Coronavirus: केरल और महाराष्ट्र में कोरोना के बढ़ते मामले कहीं तीसरी लहर का संकेत तो नहीं? जानिए क्या कहते हैं आंकड़े: Latest News

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कोरोना की तीसरी लहर का खतरा गहराता जा रहा है और उसकी एक बड़ी वजह केरल राज्य है. क्योंकि जिस तरह से केरल में कोरोना आउट ऑफ कंट्रोल होता जा रहा है, वो जल्द ही पूरे देश के लिए खतरे का सबब बन सकता है, इसलिए आज एक केंद्रीय टीम केरल पहुंची है. 6 सदस्यीय ये टीम केरल में हालात और इंतजाम का जायजा लेगी और अगले 3 दिन में रिपोर्ट सौंपेगी.

दरअसल, केरल में हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं. बीते दिन से देश में जितने भी नए केस मिल रहे हैं, उसमें से आधे केरल में रिपोर्ट हो रहे हैं. मतलब ये कि कोरोना के संक्रमण की कड़ी इस वक्त केरल में सबसे ज्यादा मजबूत है और धीरे-धीरे इसका दायरा भी बढ़ रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी कोरोना केस बढ़ने शुरू हो गए हैं.

केरल सुपर स्प्रेडर बनता जा रहा है. यहां ना सिर्फ देश के आधे केस मिल रहे हैं बल्कि देश के कुल एक्टिव केस के करीब 39 प्रतिशत केरल में ही हैं. फिक्र सिर्फ केरल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र में भी हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं. क्योंकि केरल के बाद सबसे ज्यादा नए केस महाराष्ट्र से मिल रहे हैं और एक्टिव केस के हिसाब से देखें, तो देश के 58 प्रतिशत से ज्यादा एक्टिव केस सिर्फ महाराष्ट्र और केरल में हैं.

अब सवाल ये है कि केरल और महाराष्ट्र, जिनकी कोरोना से लड़ाई को रोल मॉडल के तौर पर पेश किया गया, तारीफें की गईं, वहां लगातार हालात क्यों बिगड़े हुए हैं. जबकि देश के बाकी राज्यों में खासतौर पर उत्तर प्रदेश में हालात बहुत हद तक काबू में दिख रहे हैं जहां दूसरी लहर में जो कोरोना ने जो कहर बरपाया था, वो किसी से छुपा नहीं हैं, लेकिन उसके बाद से जिस तरह हालात काबू में आए हैं, वो भी छुपा नहीं है.

चंद रोज पहले खुद प्रधानमंत्री ने यूपी सरकार की तारीफ की थी और यूपी सरकार भी कोरोना के खिलाफ लड़ाई में अपनी कामयाबी का बखान कर रही है लिहाजा विरोधी टूट पड़े हैं और कह रहे हैं कि दूसरी लहर में जो हुआ, वो क्यों भूल गए हैं. महाराष्ट्र और केरल से तुलना की जा रही है कहा जा रहा है कि वहां के मुकाबले यूपी में टेस्टिंग कम हो रही है, इसलिए आंकड़े कम दिख रहे हैं, लेकिन सच क्या है? इसका विश्लेषण आज हम आंकड़ों के आधार पर करेंगे.

दूसरी लहर में फेल साबित हुआ केरल

देश में कोरोना की तीसरी लहर का खतरा मंडरा रहा है और माना जा रहा है कि उसकी शुरुआत केरल में हो चुकी है. क्योंकि जिस तरह दूसरी लहर परवान चढ़ी थी, कमोबेश वैसी ही स्थिति फिर से बनती दिख रही है. दूसरी लहर का कहर बरपने से ठीक पहले जैसे दिल्ली समेत उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में कोरोना काबू में दिख रहा था, इस वक्त भी कुछ वैसा ही नजर रहा है.

