लोकार्ड सिद्धांत का कमाल: डबल मर्डर के बाद मां-बेटा की लाशों के साथ-साथ चलने के शक ने कातिल पकड़वा दिया…..: Latest News

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दिल्ली पुलिस ने फॉरेंसिक साइंस में मौजूद 144 साल पुराने डॉ. लोकार्ड विनिमय सिद्धांत के बलबूते सनसनीखेज डबल मर्डर का मामला चंद घंटे में ही सुलझा लिया है. डॉ. एडमोंड लोकार्ड द्वारा दुनिया को दिए गए फार्मूले ने मां-बेटे के हत्यारे को गिरफ्तार ही नहीं कराया, वरन यह भी साबित कर दिया कि यह सिद्धांत आज भी आपराधिक घटनाओं को सुलझाने में उतना ही महत्वपूर्ण कहिए या फिर कामयाब नुस्खा है, जितना कि अब से करीब 150 साल पहले यानि सन् 1877 में हुआ करता था. इसी सिद्धांत पर डबल मर्डर की जांच को आगे बढ़ाकर चल रही दिल्ली पुलिस ने यह तो ताड़ लिया था कि, दोहरे हत्याकांड की घटना को अंजाम देने वाला कातिल “घर के अंदर” का ही आदमी है. बस उसे सही वक्त पर मय सबूतों के दबोचना था. मां-बेटा के कत्ल के आरोप में गिरफ्तार कातिल का नाम अभिषेक है. हत्यारोपी अभिषेक मरने वाली महिला बबिता (52) का रिश्ते में भांजा लगता है. अभिषेक द्वारा कत्ल किए गए बबिता के बेटे का नाम गौरव (27) है.

घटनाक्रम के मुताबिक श्रीकृष्ण पालम गांव में रहते हैं. श्रीकृष्ण वायुसेना में लेखाकार (एकाउंटेंट) के पद पर तैनात हैं. मंगलवार शाम के वक्त दफ्तर से लौटने पर उन्होंने पुलिस को खबर दी कि, घर में उनकी पत्नी बबिता और बेटे गौरव की लाश पड़ी है. मौके पर पहुंची पुलिस ने देखा कि मां-बेटा की हत्या डंबल से सिर कुचल कर की गई है. घर की अलमारियां खुली पड़ी थीं. सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा था. इससे लूटपाट का भी अंदेशा लग रहा था. घर में मौजूद सीसीटीवी का डीवीआर सिस्टम गायब था. घर में इंट्री भी फ्रैंडली ही मालूम पड़ती थी. पुलिस को पता चला कि घर की मालकिन बबिता कुछ समय पहले कोरोना से संक्रमित हो गई थीं. कोरोना संक्रमण से बाहर आते ही उन्होंने अपनी रिकवरी के लिए बताई गई एक्सरसाइज करने के लिए हाल ही में नए डंबल मंगाए थे.

डबल मर्डर के घटनास्थल से यह सब मिला

डबल मर्डर की घटना में मौके पर पहुंची पुलिस के पास डंबल पर कातिल के धुंधले से फिंगर-प्रिंट मिले. कुछ फिंगर प्रिंट अलमारियों और दरवाजों पर भी मिले. मौके पर मौजूद “मूक-गवाह” बार बार पुलिस टीम को इशारा कर रहे थे कि, हो न हो इस डबल मर्डर में कोई न कोई प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से अंदर का आदमी जरूर मौजूद है. इसी बीच पुलिस को सबसे ज्यादा यह बात खटक रही थी कि, बदमाश अगर पीड़ित परिवार से परिचित नहीं थे तो फिर वे, डबल मर्डर के बाद आखिर सीसीटीवी फुटेज का डीवीआर इत्तमिनान से क्यों निकाल कर ले जाएंगे? वे तो डबल मर्डर और लूटपाट की घटना को अंजाम देने के बाद भागने की जल्दी में होने चाहिए. अगर उन्हें अपनी मौजूदगी के सबूत मिटाने ही थे तो वे जल्दबाजी में, सीसीटीवी फुटेज के डीवीआर को किसी भारी चीज से चोट मारकर नष्ट भी कर सकते थे. डबल मर्डर की घटना को अंजाम देने के बाद कोई भी तभी डीवीआर ले जाने की बात याद रख सकेगा, जब उसे पता होगा कि घर में कब-कब यानी किस वक्त कौन आ सकता है?

