं, चीन और पाकिस्तान का तालिबान के लिए रवैया बेहद दोस्ताना है. तालिबान के कब्जे को अभी चार दिन का वक्त नहीं हुआ है, फिर भी चीन और पाकिस्तान उसे मान्यता देने के लिए उतावले हो रहे हैं. असल में इसके पीछे का खेल तालिबान के नए टीचर का नाम और पता बताता है.

चीन ने तालिबान को बताया था शांति दूत

10 दिन पहले तालिबान नेता मुल्ला बरादर जब एक डेलिगेशन लेकर चीन गए तो विदेश मंत्री वांग यी उनसे मिले थे. वांग यी ने तब तालिबान से कहा कि तालिबान शांति, रीडिवेलपमेंट और रीकंस्ट्रक्शन का एक सिंबल है. ये चौंकाने वाला बयान था क्योंकि इससे पहले किसी भी देश ने तालिबान को शांति दूत नहीं कहा. दरअसल, तालिबान को लेकर चीन का ये रवैया किसी सिद्धांत पर आधारित नहीं है, ड्रैगन मौकापरस्त है.

चीन के ऐसा कहने की वजह है शिनजियांग में उइगर मुसलमानों के साथ हुई बर्बरता, जिससे तालिबान काफी खफा है. तालिबान सुन्नी संगठन है और शिनजियांग सुन्नी बहुल क्षेत्र. इस लिहाज से उनमें एक भाईचारा है. शिनजियांग में आजादी के लिए उइगर लड़ाके आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उनका ठिकाना पूर्वोत्तर अफगानिस्तान का बदख्शां शहर में है.

चीन ने तालिबान को दुनिया दारी और कूटनीतिक नफा नुकसान समझाने से पहले ये भरोसा लिया है कि तालिबान चीन के विरोधियों के साथ सहयोग नहीं करेगा. एक्सपर्ट भी चीन-तालिबान के इस रोमांस से हैरान नहीं है.

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