केरल में डेली न्यू केस का आंकड़ा करीब 26 प्रतिशत बढ़ गया है. तीन दिन से लगातार 22 हजार से ज्यादा केस रिपोर्ट हो रहे हैं. 27 और 28 जुलाई को ये आंकड़ा देश में मिलने वाले मामलों की तुलना में 51 प्रतिशत से ज्यादा रहा और 29 जुलाई को भी 50 प्रतिशत के करीब रहा. दूसरी लहर में यूपी में हाहाकार मचा था, लेकिन एक पहलू ये भी है कि दूसरी लहर के बाद उत्तर प्रदेश में कोरोना तेजी से काबू में आया है.

केरल जिसे पहली लहर में कोरोना को कंट्रोल करने के बाद से रोल मॉडल माना जाने लगा था. दूसरी लहर में वो फेल साबित हुआ और देश के बाकी राज्यों में भी सिस्टम ने वायरस ने सामने सरेंडर कर दिया था, जिनमें यूपी भी था. लेकिन दूसरी लहर से जिस तरह यूपी उबरा है, वो देखकर अब उसे रोल मॉडल कहा जा रहा है.

यूपी कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने में बहुत हद तक कामयाब हो गया है और इसलिए वहां केस कम आ रहे हैं. अब ये सब या तो यूपी सरकार की कोशिशों से मुमकिन हुआ है या फिर ऊपरवाले की कृपा से, लेकिन यूपी में कोरोना संक्रमण काबू में आया. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है. हां लेकिन केरल सरकार की दलील ये है कि वहां केस इसलिए ज्यादा आ रहे हैं, क्योंकि वहां टेस्टिंग ज्यादा हो रही है.

ज्यादा टेस्टिंग की वजह से ज्यादा पॉजिटिव केस?

केरल के स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज ने कहा, ‘हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि तीसरी लहर ना आए. हम हालात को नियंत्रण में रखना चाहते हैं, इसलिए हम ज्यादा से ज्यादा कोरोना टेस्ट कर रहे हैं. यही वजह है कि इन दिनों पॉजिटिव केस ज्यादा आ रहे हैं.’ यूपी में लगातार 2 लाख से ज्यादा टेस्ट हो रहे हैं. लेकिन केरल में उतने नहीं हो रहे हैं. एक हफ्ते में यूपी ने 17 लाख से ज्यादा टेस्ट किए और सिर्फ 316 लोग पॉजिटिव पाए गए. जबकि केरल में करीब पौने 11 लाख टेस्ट ही हुए और 1 लाख 31 हजार से ज्यादा लोग संक्रमित पाए गए.

फिक्र सिर्फ केरल में लगातार केस बढ़ने की नहीं है, बल्कि रिकवरी घटने से और ज्यादा बढ़ गई है. जिसका नतीजा ये हुआ है कि केरल में डेढ़ लाख से ज्यादा एक्टिव केस हैं यानी वो लोग जिनका इलाज चल रहा है. जबकि यूपी में एक्टिव केस का आंकड़ा महज 787 है. साफ है कि सबसे अच्छे हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर वाले राज्यों में शुमार केरल कोरोना को कंट्रोल करने के हर पैमाने पर पिछड़ता नजर आ रहा है और उन्ही में से एक है पॉजिटिविटी रेट.

पॉजिटिविटी रेट मतलब जितने सैंपल लिए जाते हैं और उनमें संक्रमित पाए गए लोगों का प्रतिशत. केरल में पॉजिटिविटी रेट साढ़े 13 प्रतिशत के पार हो गया है. जबकि यूपी में 0.02 प्रतिशत है. फिर भी अगर उन दलीलों और आरोपों को एक बार के लिए सच मान भी लिया जाए, जिनमें कहा जा रहा है कि केरल असली आंकड़े दे रहा है और यूपी छुपा रहा है. तो अगर केरल जितना ही पॉजिटिविटी रेट यूपी में भी मान लिया जाए, तो यूपी में उतने ही आंकड़े होने चाहिए थे, जैसे दूसरी लहर के दौरान थे और दूसरी लहर जैसा ही हाहाकार मचा होना चाहिए था. लेकिन क्या वैसा हो रहा है. क्या शहर हों या गांव, कहीं भी किसी भी अस्पताल से दूसरी लहर जैसी भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं. नहीं आ रही हैं क्योंकि सरकार आंकड़े छुपा सकती हैं, लेकिन कोरोना के कहर की तस्वीरें, मजबूरी, मातम और आक्रोश को नहीं छुपा सकती है.