इसलिए ताड़ लिया पुलिस ने संदिग्ध

इन्हीं तमाम बिंदुओं पर पुलिस अपनी पड़ताल आगे बढ़ाती रही. इसी बीच पुलिस ने घर के मालिक श्रीकृष्ण के बयान पर डबल मर्डर का मुकदमा दर्ज कर लिया. सूत्रों के मुताबिक जब थाने में मुकदमा लिखा जा रहा था श्रीकृष्ण का भांजा अभिषेक भी साथ था. वारदात की सूचना मिलने के बाद से ही पुलिस अगर श्रीकृष्ण के साथ लगातार चलते किसी को देख रही थी, तो वो इकलौता अभिषेक ही था. जो मंगलवार शाम घटना घटित होने की बात खुलने के बाद से लगातार हर लम्हा, श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे ही लगा हुआ था. दरअसल यही बात थाना पुलिस ने ताड़ ली मगर पुलिस ने कानों-कान अपने इस शक को किसी से जाहिर नहीं किया. साथ ही पुलिस संदिग्ध अभिषेक पर नजरें गड़ाए उसकी हर चाल को ताड़ती रही. पुलिस की तेज नजरों ने ही ताड़ लिया था कि, अभिषेक ही एक अदद वो संदिग्ध शख्स है जो, पोस्टमॉर्टम हाउस से लेकर श्मशान घाट तक भी लाशों के साथ साथ चला है.

कैसे काम आया अद्भूत “लोकार्ड सिद्धांत”

मां-बेटा के इस डबल मर्डर की पड़ताल में जुटी दिल्ली पुलिस की टीमों की नजर में अभिषेक आया था, फॉरेंसिक साइंस (न्यायालयिक विज्ञान) के उस सबसे कामयाब लोकार्ड विनिमय सिद्धांत के चलते, जिसमें कहा जाता है कि, अगर दो चीजें एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं तो उन दोनों में किसी न किसी चीज का आदान-प्रदान होना तय होता है. मतलब दो चीज अगर एक दूसरे के संपर्क में आई हैं तो, उनमे पहली वस्तु का कुछ भाग दूसरी वस्तु के पास और दूसरी वस्तु का कुछ भाग पहले के पास पहुंचना (आना-जाना) तय है. यह नियम हर एक वस्तु पर लागू होता है. लोकार्ड सिद्धान्त ही सिद्ध करता है कि किसी भी आपराधिक घटना स्थल पर, हर एक मुजरिम अपना कोई न कोई निशान जरूर छोड़ता है. जिसके तहत जब भी कोई अपराधी घटना स्थल पर पहुंचता है तो उससे, तमाम सतर्कता के बाद भी जाने-अनजाने में कुछ सुराग मौके पर रह/छूट ही जाते हैं.

इंसानों की तरह “मूक-गवाह” झूठे नहीं होते

यही वे “मूक गवाह” होते हैं जो घटनास्थल पर छोड़े तो अपराधी द्वारा जाते हैं, मगर वे काम संदिग्ध को ही मुजरिम सिद्ध कराने में आते हैं. जैसे कि घटनास्थल पर मौजूद रहे अपराधी के उंगलियों के निशान, उसके पैरों की छाप, जूतों पर लगी मिट्टी, उसके बदन या कपड़ों की खुश्बू आदि-आदि. यह सभी सबूत कहिए या फिर सुराग, लोकार्ड सिद्धान्त को सिद्ध करते हैं. यह सभी भौतिक-शास्त्र से जुड़े वे बिंदु हैं जो घटनास्थल से बरामद किए जाते हैं. इसलिए यह 100 फीसदी सच्चाई साबित करने वाले साबित होते हैं. चूंकि यह सभी सबूत-गवाह “मूक” होते हैं. लिहाजा वे इंसान की तरह खुद को झूठ बुलवा पाने में भी सक्षम नहीं होते हैं. इसीलिए कानून में घटनास्थल से मिली इन मूक-गवाहों को अहमियत देता है. जब कोई न्यायालयिक वैज्ञानिक (फॉरेंसिक साइंस एक्सपर्ट या फिर जांच अधिकारी) किसी भी घटनास्थल पर पड़ताल के लिए पहुंचता है तो वह, सबसे पहले वहाँ पर मौजूद भौतिक वस्तुओं को ही देखता है.

कौन थे डॉ. एडमोंड लोकार्ड

जैसा कि मां-बेटे के इस डबल मर्डर में भी पुलिस ने मौके से फिंगर प्रिंट इत्यादि जुटाकर आरोपी को गिरफ्तार किया. डबल मर्डर में गिरफ्तार अभिषेक पहले से ही पुलिस की नजरों में संदिग्ध हो चुका था. जैसे ही उसने परिवार के मुखिया और डबल मर्डर में मुकदमा दर्ज कराने वाले श्रीकृष्ण का पीछा श्मशान और पोस्टमॉर्टम हाउस तक भी नहीं छोड़ा. तो वो खुद ही पुलिस की नजरों में संदिग्ध साबित हो गया था. लोकार्ड विनिमय सिद्धान्त न्यायालयिक विज्ञान का एक वो हैरतंगेज सिद्धान्त है जो, फ्रांस के वैज्ञानिक डॉ. एडमोंड लोकार्ड ने 1877-1966 में दुनिया को दिया था.

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