केरल की तरह ही कोरोना से लड़ाई के लिए सुर्खियां बंटोरने वाला रोल मॉडल कहा जाने वाला एक और राज्य महाराष्ट्र है, जो पहली लहर में भी कोरोना का एपिसेंटर बना था और दूसरी लहर में भी संक्रमण का बड़ा केंद्र रहा. दूसरी लहर ने अपने पीक पर पूरे देश को बेबस और मजबूर बना दिया था, उनमें महाराष्ट्र भी था और यूपी भी था लेकिन दूसरी लहर से यूपी उबर चुका है. जबकि महाराष्ट्र लगातार देश की फिक्र बढ़ा रहा है.

यूपी का कोविड मैनेजमेंट रहा कामयाब

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कामयाबी का एक पैमाना होता है मौत के आंकड़ों का कम होना और इस मोर्चे पर भी वो राज्य पिछड़े हुए हैं, जिनकी कोरोना के खिलाफ लड़ाई को रोल मॉडल माना जाता है. महाराष्ट्र की आबादी करीब 12.5 करोड़ है, यहां कोरोना से अब तक 1 लाख 32 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है. जबकि उससे दोगुनी आबादी वाले यूपी में मौत का आंकड़ा करीब पौने 23 हजार है. यूपी से कई गुना कम आबादी वाले केरल में भी साढ़े 16 हजार से ज्यादा लोगों की जान गई है.

केरल छोटा राज्य है इसलिए रोल मॉडल के लिहाज से यूपी की तुलना महाराष्ट्र से करना सटीक रहेगा. अगर ये मान भी लें कि यूपी ने 4 से 5 गुना कम मौत रिपोर्ट की गईं तो उस यूपी में करीब 1 लाख 13 हजार के आसपास मौत होनी चाहिए थीं. फिर भी वो महाराष्ट्र में मौत के मौजूदा आंकड़े से कम बैठता. लेकिन महाराष्ट्र सरकार अभी भी अपने मॉडल का राग अलाप रही है. सब कुछ कंट्रोल में और पारदर्शी होने का दावा कर रही है.

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कहा, ‘अभी देखेंगे, तो 36 में से 25 जिले अंडर कंट्रोल हैं. आंकड़ों पर न जाते हुए, हमने बहुत पारदर्शिता के साथ, ईमानदारी के साथ काम किया है, जो भी काम किया है. मौत के आंकड़े छुपाना, पॉजिटिव केस छुपाना, हमने ये अनैतिक काम बिल्कुल नहीं किया है.’ चलिए ये मान भी लेते हैं कि महाराष्ट्र ने सारे आंकड़े सही तरीके से, पूरी ईमानदारी से रिपोर्ट किए हैं. लेकिन अगर साढ़े 12 करोड़ आबादी वाले महाराष्ट्र में 1 लाख 32 हजार से ज्यादा लोगों की मौत के बाद भी कहा जाता है कि सरकार ने अच्छा काम किया है, तो फिर 25 करोड़ आबादी वाले यूपी में सिर्फ पौने 23 हजार मौत होना क्या है?

साफ है कि यूपी का कोविड मैनेजमेंट बहुत हद तक कामयाब रहा है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि महाराष्ट्र या केरल की सरकारों ने कुछ नहीं किया गया है. मगर हां जो किया है, वो साबित नहीं हुआ है. वैसे ये भी एक सच है कि कोरोना काल में जितना एक्टिव योगी दिखे, उतना एक्टिव शायद कोई चीफ मिनिस्टर नहीं दिखा. ट्रेस, टेस्ट, ट्रीट के साथ कर्फ्यू और तेज टीकाकरण की नीति का नतीजा सबके सामने हैं.

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